मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता Class 10: भावार्थ और व्याख्या
Updated 14 October 2026 · Fact-checked
'मनुष्यता' स्पर्श भाग 2 की मैथिलीशरण गुप्त की कविता है। कवि कहता है कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जिए और मरे। बोर्ड इस कविता के काव्यांश पर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (कथन-कारण सहित) और 25-30 शब्दों के दो-दो अंक वाले प्रश्न पूछता है।
What मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता is about
'मनुष्यता' स्पर्श भाग 2 के पद्य खंड का तीसरा पाठ है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं, जो अपने जीवनकाल में ही राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध हुए। कविता शुद्ध खड़ी बोली में है और इस पर संस्कृत का गहरा प्रभाव है। एक पंक्ति में: सच्चा मनुष्य वही है जो अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जिए और मरे।
बोर्ड परीक्षा में यह कविता खंड ग (काव्य खंड) में आती है। इसके किसी काव्यांश पर एक-एक अंक के पाँच बहुविकल्पी प्रश्न पूछे जा सकते हैं, जिनमें कथन-कारण प्रश्न भी होता है। इसके अलावा 25-30 शब्दों के दो-दो अंक वाले प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनमें चार में से तीन प्रश्न करने होते हैं। इनमें किसी पंक्ति का भाव, कवि का संदेश या किसी विचार का कारण पूछा जाता है।
In real board papers: Course A, asked in 1 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.2 marks per paper; Course B, asked in 8 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 1.7 marks per paper. See the questions
मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता: explanation
In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.
पहला पद: कवि कहता है कि मनुष्य मरणशील है, इसलिए मृत्यु से डरना व्यर्थ है। मरना ऐसा चाहिए कि सब लोग याद करें। जो केवल अपने लिए जिया, उसका जीना और मरना दोनों बेकार हैं। केवल अपना पेट भरना पशु का स्वभाव है। सच्चा मनुष्य वह है जो दूसरों के लिए मरे।
दूसरा पद: उदार व्यक्ति की कथा सरस्वती गाती है, धरती उसकी आभारी रहती है, उसका यश सदा गूँजता है और पूरी सृष्टि उसे पूजती है। उदार वही है जो पूरे संसार में अपनेपन का भाव भर दे।
तीसरा पद: कवि पौराणिक उदाहरण देता है। भूखे रंतिदेव ने हाथ का थाल दे दिया, दधीचि ने अपनी हड्डियाँ दीं, राजा उशीनर ने अपना मांस और कर्ण ने शरीर का चमड़ा दान किया। शरीर नश्वर है, आत्मा अनादि है, फिर डर कैसा?
चौथा पद: सहानुभूति सबसे बड़ी पूँजी है; इसी से धरती वश में होती है। बुद्ध ने करुणा के कारण पुरानी मान्यताओं का विरोध किया, फिर भी लोग उनके आगे विनम्रता से झुके। उदार वही है जो परोपकार करे।
पाँचवाँ पद: धन के घमंड में अंधे मत बनो। स्वयं को सनाथ मानकर गर्व मत करो, क्योंकि यहाँ कोई अनाथ नहीं; ईश्वर सबके साथ है। अधीर होने वाला बहुत भाग्यहीन है।
छठा पद: अनंत आकाश में देवता हाथ बढ़ाए खड़े हैं। एक-दूसरे के सहारे उठो, आगे बढ़ो और कलंक-रहित होकर देवताओं की गोद तक पहुँचो। ऐसे मत रहो कि किसी का काम किसी से न बने।
सातवाँ पद: सब मनुष्य भाई हैं, क्योंकि सबका पिता एक परमात्मा है। कर्मों के अनुसार बाहरी भेद दिखते हैं, पर भीतर सबकी आत्मा एक है, इसके साक्षी वेद हैं। भाई ही भाई का दुख न हरे, यह अनर्थ है।
आठवाँ पद: अपने इच्छित मार्ग पर हँसते-खेलते चलो और बाधाएँ हटाते जाओ। मेल-जोल न घटे, भेदभाव न बढ़े। सब एक ही राह के सावधान यात्री बनें। समर्थ वही है जो दूसरों को पार लगाते हुए स्वयं पार हो।
केंद्रीय भाव: कविता का प्रतिपाद्य है कि मनुष्यता का अर्थ परोपकार, सहानुभूति, विनम्रता और एकता है। स्वार्थ पशु-प्रवृत्ति है; दूसरों के लिए जीना ही सच्ची मनुष्यता है।
Themes and message
परोपकार ही सच्ची मनुष्यता
पूरी कविता का मूल विचार यही है कि मनुष्य होने का अर्थ दूसरों के काम आना है। कवि अपने लिए ही खाने-पीने को पशु जैसा स्वभाव कहता है, क्योंकि पशु केवल अपने हिस्से का चारा चरता है। मनुष्य के पास चेतना है, इसलिए उससे दूसरों के हित की आशा की जाती है। हर पद के अंत में एक ही पंक्ति दोहराकर कवि इस विचार को मन में बैठा देता है। इससे पता चलता है कि कवि के लिए परोपकार कोई अतिरिक्त गुण नहीं, बल्कि मनुष्य की पहचान ही है।
From the text: "वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे" और हर पद की अंतिम पंक्ति "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे"।
सुमृत्यु और मृत्यु से निर्भयता
कवि याद दिलाता है कि मनुष्य मरणशील है, इसलिए मृत्यु से डरना बेकार है। असली प्रश्न यह है कि मृत्यु कैसी हो। जो मृत्यु दूसरों के हित में हो और जिसके बाद लोग याद करें, वही सुमृत्यु है। कवि यह भी तर्क देता है कि शरीर नश्वर है पर जीव अनादि है, इसलिए नष्ट होने वाले शरीर के लिए डरना उचित नहीं। इससे पता चलता है कि कवि जीवन की लंबाई से अधिक उसके अर्थ को महत्व देता है।
From the text: "मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।" तथा "अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?"
