नौबतखाने में इबादत Class 10: सार, चरित्र-चित्रण और मूल भाव
Updated 14 October 2026 · Fact-checked
'नौबतखाने में इबादत' यतींद्र मिश्र द्वारा लिखा गया व्यक्ति-चित्र है। इसमें शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना, सादगी, काशी-प्रेम और गंगा-जमुनी संस्कृति का चित्रण है। CBSE बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से पठित गद्यांश पर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (कथन-कारण सहित) और 25-30 शब्दों वाले 2 अंक के प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
What यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत is about
'नौबतखाने में इबादत' क्षितिज भाग 2 के गद्य खंड का पाठ 11 है। इसके लेखक यतींद्र मिश्र हैं। यह प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर लिखा गया व्यक्ति-चित्र है। इसमें उनके बचपन, रुचियों, संगीत की लगन और काशी से गहरे लगाव का वर्णन है। पाठ बताता है कि संगीत एक आराधना है, जिसके लिए अभ्यास, धैर्य और तन्मयता ज़रूरी है।
बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से दो तरह से प्रश्न आ सकते हैं। पहला, प्रश्न 7 में पठित गद्यांश देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (1×5) पूछे जाते हैं, जिनमें कथन-कारण प्रश्न भी होता है। दूसरा, प्रश्न 8 में गद्य पाठों पर 25-30 शब्दों वाले प्रश्न आते हैं, जिनमें से हर प्रश्न 2 अंक का होता है। इसलिए पाठ की घटनाएँ, बिस्मिल्ला खाँ की विशेषताएँ और काशी की संस्कृति अच्छी तरह याद होनी चाहिए।
In real board papers: Course A, asked in 5 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 1.2 marks per paper; Course B, not asked in any of the 21 board papers we hold (2023 to 2026). See the questions
यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत: summary
In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.
पाठ सन् 1916 से 1922 के आसपास की काशी से शुरू होता है। पंचगंगा घाट पर बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी है और वहाँ के नौबतखाने से रोज़ मंगलध्वनि निकलती है। छः साल का अमीरुद्दीन अपने बड़े भाई शम्सुद्दीन के साथ ननिहाल काशी आया है। उसके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श प्रसिद्ध शहनाई वादक हैं। यही अमीरुद्दीन आगे चलकर उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ बने।
बिस्मिल्ला खाँ का जन्म डुमराँव (बिहार) में हुआ। डुमराँव शहनाई के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शहनाई की रीड नरकट घास से बनती है, जो वहाँ सोन नदी के किनारे मिलती है। चौदह वर्ष की उम्र में वे रियाज़ के लिए बालाजी मंदिर जाते थे। रास्ते में रसूलनबाई और बतूलनबाई का गायन सुनकर उनके मन में संगीत के प्रति लगाव जागा।
लेखक शहनाई का इतिहास भी बताता है। इसे सुषिर-वाद्य माना जाता है और 'शाहेनय' यानी सुषिर वाद्यों में शाह कहा गया है। बिस्मिल्ला खाँ अस्सी बरस तक नमाज़ के बाद खुदा से एक सच्चा सुर माँगते रहे।
मुहर्रम के दस दिनों में उनके खानदान में शहनाई नहीं बजती। आठवीं तारीख को वे दालमंडी से फातमान तक लगभग आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए नौहा बजाते थे। बचपन में वे नाना की 'मीठी शहनाई' ढूँढ़ते थे, मामू के सम पर आने पर पत्थर पटककर दाद देते थे। उन्हें सुलोचना की फ़िल्में और कुलसुम हलवाइन की 'संगीतमय कचौड़ी' बहुत पसंद थी।
वे संकटमोचन मंदिर के संगीत समारोह में ज़रूर जाते थे और काशी विश्वनाथ के प्रति भी गहरी श्रद्धा रखते थे। वे काशी छोड़ना नहीं चाहते थे। भारतरत्न मिलने के बाद भी वे फटी तहमद पहनते थे। एक शिष्या के टोकने पर उन्होंने कहा कि सम्मान शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं। सन् 2000 तक काशी की कई पुरानी परंपराएँ लुप्त हो गईं, जिसकी कमी उन्हें खलती थी। 21 अगस्त 2006 को नब्बे वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। लेखक के अनुसार उनकी सबसे बड़ी देन संगीत सीखने की अटूट इच्छा है।