त्याग और दान की परंपरा
कवि अपनी बात को केवल उपदेश नहीं रहने देता, बल्कि पौराणिक उदाहरणों से प्रमाणित करता है। रंतिदेव ने भूख से व्याकुल होते हुए भी हाथ का थाल दे दिया। दधीचि ने दूसरों के लिए अपनी हड्डियाँ दीं, जिनसे इंद्र का वज्र बना। राजा उशीनर ने अपना मांस और कर्ण ने अपने शरीर का चमड़ा दान किया। ये उदाहरण दिखाते हैं कि सच्चा त्याग अपनी सबसे प्रिय वस्तु, यहाँ तक कि शरीर, देने में भी नहीं हिचकता।
From the text: तीसरा पद: "क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी" और "सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया"।
सहानुभूति, दया और विनम्रता
कवि सहानुभूति को सबसे बड़ी पूँजी मानता है, क्योंकि इसी से पूरी धरती वश में की जा सकती है। बुद्ध का उदाहरण बताता है कि करुणा में इतनी शक्ति है कि विरोध करने पर भी लोग विनम्र होकर झुक जाते हैं। साथ ही कवि धन के घमंड और अपने को सनाथ समझने के गर्व से बचने को कहता है, क्योंकि ईश्वर सबके साथ है। इससे पता चलता है कि दया और विनम्रता एक-दूसरे से जुड़ी हैं; घमंडी व्यक्ति दूसरों का दुख नहीं समझ सकता।
From the text: "सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;" तथा "रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में"।
भाईचारा, एकता और परस्पर सहयोग
कवि कहता है कि सब मनुष्य भाई हैं, क्योंकि सबका पिता एक परमात्मा है। कर्मों के कारण बाहरी भेद दिखते हैं, पर भीतर आत्मा एक है। इसलिए भाई का दुख न हरना अनर्थ है। कवि सबको एक-दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ने, मेल-जोल बनाए रखने और भेदभाव न बढ़ाने की प्रेरणा देता है। समर्थ वही है जो दूसरों को भी पार लगाए। इससे पता चलता है कि कवि व्यक्तिगत सफलता को तभी सार्थक मानता है जब वह सामूहिक उन्नति से जुड़ी हो।
From the text: "परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी", "अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे" और "तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे"।
The speaker and the people in the poem
कवि (वक्ता)
कविता का वक्ता, जो मनुष्य को मनुष्यता के गुण समझाता है और उपदेश देता है।
- उपदेशक और मार्गदर्शक: 'विचार लो', 'चलो', 'उठो' जैसे आदेश देकर सीधे पाठक को समझाता है।
- निर्भीक दृष्टि: मृत्यु से न डरने और अनित्य देह की चिंता न करने को कहता है।
- परोपकार का समर्थक: पौराणिक दानियों के उदाहरण देकर त्याग को महान बताता है।
- समानता और एकता में विश्वास: 'मनुष्य मात्र बंधु है' को बड़ा विवेक मानता है।
- आस्थावान: मानता है कि 'त्रिलोकनाथ साथ हैं', इसलिए कोई अनाथ नहीं।
"विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी", "अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं" और सातवें पद में सब मनुष्यों को बंधु कहना।
संबोधित मनुष्य (पाठक)
जिसे कवि संबोधित करता है; हर साधारण मनुष्य, जिसे स्वार्थ छोड़कर मनुष्यता अपनानी है।
- मरणशील: कवि उसे याद दिलाता है कि वह मर्त्य है।
- घमंड में पड़ने की संभावना: उसे धन के मद और गर्व से सावधान किया जाता है।
- अधीर हो सकने वाला: कवि अधीरता को भाग्यहीनता कहकर उसे धैर्य सिखाता है।
- सक्षम: वह एक-दूसरे के सहारे उठकर देवताओं की गोद तक पहुँच सकता है।
"सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में", "अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो करे" और "परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी"।
उदार व्यक्ति और पौराणिक दानी (रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण, बुद्ध)
कवि द्वारा वर्णित आदर्श मनुष्य, जिनके उदाहरण से मनुष्यता का अर्थ स्पष्ट होता है।
- त्यागी: रंतिदेव ने भूख में भी हाथ का थाल दे दिया।
- परोपकारी: दधीचि ने दूसरों के लिए अपनी हड्डियाँ दीं।
- आत्म-बलिदानी: उशीनर ने अपना मांस और कर्ण ने शरीर-चर्म दान किया।
- करुणामय: बुद्ध ने दया के कारण पुरानी मान्यताओं का विरोध किया।
- यशस्वी: ऐसे उदार व्यक्ति को समस्त सृष्टि पूजती है।
"तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी", "उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया", "विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा" और "तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती"।
Poetic devices
| Device | Example | Effect |
|---|---|---|
| आवृत्ति / टेक (पुनरावृत्ति) | हर पद के अंत में: "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे" | एक ही पंक्ति की बार-बार आवृत्ति से कविता का केंद्रीय संदेश मन में बैठ जाता है और हर पद उसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। |
| मानवीकरण अलंकार | "उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती" और "उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती" | धरती को आभार मानती हुई और कीर्ति को कूजती हुई दिखाकर कवि उदार व्यक्ति के यश को सजीव और व्यापक बना देता है। |
| अनुप्रास अलंकार | "अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े" और "दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं" | 'अ' और 'द' वर्णों की आवृत्ति से पंक्तियों में संगीत और लय आती है, जिससे वे याद रखने में आसान बनती हैं। |
| प्रश्न अलंकार (भावपूर्ण प्रश्न) | "अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं" | प्रश्न पूछकर कवि स्वयं उत्तर देता है, जिससे यह विश्वास दृढ़ होता है कि ईश्वर सबके साथ है और घमंड या अधीरता का कोई कारण नहीं। |
| दृष्टांत / पौराणिक उदाहरण | "क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी" | रंतिदेव, दधीचि, उशीनर और कर्ण के उदाहरण उपदेश को प्रमाण देते हैं और त्याग की ऊँचाई को ठोस रूप में दिखाते हैं। |
| तुकांत छंद-योजना | "डरो कभी" के साथ "करें सभी"; "चरे" के साथ "मरे" | दो-दो पंक्तियों के तुकांत से कविता में प्रवाह और गेयता आती है; पाठ करते समय लय बनी रहती है। |
| तत्सम-प्रधान खड़ी बोली | "अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी" | संस्कृत के तत्सम शब्द भाषा को गंभीर और ओजपूर्ण बनाते हैं, जो उपदेशात्मक स्वर के अनुकूल है। |
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।
कवि: पहले पद में कवि मृत्यु से न डरने को कहकर सुमृत्यु का अर्थ समझाता है।
सुमृत्यु की परिभाषा: ऐसी मृत्यु जिसके बाद लोग आपके अच्छे कामों के कारण याद करें। जीवन का मूल्य उसके परोपकार से तय होता है।
वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे
कवि: पहले पद में स्वार्थी जीवन की तुलना पशु से की गई है।
मनुष्य और पशु का अंतर बताती है: केवल अपने लिए जीना पशु-स्वभाव है, दूसरों के लिए जीना मनुष्यता।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे
कवि: हर पद की अंतिम पंक्ति (टेक)।
कविता का केंद्रीय संदेश: सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के हित के लिए जीवन अर्पित कर दे।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?
कवि: तीसरे पद में दानियों के उदाहरणों के बाद।
शरीर नश्वर और आत्मा अनादि है; इसलिए परोपकार के लिए शरीर तक दे देने में डरना उचित नहीं।
सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
कवि: चौथे पद का आरंभ, जहाँ बुद्ध की करुणा का उदाहरण आता है।
सहानुभूति को सबसे बड़ी पूँजी कहा गया है, जिससे पूरी धरती को वश में किया जा सकता है।
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में
कवि: पाँचवें पद में गर्व-रहित जीवन की सीख।
धन को 'तुच्छ' कहकर कवि बताता है कि धन का घमंड मनुष्य को अंधा बना देता है; विनम्रता आवश्यक है।
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे
कवि: सातवें पद में 'मनुष्य मात्र बंधु है' के विचार के बाद।
यदि सब मनुष्य भाई हैं, तो एक-दूसरे का दुख दूर न करना सबसे बड़ा अनर्थ है।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे
कवि: अंतिम पद में एकता और सहयोग के उपदेश के बाद।
सच्ची सफलता की परिभाषा: दूसरों को आगे बढ़ाते हुए स्वयं आगे बढ़ना ही समर्थ होना है।
मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता in real life
Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
सुमृत्यु और मृत्यु से निर्भयता
कल्पना कीजिए आपके मोहल्ले के एक बुज़ुर्ग जीवन भर गरीब बच्चों को मुफ़्त पढ़ाते रहे। उनके निधन पर पूरा मोहल्ला इकट्ठा हुआ और हर कोई उनकी कोई न कोई भलाई याद कर रहा था।
'मनुष्यता' कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि उन बुज़ुर्ग की मृत्यु को 'सुमृत्यु' क्यों कहा जा सकता है।
Try it first, then show the solutionSolution
- सुमृत्यु वह है जिसके बाद सब व्यक्ति को याद करें।
- बुज़ुर्ग ने अपना जीवन दूसरों के लिए जिया।
- इसलिए उनकी मृत्यु व्यर्थ नहीं, सुमृत्यु है।
Answer: यह 'मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी' पंक्ति का उदाहरण है। बुज़ुर्ग ने दूसरों के लिए जीवन जिया, इसलिए उनकी मृत्यु सुमृत्यु बनी।
Memory hook: जिसे मोहल्ला याद करे, उसी की मृत्यु सुमृत्यु।
धन का गर्व न करना
मान लीजिए आपकी कक्षा का एक छात्र नया महँगा मोबाइल लेकर आता है और साधारण फ़ोन वाले साथियों का मज़ाक उड़ाता है। कुछ बच्चे उदास हो जाते हैं।
कविता की किस सीख के आधार पर आप उस छात्र को समझाएँगे? उत्तर कविता की पंक्ति सहित लिखिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- कवि धन को 'तुच्छ वित्त' कहता है।
- धन के मद में अंधा होना और गर्व करना मना है।
- सच्चा बड़प्पन दूसरों की सहायता में है, दिखावे में नहीं।
Answer: कवि कहता है, 'रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में'। धन तुच्छ है, उसका घमंड व्यर्थ है। सहायता देने वाला सच्चा मनुष्य है, दिखावा करने वाला नहीं।
Memory hook: महँगा फ़ोन तुच्छ वित्त है, सहायता सच्ची पूँजी।
भाईचारा और एकता
कल्पना कीजिए आपके विद्यालय की क्रिकेट टीम में अलग-अलग राज्यों और भाषाओं के बच्चे हैं। कुछ खिलाड़ी अपनी भाषा वालों का अलग गुट बनाकर दूसरों को गेंद ही नहीं देते।
'मनुष्यता' कविता के आधार पर बताइए कि टीम के कप्तान के रूप में आप इस स्थिति को कैसे सुधारेंगे।
Try it first, then show the solutionSolution
- कवि चाहता है कि मेलजोल घटे नहीं और भेद बढ़े नहीं।
- गुटबाज़ी से टीम कमज़ोर होती है।
- सबका एक लक्ष्य हो, सब मिलकर चलें।
Answer: कवि चाहता है 'घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी'। भाषा या क्षेत्र के आधार पर गुट बनाने से टीम कमज़ोर होगी; एक लक्ष्य पर सबको मिलकर खेलना चाहिए।
Memory hook: एक टीम, एक पंथ: हेलमेल बढ़े, भिन्नता घटे।
परस्परावलंब (एक-दूसरे का सहारा)
मान लीजिए बोर्ड परीक्षा से पहले चार दोस्त समूह बनाकर पढ़ते हैं। किसी को गणित अच्छा आता है, किसी को हिंदी व्याकरण, और वे एक-दूसरे को कठिन विषय समझाते हैं।
इस समूह-अध्ययन को 'मनुष्यता' कविता के संदेश से जोड़कर स्पष्ट कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- कवि एक-दूसरे के सहारे उठने और बढ़ने को कहता है।
- समूह में सबकी कमज़ोरी दूर होती है।
- दूसरों को पार लगाते हुए स्वयं पार होना ही समर्थ भाव है।
Answer: कविता कहती है, 'परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी'। समूह में एक-दूसरे के कठिन विषय समझाने से सबकी तैयारी सुधरेगी। यही 'तारता हुआ तरे' वाला समर्थ भाव है।
Memory hook: समूह-अध्ययन = तारता हुआ तरे।
Topics in this chapter
- मनुष्यता कविता का भावार्थ और व्याख्याComing soon
- मनुष्यता कविता के प्रश्न-उत्तरComing soon
- मनुष्यता कविता का केंद्रीय भाव और संदेशComing soon
- रंतिदेव, दधीचि, कर्ण के उदाहरण और परोपकारComing soon
- मनुष्यता कविता की काव्य-सौंदर्य और भाषाComing soon
How the board asks मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता
The question patterns to expect, and the method that works for each.
| Question type | How it is asked | Method |
|---|---|---|
| काव्यांश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्न (1×5) | कविता का एक पूरा पद देकर पाँच MCQ पूछे जाते हैं: किसी शब्द का अर्थ (जैसे अनादि, अभीष्ट), पंक्ति का भाव, कवि का संदेश, किसी दानी ने क्या दिया, या 'यह भाव किस पंक्ति में है'। | पहले पूरा काव्यांश ध्यान से पढ़ें और हर कठिन शब्द का अर्थ शब्दार्थ से जोड़ें। विकल्पों में वही चुनें जो पंक्ति के भाव से पूरी तरह मेल खाए, केवल मिलते-जुलते शब्दों वाला विकल्प नहीं। |
| कथन-कारण प्रश्न | काव्यांश के साथ 'कथन (A)' और 'कारण (R)' दिए जाते हैं, जैसे भेदभाव से ऊपर उठने या दूसरों के लिए जीने के बारे में; चार मानक विकल्पों में से सही चुनना होता है। | पहले जाँचें कि A और R अलग-अलग कविता के अनुसार सही हैं या नहीं। फिर देखें कि क्या R सचमुच A का कारण बताता है। दोनों सही होना और R का A की व्याख्या होना अलग-अलग बातें हैं। |
| पंक्ति का भाव या आशय (2 अंक, 25-30 शब्द) | 'तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे' या 'अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी' जैसी पंक्ति का आशय स्पष्ट करने को कहा जाता है। | पहले कठिन शब्दों का अर्थ एक वाक्य में खोलें, फिर पंक्ति का भाव और अंत में कवि का उद्देश्य लिखें। उत्तर 25-30 शब्दों में रखें, पंक्ति की नकल न करें। |
| कारण या उद्देश्य बताने वाले प्रश्न (2 अंक) | 'कवि ने गर्वरहित जीवन की सलाह क्यों दी है?', 'अखंड आत्म भाव रखने के क्या लाभ हैं?', 'कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी?' जैसे प्रश्न। | दो बिंदु दें: कविता में क्या कहा गया है और उसका कारण क्या है। एक छोटा प्रमाण (शब्द या पंक्ति का अंश) जोड़ें, जैसे 'त्रिलोकनाथ साथ हैं'। |
| पौराणिक उदाहरणों पर प्रश्न | रंतिदेव, दधीचि, उशीनर और कर्ण के दान का सुमेलन, या 'इन उदाहरणों से कवि क्या संदेश देता है?' | हर पात्र और उसका दान सही-सही याद रखें: रंतिदेव – हाथ का थाल, दधीचि – हड्डियाँ, उशीनर – अपना मांस, कर्ण – शरीर-चर्म। संदेश में त्याग, परोपकार और नश्वर शरीर का भय न करना लिखें। |
| केंद्रीय भाव या संदेश (2 अंक) | 'मनुष्यता कविता का मूल संदेश क्या है?' या 'कवि के अनुसार व्यक्ति को कैसा जीवन जीना चाहिए?' | परोपकार, सहानुभूति, गर्व का त्याग और एकता, इनमें से दो-तीन मुख्य बिंदु चुनकर एक जुड़ा हुआ उत्तर लिखें; अंत में टेक-पंक्ति का भाव जोड़ें। |
Tricks to remember मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
आठ पदों का क्रम: मृ-उ-दा-स-ग-दे-बं-च
वाक्य याद कीजिए: 'मृदु उदार दानी सहानुभूति से गर्व छोड़, देवों के बंधु बन चले।' क्रम है: मृत्यु (सुमृत्यु), उदार की कीर्ति, दानी (रंतिदेव आदि), सहानुभूति (बुद्ध), गर्व न करना, देवता भुजाएँ बढ़ाए, बंधु (मनुष्य मात्र बंधु), चलो अभीष्ट मार्ग में।
Use it when: काव्यांश पहचानने और यह बताने में कि कौन-सी पंक्ति कविता के किस भाग की है।
चार दानी: थाली से चमड़ी तक
दान बाहर की वस्तु से शुरू होकर शरीर तक पहुँचता है: रंतिदेव-थाल, दधीचि-हड्डियाँ, उशीनर-मांस, कर्ण-चमड़ी। बोलिए: 'थाल, हाड़, मांस, चाम'।
Use it when: सुमेलन (मिलान) वाले MCQ और दानियों पर पूछे गए 2 अंक के प्रश्नों में गलती से बचने के लिए।
विलोम जोड़ियाँ
मर्त्य (मरणशील) - अमर्त्य (देवता); पंक (कलंक) - अपंक (कलंक-रहित); नाथ - सनाथ - अनाथ; तर्क - अतर्क - सतर्क। एक शब्द याद होते ही दूसरे का अर्थ खुल जाता है।
Use it when: शब्दार्थ वाले MCQ और पंक्ति का भाव लिखते समय सही अर्थ के लिए।
टेक पंक्ति ही केंद्रीय भाव
हर पद का अंत 'वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे' से होता है। संदेश या केंद्रीय भाव पूछा जाए तो इसी पंक्ति को आधार बनाइए और पद का अपना उदाहरण जोड़ दीजिए।
Use it when: संदेश, प्रतिपाद्य और 'कवि क्या कहना चाहता है' वाले प्रश्नों में।
मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता: extract-based questions
Read the extract, answer every part on paper, then open the answers.