Themes and message
संगीत साधना ही इबादत
पाठ का शीर्षक ही बताता है कि बिस्मिल्ला खाँ के लिए नौबतखाने में शहनाई बजाना पूजा के समान था। वे अस्सी बरस तक हर नमाज़ के बाद खुदा से सच्चा सुर माँगते रहे। इतने बड़े कलाकार होकर भी उन्हें लगता था कि सातों सुरों को बरतने की तमीज़ उन्हें अभी पूरी तरह नहीं आई। इससे पता चलता है कि सच्चा कलाकार कभी अपने ज्ञान को पूरा नहीं मानता। लेखक के अनुसार उनकी सबसे बड़ी देन यही है कि उन्होंने सीखने की इच्छा जीवन भर जिंदा रखी।
From the text: नमाज़ के बाद सज़दे में वे प्रार्थना करते हैं: "मेरे मालिक एक सुर बख्श दे।" लेखक लिखता है कि अस्सी बरस से वे सोचते आए हैं कि सातों सुरों को बरतने की तमीज़ उन्हें अभी तक क्यों नहीं आई।
गंगा-जमुनी संस्कृति और धार्मिक सौहार्द
बिस्मिल्ला खाँ अपने मज़हब के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। वे पाँचों वक्त नमाज़ पढ़ते थे और मुहर्रम में शोक मनाते थे। साथ ही वे बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे, संकटमोचन मंदिर के समारोह में जाते थे और काशी विश्वनाथ के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे। लेखक के अनुसार काशी में मुहर्रम-ताजिया और होली-अबीर-गुलाल एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। इससे पता चलता है कि बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के जीवित प्रतीक थे, जो दो कौमों को भाईचारे की प्रेरणा देते थे।
From the text: काशी से बाहर होने पर वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके शहनाई का प्याला घुमाते थे। लेखक कहता है कि बाबा विश्वनाथ और बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं।
सादगी और विनम्रता
भारतरत्न, पद्मविभूषण और कई मानद उपाधियाँ मिलने के बाद भी बिस्मिल्ला खाँ का रहन-सहन सादा रहा। वे फटी तहमद पहनकर ही लोगों से मिलते थे। उनके लिए बाहरी दिखावे से अधिक महत्त्व सुर का था। जब दुनिया उनकी प्रशंसा में 'सुबहान अल्लाह' कहती, तो वे 'अलहमदुलिल्लाह' कहकर सारी तारीफ़ ईश्वर को सौंप देते थे। इससे पता चलता है कि प्रसिद्धि ने उनमें घमंड पैदा नहीं किया और वे अपनी कला को ईश्वर की देन मानते थे।
From the text: शिष्या के टोकने पर उन्होंने कहा: "धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।" साथ ही "लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।"
काशी से प्रेम और लुप्त होती परंपराओं की पीड़ा
बिस्मिल्ला खाँ काशी को अपनी जन्नत मानते थे, क्योंकि वहाँ गंगा मइया, बाबा विश्वनाथ और बालाजी मंदिर थे और उनके खानदान ने कई पीढ़ियों तक वहीं शहनाई बजाई थी। लेखक काशी को 'संस्कृति की पाठशाला' कहता है। पर समय के साथ काशी बदल रही थी। मलाई बरफ़ बेचने वाले चले गए, देसी घी और कचौड़ी-जलेबी में पहले वाली बात नहीं रही, गायकों के मन में संगतियों के लिए आदर नहीं रहा और घंटों रियाज़ को कोई नहीं पूछता था। एक सच्चे सुर साधक के रूप में उन्हें यह कमी बहुत खलती थी।
From the text: वे कहते थे: "मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी।" सन् 2000 के प्रसंग में पक्का महाल से मलाई बरफ़ के चले जाने और अदब के ज़माने के खो जाने पर उनकी हैरानी का वर्णन है।
बड़े कलाकार का सहज मानवीय रूप
लेखक बिस्मिल्ला खाँ को केवल महान कलाकार के रूप में नहीं, एक साधारण और जीवंत इंसान के रूप में भी दिखाता है। मुहर्रम में वे इमाम हुसैन की शहादत पर रोते थे। बचपन में वे फ़िल्मों के दीवाने थे, सुलोचना उनकी पसंदीदा हीरोइन थीं और कुलसुम की कचौड़ी उन्हें बहुत भाती थी। बुढ़ापे में भी उनकी 'खिस्स से' हँसी बनी रही। इससे पता चलता है कि महानता के साथ सरल, भावुक और जिंदादिल बने रहना संभव है।