Extract 1: काव्यांश 1: सुमृत्यु और पशु-प्रवृत्ति
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
(1) · 1 mark · MCQ
'मर्त्य' होने की बात याद दिलाकर कवि मनुष्य को क्या सलाह देता है?
(क) मृत्यु से बचने के उपाय खोजने की
(ख) मृत्यु से न डरने और ऐसी मृत्यु पाने की कि सब याद करें
(ग) केवल अपने परिवार के लिए जीने की
(घ) संसार छोड़कर वन में रहने की(2) · 1 mark · MCQ
कवि के अनुसार यदि 'सुमृत्यु' न हो तो व्यक्ति का जीना-मरना कैसा है?
(क) सफल
(ख) सुखद
(ग) व्यर्थ
(घ) रहस्यमय(3) · 1 mark · MCQ
काव्यांश में 'पशु-प्रवृत्ति' किसे कहा गया है?
(क) जंगल में रहने को
(ख) केवल अपने लिए जीने और अपना ही पेट भरने को
(ग) मृत्यु से डरने को
(घ) दूसरों की सहायता करने को(4) · 1 mark · MCQ
'मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए' पंक्ति का आशय है—
(क) जो केवल अपने लिए जीता है, वह कभी नहीं मरता
(ख) जो केवल अपने लिए नहीं जिया, वह मरकर भी लोगों की यादों में जीवित रहता है
(ग) जो दूसरों के लिए जीता है, वह जल्दी मर जाता है
(घ) जो आपका आदर नहीं करता, वह मरा हुआ है(5) · 1 mark · Assertion-reason
निम्नलिखित कथन और कारण को पढ़कर सही विकल्प चुनिए—
कथन (A): कवि के अनुसार दूसरों के लिए जीने-मरने वाला ही सच्चा मनुष्य है।
कारण (R): पशु केवल अपने हिस्से का चरते हैं, जबकि मनुष्य में औरों के हित का ध्यान रखने की चेतना होती है।
(क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
(ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
(घ) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।
Show the answersAnswers
- (ख) मृत्यु से न डरने और ऐसी मृत्यु पाने की कि सब याद करें
- (ग) व्यर्थ
- (ख) केवल अपने लिए जीने और अपना ही पेट भरने को
- (ख) जो केवल अपने लिए नहीं जिया, वह मरकर भी लोगों की यादों में जीवित रहता है
- (क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
Extract 2: काव्यांश 2: मनुष्य मात्र बंधु है
‘मनुष्य मात्र बंधु है’ यही बड़ा विवेक है,
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद हैं,
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
(1) · 1 mark · MCQ
कवि ने सबसे बड़ा विवेक किसे माना है?
(क) धन कमाने की समझ को
(ख) सभी मनुष्यों को अपना भाई मानने को
(ग) वेदों को कंठस्थ करने को
(घ) अपने कर्म का फल पाने को(2) · 1 mark · MCQ
काव्यांश के अनुसार सभी मनुष्य आपस में बंधु क्यों हैं?
(क) सब एक ही देश में रहते हैं
(ख) सबका पिता एक ही परमात्मा (स्वयंभू) है
(ग) सबके कर्म एक जैसे हैं
(घ) सब एक ही भाषा बोलते हैं(3) · 1 mark · MCQ
कवि के अनुसार मनुष्यों में बाहरी भेद किस कारण दिखाई देते हैं?
(क) जन्म-स्थान के कारण
(ख) धन के कारण
(ग) कर्म के फल के अनुसार
(घ) ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध जाने के कारण(4) · 1 mark · MCQ
'परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं' पंक्ति का भाव है—
(क) वेद मनुष्यों के भेद सिद्ध करते हैं
(ख) वेद आत्मा की एकता के साक्षी हैं
(ग) वेद केवल विद्वानों के लिए हैं
(घ) वेदों में कर्मफल का विरोध है(5) · 1 mark · MCQ
कवि 'अनर्थ' किसे मानता है?
(क) बाहरी भेदों को
(ख) कर्म के फल को
(ग) भाई द्वारा भाई का दुख दूर न करने को
(घ) वेदों को न पढ़ने को
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- (ख) सभी मनुष्यों को अपना भाई मानने को
- (ख) सबका पिता एक ही परमात्मा (स्वयंभू) है
- (ग) कर्म के फल के अनुसार
- (ख) वेद आत्मा की एकता के साक्षी हैं
- (ग) भाई द्वारा भाई का दुख दूर न करने को
मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता: board-level solved questions
Ordered from board level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.
Example 1: पशु-प्रवृत्ति और सच्चा मनुष्य · 2 marks · Short answerBoard level
'मनुष्यता' कविता में कवि ने 'पशु-प्रवृत्ति' किसे कहा है और सच्चे मनुष्य को उससे कैसे अलग बताया है?
Try it first, then show the solutionSolution
- 'आप आप ही चरे' अर्थात केवल अपने लिए जीना, अपना ही पेट भरना पशु-प्रवृत्ति है।
- सच्चा मनुष्य वह है जो दूसरों के हित के लिए जिए।
- आवश्यकता पड़ने पर वह दूसरों के लिए प्राण भी दे देता है: 'जो मनुष्य के लिए मरे'।
Answer: कवि के अनुसार केवल अपना ही पेट भरना पशु-प्रवृत्ति है। सच्चा मनुष्य वह है जो दूसरों के हित के लिए जिए और उनके लिए प्राण भी दे दे।
Example 2: चार दानियों का समान गुण · 2 marks · Short answerHarder board level
रंतिदेव, दधीचि, उशीनर और कर्ण के उदाहरणों में कौन-सा गुण समान है? 'अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?' पंक्ति इनसे कैसे जुड़ती है?
Try it first, then show the solutionSolution
- समान गुण: परहित के लिए सर्वस्व त्याग।
- रंतिदेव ने भूख से व्याकुल होकर भी हाथ का थाल, दधीचि ने अस्थियाँ, उशीनर ने अपना मांस, कर्ण ने शरीर-चर्म दिया।
- शरीर अनित्य (नश्वर) है, आत्मा अनादि है; इसलिए देह के नष्ट होने का डर व्यर्थ है।
Answer: चारों में परहित के लिए सर्वस्व-त्याग समान है: रंतिदेव ने थाल, दधीचि ने अस्थियाँ, उशीनर ने मांस, कर्ण ने शरीर-चर्म दिया। आत्मा अनादि है, नश्वर देह का डर व्यर्थ है।
Example 3: बुद्ध का उदाहरण और सहानुभूति · 2 marks · Short answerHarder board level
कवि ने बुद्ध के उदाहरण से सहानुभूति की शक्ति कैसे सिद्ध की है?
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- बुद्ध ने करुणावश उस समय की पारंपरिक मान्यताओं का विरोध किया।
- फिर भी विनम्र जनसमूह उनके सामने झुका रहा।
- निष्कर्ष: सहानुभूति 'महाविभूति' (सबसे बड़ी पूँजी) है, इससे धरती वश में हो जाती है।
Answer: बुद्ध ने करुणावश पारंपरिक मान्यताओं का विरोध किया, फिर भी विनम्र जनसमूह उनके आगे झुका रहा। अतः सहानुभूति ही सबसे बड़ी पूँजी है; इससे धरती वश में होती है।
Example 4: भुजाएँ बढ़ाए देवता · 2 marks · Short answerHarder board level
'अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े' वाले पद में कवि ने देवताओं के भुजाएँ बढ़ाने का चित्र किस उद्देश्य से खींचा है?
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- अनंत आकाश में अनगिनत देवता सामने ही अपनी भुजाएँ बढ़ाए खड़े हैं।
- कवि सबको 'परस्परावलंब' अर्थात एक-दूसरे के सहारे से आगे बढ़ने को कहता है।
- ऐसे लोग 'अपंक' (कलंक-रहित) होकर 'अमर्त्य-अंक' (देवताओं की गोद) पाते हैं; यह चित्र प्रेरणा देने के लिए है।
Answer: अनंत आकाश में देवता अपनी भुजाएँ बढ़ाए खड़े हैं। इस चित्र से कवि प्रेरणा देता है कि परस्पर सहारे से आगे बढ़ो और कलंक-रहित होकर देवताओं की गोद पाओ।
Example 5: नोट्स न बाँटने वाला छात्र · 2 marks · Short answerHOTS / competency
मान लीजिए कक्षा का एक मेधावी छात्र अपने नोट्स किसी साथी को नहीं देता और कहता है, 'मुझे दूसरों से क्या?' 'मनुष्यता' कविता के आधार पर उसके व्यवहार का मूल्यांकन कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- केवल अपने लिए जीना कविता में पशु-प्रवृत्ति कहा गया है।
- कवि के अनुसार 'तारता हुआ तरे' ही समर्थ भाव है: दूसरों को पार लगाते हुए स्वयं पार होना।
- अपना मत: साथियों की सहायता से उसका अपना ज्ञान भी पक्का होगा।
Answer: कविता के अनुसार केवल अपने लिए जीना पशु-प्रवृत्ति है। उस छात्र को समझना चाहिए कि 'तारता हुआ तरे' ही समर्थ भाव है; साथियों की मदद से उसका ज्ञान भी बढ़ेगा।
Example 6: प्रतियोगी युग में परस्परावलंब · 2 marks · Short answerHOTS / competency
आज के प्रतियोगी युग में 'परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी' का संदेश कितना व्यावहारिक है? तर्क सहित लिखिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- स्पष्ट मत देना: संदेश व्यावहारिक है।
- तर्क: प्रतियोगिता में भी कोई अकेला आगे नहीं बढ़ता; परिवार, शिक्षक, साथियों का सहारा चाहिए।
- कविता से जोड़: कवि चाहता है कि एक से दूसरे का काम सरे, कोई अकेला न रहे।
Answer: यह संदेश पूरी तरह व्यावहारिक है। प्रतियोगिता में भी कोई अकेला नहीं बढ़ता; परिवार, शिक्षक और साथियों का सहारा चाहिए। कवि चाहता है कि एक से दूसरे का काम सरे।
Where the marks are
How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.
'मनुष्य मात्र बंधु है' को कवि सबसे बड़ा विवेक क्यों मानता है? (25-30 शब्द) (2 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| सभी मनुष्यों का पिता एक ही परमात्मा (पुराणपुरुष स्वयंभू) है, इसलिए सब भाई हैं। | 1 |
| बाहरी भेद कर्मफल के कारण हैं, भीतर आत्मा एक है (वेद इसके साक्षी हैं)। | 0.5 |
| इसलिए भाई का दुख दूर करना कर्तव्य है; ऐसा न करना अनर्थ है। | 0.5 |
काव्यांश ('मनुष्य मात्र बंधु है' वाला पद) पर आधारित पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (1×5) (5 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| प्रश्न 1: सबसे बड़ा विवेक पहचानना, सही विकल्प क्रमांक और पाठ सहित | 1 |
| प्रश्न 2: सबके बंधु होने का कारण (एक ही परमात्मा पिता) | 1 |
| प्रश्न 3: बाहरी भेदों का कारण (कर्म का फल) | 1 |
| प्रश्न 4: 'अंतरैक्य' और 'प्रमाणभूत' का सही अर्थ लेकर पंक्ति का भाव | 1 |
| प्रश्न 5 (या कथन-कारण): दोनों कथनों की सत्यता अलग-अलग जाँचकर, फिर व्याख्या का संबंध देखकर सही विकल्प | 1 |
Where students lose marks in मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: दानियों और उनके दान का गलत मिलान
चारों नाम एक ही पद में आते हैं, इसलिए जल्दी में दान आपस में बदल जाते हैं।
Wrong working
कर्ण ने अपना मांस दान किया और उशीनर ने शरीर का चर्म दिया।
Right working
उशीनर (गंधार के राजा) ने स्वमांस दान किया और कर्ण ने शरीर-चर्म दिया।
Do this: 'थाल, हाड़, मांस, चाम' का क्रम याद रखें: रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण।
Usually costs: MCQ में पूरा 1 अंक; 2 अंक के उत्तर में 1 अंक तक।
Mistake: 'सनाथ जान आपको' में 'आपको' को आदरसूचक मान लेना
आज की बोलचाल में 'आप' सम्मान के लिए आता है, पर कविता में 'आप' का अर्थ 'स्वयं' है।
Wrong working
कवि कहता है कि आपको सनाथ जानकर किसी को गर्व नहीं करना चाहिए।
Right working
अपने को (स्वयं को) सनाथ समझकर मन में गर्व नहीं करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर सबके साथ है।
Do this: 'आप आप ही चरे' और 'जिया न आपके लिए' में भी 'आप' = स्वयं पढ़ें।
Usually costs: पंक्ति के भाव वाले 2 अंक के प्रश्न में 1 से 2 अंक।
Mistake: पंक्ति का भाव पूछने पर पूरी कविता का सार लिख देना