From the text: लेखक कहता है कि मुहर्रम जैसे अवसर पर एक बड़े कलाकार का सहज मानवीय रूप आसानी से दिख जाता है, और यह भी कि "अपने खाँ साहब रियाज़ी और स्वादी दोनों रहे हैं"।
Characters
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (अमीरुद्दीन)
पाठ के नायक; प्रसिद्ध शहनाई वादक, जिनके जीवन पर यह व्यक्ति-चित्र लिखा गया है।
- सच्चे संगीत साधक
- धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक
- सादगी पसंद और विनम्र
- काशी और शहनाई से गहरा प्रेम
- जिंदादिल और विनोदी
अस्सी बरस तक नमाज़ के बाद सच्चा सुर माँगना साधना दिखाता है। नमाज़ के साथ बालाजी, संकटमोचन और विश्वनाथ के प्रति श्रद्धा उनकी सहिष्णुता दिखाती है। भारतरत्न के बाद भी फटी तहमद पहनना सादगी है। 'शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं' कहना उनका प्रेम दिखाता है। सुलोचना की फ़िल्में, संगीतमय कचौड़ी और 'खिस्स से' हँसी उनकी जिंदादिली के प्रमाण हैं।
रसूलनबाई और बतूलनबाई
गायिका बहनें, जिनके घर के रास्ते से अमीरुद्दीन बालाजी मंदिर जाता था।
- ठुमरी, टप्पे और दादरा की गायिकाएँ
- बिस्मिल्ला खाँ की आरंभिक प्रेरणा
- संगीत के प्रति रुचि जगाने वाली
बिस्मिल्ला खाँ ने साक्षात्कारों में माना कि आरंभिक दिनों में संगीत के प्रति आसक्ति इन्हीं बहनों को सुनकर मिली। लेखक कहता है कि इन्होंने उनकी अबोध उम्र में 'अनुभव की स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वर्णमाला' उकेरी।
मामू अलीबख्श खाँ
बिस्मिल्ला खाँ के मामा और उस्ताद, देश के जाने-माने शहनाई वादक।
- कुशल शहनाई वादक
- विभिन्न रियासतों के दरबार में बजाने वाले
- खानदानी परंपरा के वाहक
पाठ बताता है कि मामाद्वय सादिक हुसैन और अलीबख्श विभिन्न रियासतों के दरबार में बजाने जाते थे। शहनाई बजाना अलीबख्श के घर का खानदानी पेशा था। उनके सम पर आने पर बालक अमीरुद्दीन पत्थर पटककर दाद देता था।
नाना
बालाजी मंदिर के प्रतिष्ठित शहनाई वादक, जिनकी शहनाई बालक अमीरुद्दीन छुपकर सुनता था।
- प्रतिष्ठित शहनाईवाज़
- नाती के लिए प्रेरणा
- मीठी शहनाई के धनी
बिस्मिल्ला खाँ कहते हैं कि उनके नाना बालाजी मंदिर में बड़े प्रतिष्ठित शहनाईवाज़ रह चुके हैं। बालक अमीरुद्दीन रियाज़ के बाद नाना की 'मीठी वाली शहनाई' ढूँढ़ता था। लेखक कहता है कि दादा की मीठी शहनाई अब उनके हाथ लग चुकी है।
शिष्या
बिस्मिल्ला खाँ की शिष्या, जिसने फटी तहमद पहनने पर उन्हें टोका।
- गुरु का सम्मान करने वाली
- बाहरी प्रतिष्ठा की चिंता करने वाली
- संकोची (डरते-डरते बात कहने वाली)
उसने डरते-डरते कहा कि आपको भारतरत्न मिल चुका है, फटी तहमद अच्छी नहीं लगती। इस प्रसंग से खाँ साहब की सादगी और लाड़ भरा स्वभाव सामने आता है।
How it is written
| Device | Example | Effect |
|---|---|---|
| व्यक्ति-चित्र शैली और वर्तमान काल में वर्णन | लेखक अतीत की घटनाओं को भी वर्तमान काल में लिखता है, जैसे "अमीरुद्दीन अभी सिर्फ़ छः साल का है" और "अमीरुद्दीन की उम्र अभी 14 साल है।" | इससे पाठक को लगता है कि घटनाएँ उसकी आँखों के सामने घट रही हैं। बिस्मिल्ला खाँ का जीवन एक जीवंत चित्र की तरह उभरता है। |
| हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा और स्थानीय बोली | इबादत, सज़दा, तासीर, नेमत जैसे उर्दू शब्द और "ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है" जैसी बनारसी बोली। | भाषा सहज और प्रवाहमयी बनती है। उर्दू शब्द बिस्मिल्ला खाँ के परिवेश को और बोली उनके अपनेपन को सजीव कर देती है। यह भाषा खुद गंगा-जमुनी संस्कृति का रूप लगती है। |