विद्यार्थी रटा हुआ केंद्रीय भाव लिख देते हैं और पूछी गई पंक्ति पर बात ही नहीं करते।
Wrong working
'तारता हुआ तरे' प्रश्न पर: कविता में कवि ने परोपकार, दान, एकता और दया का संदेश दिया है।
Right working
दूसरों को पार लगाते हुए स्वयं पार होना ही समर्थ भाव है; अपनी उन्नति के साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाना चाहिए।
Do this: उत्तर का पहला वाक्य उसी पंक्ति के शब्दों का अर्थ हो, फिर एक वाक्य में संदेश।
Usually costs: 2 में से 1 अंक तक।
Mistake: 25-30 शब्दों की सीमा से बहुत आगे लिख देना
सब कुछ लिख देने के डर से उत्तर 60-70 शब्द का हो जाता है, समय भी जाता है और मुख्य बिंदु दब जाता है।
Wrong working
दधीचि के उदाहरण पर इंद्र, वज्र, असुर आदि की लंबी कथा लिखना, जो कविता में दी ही नहीं गई।
Right working
दधीचि ने परहित के लिए अपना अस्थिजाल दे दिया; इससे सीख मिलती है कि नश्वर देह का मोह छोड़कर परोपकार करना चाहिए।
Do this: दो मूल्य-बिंदु, दो-तीन वाक्य, लगभग 30 शब्द। कविता से बाहर की कथा न जोड़ें।
Usually costs: शब्द-सीमा और प्रासंगिकता के कारण आधा से 1 अंक।
Mistake: 'मर्त्य', 'अपंक', 'अतर्क' जैसे शब्दों का उलटा अर्थ
'अ' उपसर्ग वाले शब्दों में भ्रम हो जाता है।
Wrong working
'विचार लो कि मर्त्य हो' का अर्थ: तुम अमर हो, इसलिए मृत्यु से मत डरो।
Right working
तुम मरणशील हो, मृत्यु निश्चित है; इसलिए उससे डरो मत, बल्कि ऐसी मृत्यु पाओ कि सब याद करें।
Do this: मर्त्य = मरणशील, अमर्त्य = देवता; अपंक = कलंक-रहित; अतर्क = तर्क से परे।
Usually costs: MCQ में 1 अंक; भाव वाले प्रश्न में 1 अंक।
मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता: previous year questions
- Course A: Asked in 1 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.2 marks per paper; 1 questions in all, counting OR alternatives. In 0 of 4 sample papers.
- Course B: Asked in 8 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 1.7 marks per paper; 8 questions in all, counting OR alternatives. In 1 of 4 sample papers.
Counted from the real papers on our previous year papers page, not estimated. Average marks are over every board paper we hold, with an OR pair counted once. Chapter tags are ours.
Solved board questions from मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता
Real questions from recent papers. Try each one first, then open our step-by-step solution with marks per step.
2026 Course B, set 4/3/1, Q9 · 5 marks · Reading comprehensionCompetency-based
निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्पों का चयन करके लिखिए : 5×1=5
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
- (i)1 mark
मनुष्य की वास्तविक सफलता क्या है ?
- (A)सिर्फ स्वयं का उत्थान
- (B)सिर्फ समाज का उत्थान
- (C)स्वयं के साथ समाज का उत्थान
- (D)साथ चलने वालों का उत्थान
- (ii)1 mark
इच्छित मार्ग की ओर कैसे बढ़ना चाहिए ?
- (A)तेज़ी के साथ
- (B)शांति के साथ
- (C)खुशी के साथ
- (D)गर्व के साथ
- (iii)1 mark
जीवन-पथ पर आगे बढ़ते हुए किस बात का ध्यान रखना चाहिए ?
- (A)हर तरह के लोगों के साथ मिल-जुलकर आगे बढ़ना।
- (B)स्वयं से अधिक दूसरों के सामर्थ्य पर भरोसा करना।
- (C)पथ में सिर्फ समान विचारधारा वाले लोगों को साथ लेना।
- (D)भिन्न विचार रखने वालों से दूर रहने का प्रयास करना।
- (iv)1 mark
'मानव जीवन की सार्थकता स्वयं के साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाने में है' – यह भाव किस पंक्ति में है ?
- (A)घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी
- (B)अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी
- (C)तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे
- (D)वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे
- (v)1 mark
निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनकर लिखिए :
कथन : हर तरह के भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्र का विकास करना चाहिए।
कारण : सम्मिलित प्रयास से हुआ विकास अस्थाई प्रकृति का होता है।
विकल्प :- (A)कथन और कारण दोनों ग़लत हैं।
- (B)कथन ग़लत है, लेकिन कारण सही है।
- (C)कथन और कारण दोनों सही हैं और कारण, कथन की सही व्याख्या करता है।
- (D)कथन सही है, लेकिन कारण, कथन की ग़लत व्याख्या करता है।
Try it first, then show our solutionSolution
- 1 mark
(i) कवि के अनुसार स्वयं के साथ समाज का उत्थान ही वास्तविक सफलता है। अतः (C)।
- 1 mark
(ii) 'सहर्ष खेलते हुए' अर्थात खुशी के साथ। अतः (C)।
- 1 mark
(iii) 'घटे न हेलमेल, बढ़े न भिन्नता' से हर तरह के लोगों के साथ मिल-जुलकर चलना भाव है। अतः (A)।
- 1 mark
(iv) 'तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे' में खुद तरने के साथ दूसरों को तारने का भाव है। अतः (C)।
- 1 mark
(v) कथन सही है, किंतु कारण गलत है क्योंकि सम्मिलित प्रयास से विकास स्थायी होता है, इसलिए कारण कथन की गलत व्याख्या करता है। अतः (D)।
Answer: (i) C; (ii) C; (iii) A; (iv) C; (v) D
Where the marks are
- प्रत्येक सही विकल्प 1 अंक (कुल 5 अंक)
2026 Course B, set 4/4/1, Q10 · 6 marks · Reading comprehension
निर्धारित कविताओं के आधार पर निम्नलिखित चार प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर लगभग 25-30 शब्दों में लिखिए : 3 × 2 = 6
- (i)2 marks
'मनुष्यता' कविता के आधार पर लिखिए कि 'अखंड आत्म भाव' रखने के क्या लाभ हैं?
- (ii)2 marks
'साखी' में कबीर ने प्रभु प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा किसे और क्यों बताया है?
- (iii)2 marks
'आत्म त्राण' कविता के संदर्भ में लिखिए कि संकट में अपनों का साथ न मिलने तथा उनसे छले जाने पर भी कवि संकट का सामना कैसे करना चाहता है?
- (iv)2 marks
'कर चले हम फ़िदा' कविता से उद्धृत 'राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियों' पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Try it first, then show our solutionSolution
- 2 marks
(i) अखंड आत्म भाव से सहानुभूति, दया, परोपकार और उदारता जैसे गुण विकसित होते हैं। भेदभाव से ऊपर उठकर विश्व-बंधुत्व की भावना आती है।
- 2 marks
(ii) कबीर ने अहंकार को सबसे बड़ी बाधा बताया है। अहंकार रहते ईश्वर नहीं मिलते, क्योंकि 'मैं' और प्रभु एक साथ नहीं रह सकते। अहंकार मिटने पर ही प्रभु दिखाई देते हैं।
- 2 marks
(iii) कवि अपने साहस और पुरुषार्थ पर भरोसा करके निर्भयता से संकट का सामना करना चाहता है। वह सुख-दुख में समान रहकर किसी का सहारा नहीं माँगता, केवल ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखता है।
- 2 marks
(iv) कवि देशवासियों को राम-लक्ष्मण के रूप में संबोधित करता है। जैसे उन्होंने सीता की रक्षा की, वैसे ही सैनिक चाहते हैं कि देशवासी दुश्मनों से सीता-रूपी मातृभूमि की मान-मर्यादा की रक्षा करें।
Answer: किन्हीं तीन उप-प्रश्नों के उत्तर ऊपर दिए गए हैं।
Where the marks are
- (i) सहानुभूति, दया, उदारता, विश्व-बंधुत्व (2 अंक)
- (ii) बाधा: अहंकार; कारण स्पष्ट (1+1 अंक)
- (iii) साहस, पुरुषार्थ, निर्भयता, ईश्वर पर विश्वास (2 अंक)
- (iv) देशवासी राम-लक्ष्मण, मातृभूमि रूपी सीता की रक्षा (2 अंक)
2024 Course B, set 4/2/1, Q8 · 2 marks · MCQ
काव्य-खंड पर आधारित निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर देने के लिए सर्वाधिक उचित उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए :
- (i)1 mark
'मनुष्यता' कविता से उद्धृत – "तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे" – पंक्ति का भाव है –
- (A)सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की रक्षा करनी चाहिए।
- (B)मानव जीवन की सार्थकता सबको साथ लेकर चलने में है।
- (C)अपनी ही उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए।
- (D)सामर्थ्य के अनुसार तैरने वाले व्यक्ति की रक्षा करनी चाहिए।
- (ii)1 mark
'कर चले हम फिदा' कविता में किसका हाथ तोड़ने की बात कही गई है ?
- (A)सीता का दामन छूने वाले पापियों की
- (B)धरती माता की पवित्रता नष्ट करने वालों की
- (C)सीता का अपहरण करने वाले रावण की
- (D)देश सेवा से पीछे हटने वाले कायरों की
Try it first, then show our solutionSolution
- 1 mark
(i) 'तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे' का भाव है कि सच्चा समर्थ वही है जो स्वयं आगे बढ़ते हुए दूसरों को भी साथ लेकर चले और उनका उद्धार करे। अतः मानव जीवन की सार्थकता सबको साथ लेकर चलने में है। उत्तर: (B)।
- 1 mark
(ii) 'तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे, छू न पाए सीता का दामन कोई' में 'सीता का दामन' भारत माता (धरती माता) की मर्यादा और पवित्रता का प्रतीक है। अतः धरती माता की पवित्रता नष्ट करने के लिए उठने वाले शत्रुओं के हाथ तोड़ देने की बात कही गई है। उत्तर: (B)।
Answer: (i) B; (ii) B
Where the marks are
- (i) सही विकल्प (B) – मानव जीवन की सार्थकता सबको साथ लेकर चलने में है (1 अंक)
- (ii) सही विकल्प (B) – धरती माता की पवित्रता नष्ट करने वालों की (1 अंक)
- (2 marks)
Every मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता question, by year
Course B (9 questions, sample papers included)
- For 2025
Sample paper 2024-25: Q9 (5 marks, solved)
Practice questions on मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 2 marks · Short answerBoard level
कवि के अनुसार उदार व्यक्ति को कौन-कौन किस प्रकार सम्मान देते हैं?
Hint
'उसी उदार...' से शुरू होने वाली चारों पंक्तियाँ एक-एक करके देखिए।
Answer
मूल्य-बिंदु: सरस्वती उसकी कथा कहती है; धरती कृतार्थ होती है; उसकी कीर्ति सदा गूँजती है; समस्त सृष्टि उसे पूजती है।
आदर्श उत्तर: उदार व्यक्ति की कथा सरस्वती बखानती है, धरती उसके प्रति कृतार्थ भाव मानती है, उसकी जीवित कीर्ति सदा गूँजती है और समस्त सृष्टि उसकी पूजा करती है।
Q2 · 1 mark · MCQBoard level
कविता में उल्लिखित 'उशीनर' कौन थे और उन्होंने क्या दान किया?
(क) गंधार देश के राजा, जिन्होंने अपने शरीर का मांस दान किया
(ख) परम दानी राजा, जिन्होंने भूखे रहकर हाथ का थाल दे दिया
(ग) प्रसिद्ध ऋषि, जिनकी हड्डियों से इंद्र का वज्र बना
(घ) कुंती पुत्र, जिन्होंने शरीर-चर्म दान कियाHint
'क्षितीश' का अर्थ राजा है और 'स्वमांस' का अर्थ अपना मांस।
Answer
(क) गंधार देश के राजा, जिन्होंने अपने शरीर का मांस दान किया
Q3 · 2 marks · Short answerHarder board level
'अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं' कहकर कवि किस प्रकार के गर्व को तोड़ना चाहता है?
Hint
इससे ठीक पहले की पंक्ति 'सनाथ जान आपको...' से जोड़िए; 'आपको' का अर्थ यहाँ 'स्वयं को' है।
Answer
मूल्य-बिंदु: लोग धन और सहारे के कारण स्वयं को सनाथ मानकर घमंड करते हैं; ईश्वर सबके साथ है, कोई अनाथ नहीं; अतः धन का गर्व व्यर्थ है।
आदर्श उत्तर: लोग धन और सहारे के कारण स्वयं को सनाथ मानकर घमंड करते हैं। कवि कहता है कि ईश्वर सबके साथ है, कोई अनाथ नहीं, इसलिए धन का गर्व व्यर्थ है।
Q4 · 2 marks · Short answerHarder board level
कवि ने अधीर भाव रखने वाले व्यक्ति को 'अतीव भाग्यहीन' क्यों कहा है?
Hint
'दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं' पंक्ति से कारण निकालिए।
Answer
मूल्य-बिंदु: दीनबंधु ईश्वर के हाथ विशाल हैं, वे सबके साथ हैं; फिर भी जो धैर्य खोता है, वह ईश्वर पर भरोसा नहीं करता; इसलिए वह अभागा है।
आदर्श उत्तर: दीनबंधु ईश्वर के हाथ विशाल हैं और वे सबके साथ हैं। ऐसे में जो व्यक्ति धैर्य खोकर घबराता है, वह ईश्वर पर भरोसा न करने के कारण सचमुच अभागा है।
Q5 · 1 mark · Assertion-reasonHarder board level
निम्नलिखित कथन और कारण को पढ़कर सही विकल्प चुनिए—
कथन (A): कवि चाहता है कि सभी मनुष्य कलंक-रहित होकर 'अमर्त्य-अंक' में चढ़ें।
कारण (R): कवि के अनुसार केवल अपने अकेले बल पर आगे बढ़ने वाला ही देवत्व पाता है।
(क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
(ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
(घ) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।Hint
कवि अकेले बढ़ने को कहता है या 'परस्परावलंब' से?
Answer
(ग) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है। कवि अकेले नहीं, 'परस्परावलंब' अर्थात एक-दूसरे के सहारे से उठने और बढ़ने को कहता है।
Q6 · 2 marks · Short answerHarder board level
'चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए' पंक्ति में 'खेलते हुए' शब्द जीवन के प्रति कवि का कैसा दृष्टिकोण दिखाते हैं?