| दृष्टांत (उदाहरण द्वारा समझाना) | हिरन अपनी ही महक से परेशान होकर पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाई है। | इस उदाहरण से संकेत मिलता है कि बिस्मिल्ला खाँ के भीतर ही सच्चा सुर था, फिर भी वे जीवन भर उसे खोजते रहे। इससे उनकी विनम्रता और साधना की गहराई स्पष्ट होती है। |
| मानवीकरण और हल्का विनोद | मंदिर के विग्रहों के बारे में लेखक कहता है कि पता नहीं उन्हें कितनी समझ है, जो रोज़ अलग-अलग राग सुनते हैं; कुलसुम की कचौड़ी को 'संगीतमय कचौड़ी' कहा गया है। | विनोद से पाठ रोचक बनता है। 'संगीतमय कचौड़ी' से यह भी पता चलता है कि बिस्मिल्ला खाँ को हर आवाज़ में संगीत (आरोह-अवरोह) सुनाई देता था। |
| सांस्कृतिक संदर्भों की भरमार | भीमपलासी, मुलतानी, कल्याण, ललित, भैरव जैसे राग; ठुमरी, टप्पा, दादरा, कजरी, चैती; नागस्वरम् और तानसेन की बंदिश का उल्लेख। | इन संदर्भों से संगीत की शास्त्रीय परंपरा और काशी का सांस्कृतिक वातावरण सामने आता है। पाठ जानकारी से भरपूर और बार-बार पढ़ने योग्य बनता है। |
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
मेरे मालिक एक सुर बख्श दे।
बिस्मिल्ला खाँ: नमाज़ के बाद सज़दे में वे खुदा से यह प्रार्थना करते हैं।
यह उनकी संगीत साधना और विनम्रता का प्रमाण है। महान कलाकार होकर भी वे स्वयं को सीखने वाला मानते थे और सुर को ईश्वर की देन समझते थे।
धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।
बिस्मिल्ला खाँ: फटी तहमद पहनने पर शिष्या के टोकने के उत्तर में।
'धत्! पगली' में स्नेह और लाड़ का भाव है। कथन बताता है कि उनके लिए सम्मान कला से है, बाहरी दिखावे से नहीं।
लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।
बिस्मिल्ला खाँ: शिष्या से बात करते हुए वे मालिक से फटा सुर न देने की दुआ करते हैं।
फटी लुंगी की चिंता नहीं, फटे (बेसुरे) सुर की चिंता है। इससे पता चलता है कि उनके जीवन में कला सबसे ऊपर थी।
मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी।
बिस्मिल्ला खाँ: काशी छोड़कर कहीं और न जाने का कारण बताते हुए।
यह शहनाई और काशी के प्रति उनके अटूट प्रेम और समर्पण को दिखाता है।
शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं इस धरती पर हमारे लिए।
बिस्मिल्ला खाँ: वे बताते हैं कि काशी ने उन्हें तालीम और अदब दी है।
उनके लिए काशी केवल शहर नहीं, संस्कारों की भूमि थी। यही भावना उन्हें काशी से बाँधे रखती है।
काशी संस्कृति की पाठशाला है।
लेखक: काशी के कलाकारों, उत्सवों और परंपराओं का वर्णन करते हुए।
काशी में संगीत, भक्ति, साहित्य और अनेक धर्मों की परंपराएँ साथ-साथ हैं, इसलिए वह संस्कृति सिखाने वाली पाठशाला के समान है।
काशी में मरण भी मंगल माना गया है।
लेखक: काशी की बदलती परंपराओं के बीच उसकी बची हुई विशेषताएँ बताते हुए।
इससे काशी की पवित्रता और आध्यात्मिक महत्त्व का पता चलता है, जहाँ मृत्यु को भी शुभ माना जाता है।
अपने खाँ साहब रियाज़ी और स्वादी दोनों रहे हैं
लेखक: बचपन में सुलोचना की फ़िल्मों और कुलसुम की कचौड़ी के शौक का वर्णन करते हुए।
यह बिस्मिल्ला खाँ के दोहरे रूप को दिखाता है: कठिन अभ्यास करने वाले साधक और जीवन का आनंद लेने वाले सहज इंसान।
यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत in real life
Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
संगीत साधना ही इबादत
मान लीजिए आप रोज़ सुबह आधा घंटा तबले का अभ्यास करते हैं। बोर्ड परीक्षा पास आने पर एक रिश्तेदार कहते हैं कि अब तबला बेकार है, छोड़ दो। आप तय नहीं कर पा रहे कि क्या करें।
बिस्मिल्ला खाँ की संगीत-साधना के आधार पर बताइए कि नियमित अभ्यास का आपके जीवन में क्या महत्त्व है और आप क्या निर्णय लेंगे।
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- खाँ साहब के लिए संगीत इबादत था; नमाज़ में भी वे सच्चा सुर माँगते थे।