Hint
सोचिए, खेल में बाधा आने पर खिलाड़ी कैसा व्यवहार करता है।
Answer
मूल्य-बिंदु: जीवन-पथ पर हर्ष और सहजता से चलना; विपत्ति-विघ्न को बोझ न मानना; उन्हें खेल की तरह ढकेलते हुए आगे बढ़ना।
आदर्श उत्तर: 'खेलते हुए' से पता चलता है कि कवि जीवन-पथ पर सहर्ष, सहज भाव से चलने को कहता है। विपत्तियों को बोझ न मानकर खेल-खेल में ढकेलते हुए बढ़ना चाहिए।
Q7 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
मान लीजिए आपके मोहल्ले में बाढ़ आई है और कुछ लोग केवल अपना सामान बचाने में लगे हैं। 'मनुष्यता' कविता की किन सीखों के आधार पर आप उन्हें समझाएँगे?
Hint
'पशु-प्रवृत्ति' और 'बंधु की व्यथा' वाली दोनों बातें जोड़िए।
Answer
मूल्य-बिंदु: केवल अपने लिए जीना पशु-प्रवृत्ति है; बंधु की व्यथा न हरना अनर्थ है; दूसरों की रक्षा करने वाला ही सच्चा मनुष्य है।
आदर्श उत्तर: मैं उन्हें समझाऊँगा कि केवल अपने लिए जीना पशु-प्रवृत्ति है। कवि के अनुसार बंधु की व्यथा न हरना अनर्थ है; पड़ोसियों को बचाने वाला ही सच्चा मनुष्य कहलाता है।
Q8 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
कवि ने हर पद के अंत में 'वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे' पंक्ति दोहराई है। इस आवृत्ति के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
Hint
हर पद का विषय अलग है (मृत्यु, दान, गर्व, एकता), पर अंत एक है। इससे क्या होता है?
Answer
मूल्य-बिंदु: टेक पंक्ति हर पद को केंद्रीय संदेश से जोड़ती है; दोहराव से परोपकार का भाव मन में बैठता है; कविता में लय आती है।
आदर्श उत्तर: यह टेक पंक्ति हर पद के उदाहरण को एक केंद्रीय संदेश से जोड़ती है। दोहराने से परोपकार का भाव मन में बैठ जाता है और कविता में लय आती है।
Test your recall
Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.
1.'मर्त्य' शब्द का अर्थ क्या है?Show answer
मरणशील, जिसकी मृत्यु निश्चित है।
2.भूख से व्याकुल होकर भी अपने हाथ का थाल किसने दे दिया?Show answer
परम दानी राजा रंतिदेव ने।
3.दधीचि ने परहित के लिए क्या दिया?Show answer
अपना अस्थिजाल (हड्डियों का समूह); शब्दार्थ के अनुसार उनकी हड्डियों से इंद्र का वज्र बना।
4.उशीनर और कर्ण ने क्या दान किया?Show answer
उशीनर (गंधार के राजा) ने स्वमांस; कर्ण (कुंती पुत्र) ने सहर्ष शरीर-चर्म।
5.कवि ने 'महाविभूति' किसे कहा है?Show answer
सहानुभूति को, जिससे पूरी धरती वश में रहती है।
6.पशु-प्रवृत्ति वाली पंक्ति कौन-सी है?Show answer
'वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे'
7.'अमर्त्य-अंक' और 'अपंक' का अर्थ?Show answer
अमर्त्य-अंक = देवता की गोद; अपंक = कलंक-रहित।
8.'तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे' का आशय?Show answer
दूसरों को पार लगाते हुए स्वयं पार होना, अर्थात सबको साथ लेकर आगे बढ़ना ही सच्ची सामर्थ्य है।
Quick revision checklist
The night before the exam: can you do each of these without looking?
- क्या आप बिना देखे बता सकते हैं कि कवि किस मृत्यु को सुमृत्यु कहता है और कब जीना-मरना व्यर्थ है?
- क्या आप चारों दानियों के नाम उनके दान के साथ सही क्रम में बोल सकते हैं?
- क्या आप बता सकते हैं कि उदार व्यक्ति को सरस्वती, धरती, कीर्ति और सृष्टि किस प्रकार सम्मान देती हैं?
- क्या आप बुद्ध के उदाहरण से सहानुभूति को 'महाविभूति' सिद्ध कर सकते हैं?
- क्या आप 'सनाथ जान आपको' में 'आप' का सही अर्थ और धन के गर्व पर कवि की सीख लिख सकते हैं?
- क्या आप 'मनुष्य मात्र बंधु है' के पक्ष में कवि के दो तर्क (एक पिता, आत्मा की एकता) बता सकते हैं?
- क्या आप 'अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ' और 'तारता हुआ तरे' का भाव 30 शब्दों में लिख सकते हैं?
मैथिलीशरण गुप्त – मनुष्यता: frequently asked questions
'मनुष्यता' कविता किसने लिखी है और यह किस पुस्तक में है?
'मनुष्यता' कविता मैथिलीशरण गुप्त ने लिखी है। यह CBSE हिंदी पाठ्यक्रम-ब की पुस्तक स्पर्श भाग 2 के पद्य खंड का पाठ है। गुप्त जी अपने जीवनकाल में ही राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध हुए।
कवि ने किस मृत्यु को सुमृत्यु कहा है?
कवि के अनुसार सुमृत्यु वह है जिसके बाद सब लोग व्यक्ति को याद करें। ऐसी मृत्यु उसी की होती है जो दूसरों के हित के लिए जिया हो। जो केवल अपने लिए जिया, उसका जीना और मरना दोनों व्यर्थ हैं।
'अखंड आत्म भाव' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है पूरे संसार के प्रति अपनेपन और एकता का भाव रखना, यानी सबको अपने जैसा मानना। कवि कहता है कि जो यह भाव असीम विश्व में भर दे, वही सच्चा उदार मनुष्य है। ऐसे व्यक्ति को धरती आभार मानती है और सृष्टि पूजती है।
'तारता हुआ तरे' पंक्ति का क्या भाव है?
इसका भाव है कि सच्चा समर्थ व्यक्ति वह है जो दूसरों को आगे बढ़ाते हुए, उन्हें संकट से पार लगाते हुए स्वयं भी आगे बढ़े। कवि अकेले की सफलता को नहीं, सबके साथ मिलकर बढ़ने को सार्थक मानता है।
कवि ने गर्व न करने की सलाह क्यों दी है?
कवि कहता है कि धन तुच्छ है और उसके घमंड में अंधा होना गलत है। स्वयं को सनाथ मानकर गर्व करना भी व्यर्थ है, क्योंकि यहाँ कोई अनाथ नहीं; ईश्वर सबके साथ है। घमंड मनुष्य को दूसरों के दुख से दूर कर देता है।
इस कविता में मुख्य अलंकार कौन-से हैं?
इसमें अनुप्रास (जैसे 'अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव'), मानवीकरण (सरस्वती का कथा बखानना, धरा का कृतार्थ भाव मानना) और प्रश्न अलंकार ('अनाथ कौन है यहाँ?') प्रमुख हैं। हर पद के अंत में टेक-पंक्ति की आवृत्ति भी ध्यान देने योग्य है।
Based on: CBSE हिंदी पाठ्यक्रम-ब (085), कक्षा 10, 2026-27; NCERT स्पर्श भाग 2 (Reprint 2026-27), मनुष्यता