- अस्सी बरस तक उन्होंने अभ्यास और सीखने की ललक नहीं छोड़ी।
- निर्णय: पढ़ाई के साथ समय बाँटकर थोड़ा अभ्यास जारी रखना।
Answer: खाँ साहब के लिए रियाज़ इबादत था और वे अस्सी बरस सुर माँगते रहे। मैं पढ़ाई के साथ थोड़ा समय तबले को भी दूँगा, क्योंकि नियमित अभ्यास ही कला बचाता है।
Memory hook: रोज़ का छोटा रियाज़ = खाँ साहब की नमाज़ जैसी इबादत।
सादगी और विनम्रता
कल्पना कीजिए कि विद्यालय के वार्षिकोत्सव में आपकी सहेली को भाषण देना है। वह तैयारी छोड़कर पूरा हफ़्ता नए महँगे कपड़े और जूते चुनने में लगा देती है।
फटी तहमद वाले प्रसंग के आधार पर अपनी सहेली को समझाइए कि सम्मान किस चीज़ से मिलता है।
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- शिष्या ने फटी तहमद पर टोका तो खाँ साहब ने कहा कि भारतरत्न शहनाई पर मिला, लुंगी पर नहीं।
- बनाव-सिंगार में लगे रहते तो रियाज़ न हो पाता।
- सीख: तैयारी और गुण से सम्मान मिलता है, दिखावे से नहीं।
Answer: बिस्मिल्ला खाँ ने कहा था कि भारतरत्न शहनाई पर मिला, लुंगी पर नहीं। मैं सहेली से कहूँगी कि तालियाँ अच्छे भाषण पर मिलेंगी, कपड़ों पर नहीं; इसलिए पहले तैयारी करो।
Memory hook: इनाम शहनाई पर, लुंगी पर नहीं—तालियाँ भाषण पर, कपड़ों पर नहीं।
गंगा-जमुनी संस्कृति और धार्मिक सौहार्द
मान लीजिए आपकी कॉलोनी में होली पर सब मिलकर अबीर-गुलाल खेलते हैं और ईद पर सब एक-दूसरे के घर सेवइयाँ खाने जाते हैं। नया आया एक लड़का पूछता है कि अलग धर्म के लोग एक-दूसरे के त्योहार में क्यों जाते हैं।
काशी की संस्कृति और बिस्मिल्ला खाँ के उदाहरण से उस लड़के को उत्तर दीजिए।
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- लेखक के अनुसार काशी में मुहर्रम-ताजिया और होली-अबीर, गुलाल की गंगा-जमुनी संस्कृति एक-दूसरे की पूरक रही है।
- खाँ साहब नमाज़ी होकर भी बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे।
- सीख: मिल-जुलकर त्योहार मनाने से भाईचारा बढ़ता है।
Answer: काशी में मुहर्रम-ताजिया और होली-अबीर एक-दूसरे के पूरक रहे, और नमाज़ी बिस्मिल्ला खाँ बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे। मिलकर त्योहार मनाने से हमारी कॉलोनी में भी भाईचारा बढ़ता है।
Memory hook: होली का गुलाल + ईद की सेवइयाँ = काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति।
काशी से प्रेम और लुप्त होती परंपराओं की पीड़ा
कल्पना कीजिए कि आपकी नानी के कस्बे की पुरानी जलेबी की दुकान बंद हो गई है और वहाँ अब एक बड़ी इमारत बन रही है। नानी उदास होकर कहती हैं कि अब वह स्वाद और वह रौनक नहीं रही।
सन् 2000 की काशी को लेकर बिस्मिल्ला खाँ की भावनाओं से नानी की भावनाओं की तुलना कीजिए।
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- खाँ साहब को पक्का महाल से मलाई बरफ़ बेचने वालों के जाने और कचौड़ी-जलेबी की कमी खलती थी।
- उन्हें कजली, चैती और अदब के जमाने के खोने का अफसोस था।
- दोनों की पीड़ा अपनी जगह और उसकी पहचान से जुड़ी है।
Answer: जैसे बिस्मिल्ला खाँ को मलाई बरफ़, कचौड़ी-जलेबी और कजली-चैती के खोने का दुख था, वैसे ही नानी को अपनी पुरानी दुकान खोने का। दोनों की पीड़ा अपनी जगह से प्रेम दिखाती है।
Memory hook: नानी की बंद दुकान = खाँ साहब का गायब मलाई बरफ़।
Topics in this chapter
- बिस्मिल्ला खाँ का चरित्र-चित्रणComing soon
- नौबतखाने में इबादत प्रश्न-उत्तरComing soon
- नौबतखाने में इबादत का मूल भावComing soon
- बिस्मिल्ला खाँ और काशी की गंगा-जमुनी संस्कृतिComing soon
- शहनाई और बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधनाComing soon
How the board asks यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत
The question patterns to expect, and the method that works for each.
| Question type | How it is asked | Method |
|---|---|---|
| पठित गद्यांश पर बहुविकल्पी प्रश्न | प्रश्न 7 में पाठ का एक अंश (जैसे शिष्या वाला प्रसंग, काशी की संस्कृति, मुहर्रम या रीड वाला अंश) देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न पूछे जाते हैं: तथ्य, आशय, भाव, विशेषता और 'असत्य कथन' चुनना। | पहले पूरा गद्यांश ध्यान से पढ़ें, फिर हर विकल्प को गद्यांश से मिलाएँ। 'अनुपयुक्त' या 'असत्य' वाले प्रश्न में शब्द ध्यान से देखें। उत्तर में विकल्प का अक्षर और पूरा पाठ दोनों लिखें। |
| कथन-कारण प्रश्न | कथन (A) और कारण (R) देकर चार मानक विकल्पों में से चुनना होता है, जैसे: खाँ साहब फटी तहमद पहनते थे / क्योंकि वे सम्मान को कला से जोड़ते थे। | पहले जाँचें कि कथन सही है या नहीं, फिर कारण। अंत में देखें कि कारण सचमुच कथन की व्याख्या करता है या नहीं। दोनों सही होने पर भी कारण व्याख्या न करे, तो वह अलग विकल्प होगा। |
| आशय स्पष्ट कीजिए (25-30 शब्द, 2 अंक) | पाठ की किसी पंक्ति, जैसे 'फटा सुर न बख्शें' या 'काशी में मरण भी मंगल माना गया है', का आशय पूछा जाता है। | पहले बताएँ कि पंक्ति किस प्रसंग में आई, फिर उसका सीधा अर्थ और अंत में गहरा भाव लिखें। 25-30 शब्दों की सीमा में रहें। |
| चरित्र की विशेषताएँ सोदाहरण (25-30 शब्द, 2 अंक) | बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधक के रूप में या सच्चे इंसान के रूप में विशेषताएँ उदाहरण सहित पूछी जाती हैं। | दो विशेषताएँ चुनें और हर विशेषता के साथ पाठ का एक प्रसंग जोड़ें, जैसे सच्चे सुर की दुआ (साधना), फटी तहमद (सादगी)। बिना उदाहरण के केवल गुण गिनाने से पूरे अंक नहीं मिलते। |
| विषयवस्तु और संस्कृति पर प्रश्न (25-30 शब्द, 2 अंक) | काशी को संस्कृति की पाठशाला क्यों कहा गया, बिस्मिल्ला खाँ काशी क्यों नहीं छोड़ना चाहते थे, कौन-से परिवर्तन उन्हें व्यथित करते थे, मुहर्रम से उनका जुड़ाव कैसा था। | पाठ से दो-तीन ठोस तथ्य दें, जैसे गंगा मइया, विश्वनाथ, बालाजी मंदिर और खानदानी परंपरा। तथ्यों को अपने शब्दों में जोड़कर उत्तर पूरा करें। |
| मूल्यपरक या उच्च चिंतन प्रश्न | पाठ के किसी मूल्य को आज के जीवन से जोड़ने को कहा जाता है, जैसे 'सफलता के लिए बाहरी दिखावा ज़रूरी नहीं' या 'कलाकार में धार्मिक सहिष्णुता क्यों ज़रूरी है'। | पहले पाठ से प्रमाण दें, फिर अपना तर्कसंगत मत लिखें। उत्तर में पाठ और अपने जीवन या समाज का संबंध साफ़ दिखना चाहिए। |
Tricks to remember यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
पाठ का क्रम: एक यात्रा
'डुमराँव से काशी, रसूलन से रियाज़, शाहेनय से सज़दा, मुहर्रम से मस्ती, बचपन से सिनेमा, संकटमोचन से तहमद, 2000 से विदाई।' क्रम: जन्म डुमराँव → ननिहाल काशी → रसूलन-बतूलन का रास्ता → शहनाई का इतिहास → सच्चे सुर की नमाज़ → मुहर्रम → जवानी की यादें (कुलसुम, सुलोचना) → बचपन (मीठी शहनाई, पत्थर, छः पैसे) → संकटमोचन, विश्वनाथ → काशी-प्रेम → तहमद प्रसंग → सन् 2000 की काशी → 2006 में विदा।
Use it when: गद्यांश किस भाग का है, यह तुरंत पहचानने और उत्तर में सही संदर्भ देने के लिए।
संख्याओं की माला
4-6-14-8-80-90: 4 साल—नाना की मीठी शहनाई ढूँढ़ी; 6 साल—काशी में, और 6 पैसे का टिकट (2+2+2 मामू-मौसी-नानी); 14 साल—नौबतखाने रियाज़; 8—मुहर्रम की आठवीं तारीख, 8 किलोमीटर नौहा; 80—बरस तक सुर माँगा; 90—वर्ष की आयु में 21 अगस्त 2006 को विदा। बोनस: रीड 15-20 मिनट में गीली।
Use it when: MCQ में संख्या वाले विकल्पों में भ्रम से बचने के लिए।
पात्र याद करने का सूत्र: 'ना-मा-र-ब-शि'
ना—नाना (मीठी शहनाई), मा—मामू अलीबख्श खाँ (सम पर पत्थर), र-ब—रसूलनबाई-बतूलनबाई (संगीत की वर्णमाला), शि—शिष्या (फटी तहमद)। साथ में कुलसुम हलवाइन (संगीतमय कचौड़ी) और फकीर ('बजा, बजा')।
Use it when: किसने खाँ साहब की संगीत साधना को समृद्ध किया—ऐसे प्रश्नों में सही नाम लिखने के लिए।
विषय याद करने का शब्द: 'इ-गं-सा-का-मा'
इ—इबादत (संगीत ही नमाज़), गं—गंगा-जमुनी संस्कृति, सा—सादगी (फटी तहमद), का—काशी-प्रेम और खोती परंपराएँ, मा—मानवीय रूप (मुहर्रम में आँसू, सुलोचना की याद पर हँसी)।
Use it when: मूल भाव, प्रतिपाद्य या चरित्र-चित्रण के प्रश्न में पाँचों पक्ष न छूटें।
यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत: extract-based questions
Read the extract, answer every part on paper, then open the answers.
Extract 1: मुहर्रम और बिस्मिल्ला खाँ का शोक
आठवीं तारीख उनके लिए खास महत्त्व की है। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते हैं व दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते जाते हैं। इस दिन कोई राग नहीं बजता। राग-रागिनियों की अदायगी का निषेध है इस दिन।
(1) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: इससे पहले खाँ साहब मुहर्रम के दिनों में अपने खानदान के नियम के बारे में बताते हैं।) मुहर्रम के दिनों में बिस्मिल्ला खाँ के खानदान के लोग क्या नहीं करते?
(क) वे काशी से बाहर नहीं जाते
(ख) वे न शहनाई बजाते हैं, न किसी संगीत कार्यक्रम में शामिल होते हैं
(ग) वे बालाजी मंदिर नहीं जाते
(घ) वे नौहा नहीं बजाते(2) · 1 mark · MCQ
मुहर्रम की आठवीं तारीख को खाँ साहब क्या करते हैं?
(क) बालाजी मंदिर में राग भैरव बजाते हैं
(ख) घर पर बैठकर चुपचाप रियाज़ करते हैं
(ग) खड़े होकर शहनाई बजाते हुए लगभग आठ किलोमीटर तक पैदल रोते हुए नौहा बजाते हैं
(घ) संकटमोचन मंदिर की संगीत सभा में भाग लेते हैं(3) · 1 mark · Assertion-reason
निम्नलिखित कथन और कारण को पढ़कर सही विकल्प चुनिए—
कथन (A): मुहर्रम की आठवीं तारीख को बिस्मिल्ला खाँ कोई राग नहीं बजाते।
कारण (R): इस दिन राग-रागिनियों की अदायगी का निषेध है और यह शोक का दिन है।
(क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
(ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
(घ) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।(4) · 1 mark · MCQ
इस गद्यांश से बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व के कौन-से पक्ष उभरते हैं?
I. अपनी धार्मिक परंपरा के प्रति निष्ठा
II. शोक के अवसर पर सहज मानवीय संवेदना
III. अपनी प्रसिद्धि का दिखावा
(क) केवल I
(ख) I और II
(ग) II और III
(घ) I, II और III(5) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: खाँ साहब बताते हैं कि मुहर्रम में उनके खानदान का कोई व्यक्ति किसी संगीत-कार्यक्रम में 'शिरकत' नहीं करता।) गद्यांश में आए शब्द 'शिरकत' का सही अर्थ है—
(क) शामिल होना
(ख) शिकायत करना
(ग) शोक मनाना
(घ) शुरुआत करना
Show the answersAnswers
- (ख) वे न शहनाई बजाते हैं, न किसी संगीत कार्यक्रम में शामिल होते हैं
- (ग) खड़े होकर शहनाई बजाते हुए लगभग आठ किलोमीटर तक पैदल रोते हुए नौहा बजाते हैं
- (क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
- (ख) I और II
- (क) शामिल होना
Extract 2: नन्हे अमीरुद्दीन की मीठी शहनाई की खोज
रियाज़ के बाद जब अपनी जगह से उठकर चले जाएँ तब जाकर ढेरों छोटी-बड़ी शहनाइयों की भीड़ से अपने नाना वाली शहनाई ढूँढ़ता और एक-एक शहनाई को फेंक कर खारिज़ करता जाता, सोचता—‘लगता है मीठी वाली शहनाई दादा कहीं और रखते हैं।’
(1) · 1 mark · MCQ
चार साल का अमीरुद्दीन शहनाइयों को एक-एक करके क्यों फेंकता जाता था?
(क) वह नाना से नाराज़ था
(ख) वह नाना की 'मीठी' शहनाई ढूँढ़ रहा था
(ग) सारी शहनाइयाँ टूटी हुई थीं
(घ) मामू ने उसे ऐसा करने को कहा था(2) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: आगे लेखक बताते हैं कि जब मामू अलीबख्श खाँ शहनाई बजाते हुए 'सम' पर आते, तब चार साल का अमीरुद्दीन धड़ से एक पत्थर ज़मीन पर मारता था।) मामू के सम पर आते ही पत्थर पटकने से बालक अमीरुद्दीन के बारे में क्या पता चलता है?
(क) उसे संगीत से चिढ़ थी
(ख) उसे सम की पहचान बचपन में ही हो गई थी, पर दाद देने का सही ढंग नहीं आता था
(ग) वह मामू को डराना चाहता था
(घ) वह अपने खेल में मग्न रहता था(3) · 1 mark · MCQ
पाठ के 'यह भी जानें' के अनुसार 'सम' क्या है?
(क) ताल का वह स्थान जहाँ लय की समाप्ति और ताल का आरंभ होता है
(ख) एक राग का नाम
(ग) शहनाई का एक हिस्सा
(घ) गीत की अंतिम पंक्ति(4) · 1 mark · MCQ
'लगता है मीठी वाली शहनाई दादा कहीं और रखते हैं'—इस सोच में कौन-सा भाव प्रकट होता है?
(क) बाल-सुलभ भोलापन और जिज्ञासा
(ख) ईर्ष्या
(ग) डर
(घ) नाना के प्रति अविश्वास(5) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: छिपकर नाना की शहनाई सुनने वाला यह बालक मामू के 'सम' पर आते ही पत्थर पटककर ताल पहचानता था।) गद्यांश में अमीरुद्दीन की किन विशेषताओं के आरंभिक संकेत मिलते हैं?
I. संगीत के प्रति स्वाभाविक लगाव
II. सुर और लय की समझ
III. पढ़ाई में गहरी रुचि
(क) केवल I
(ख) I और II
(ग) II और III
(घ) केवल III
Show the answersAnswers
- (ख) वह नाना की 'मीठी' शहनाई ढूँढ़ रहा था
- (ख) उसे सम की पहचान बचपन में ही हो गई थी, पर दाद देने का सही ढंग नहीं आता था
- (क) ताल का वह स्थान जहाँ लय की समाप्ति और ताल का आरंभ होता है
- (क) बाल-सुलभ भोलापन और जिज्ञासा
- (ख) I और II
यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत: board-level solved questions
Ordered from board level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.
Example 1: रसूलनबाई और बतूलनबाई का योगदान · 2 marks · Short answerBoard level
बिस्मिल्ला खाँ के संगीत-जीवन में रसूलनबाई और बतूलनबाई का क्या योगदान रहा? 25-30 शब्दों में लिखिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- बालाजी मंदिर तक रियाज़ के लिए जाने का रास्ता इन दोनों गायिका बहनों के घर से होकर जाता था।
- उनकी ठुमरी, टप्पा, दादरा सुनकर अमीरुद्दीन को खुशी मिलती थी।
- खाँ साहब ने स्वयं माना कि संगीत के प्रति आसक्ति इन्हीं बहनों को सुनकर मिली।
Answer: रियाज़ के लिए अमीरुद्दीन रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर वाले रास्ते से जाता था। उनकी ठुमरी, टप्पे और दादरा सुनकर उसके मन में संगीत के प्रति गहरा लगाव जागा।
Example 2: संगीतमय कचौड़ी · 2 marks · Short answerHarder board level
लेखक ने कुलसुम की कचौड़ी को 'संगीतमय कचौड़ी' क्यों कहा है? इससे खाँ साहब के बारे में क्या पता चलता है?
Try it first, then show the solutionSolution
- कुलसुम कलकलाते घी में कचौड़ी डालती थी तो छन्न की आवाज़ उठती थी।
- उस आवाज़ में खाँ साहब को सारे आरोह-अवरोह दिख जाते थे।
- निष्कर्ष: उनका मन हर ध्वनि में संगीत खोजता था; वे 'रियाज़ी और स्वादी' दोनों थे।
Answer: कुलसुम जब खौलते घी में कचौड़ी डालती, छन्न की आवाज़ में उन्हें सारे आरोह-अवरोह दिख जाते थे। इससे पता चलता है कि उनका मन हर ध्वनि में संगीत खोजता था।
Example 3: हिरन और कस्तूरी का उदाहरण · 2 marks · Short answerHarder board level
'हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है'—लेखक ने यह उदाहरण बिस्मिल्ला खाँ से किस प्रकार जोड़ा है?
Try it first, then show the solutionSolution
- हिरन जिस सुगंध को बाहर खोजता है, वह उसी के भीतर है।
- खाँ साहब सुरों के धनी होकर भी अस्सी बरस सोचते रहे कि सातों सुरों को बरतने की तमीज़ अभी क्यों नहीं आई।
- इससे उनकी विनम्रता और सीखते रहने की ललक झलकती है (व्याख्या)।
Answer: जैसे हिरन अपने भीतर बसी सुगंध को जंगल में खोजता है, वैसे ही सुरों के धनी खाँ साहब अस्सी बरस तक सच्चा सुर खोजते रहे। इससे उनकी विनम्रता झलकती है।
Example 4: सुबहान अल्लाह और अलहमदुलिल्लाह · 2 marks · Short answerHarder board level
'दुनिया कहती—सुबहान अल्लाह, तिस पर बिस्मिल्ला खाँ कहते हैं—अलहमदुलिल्लाह'—इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- 'सुबहान अल्लाह' कहकर दुनिया उनकी शहनाई की प्रशंसा करती है।
- 'अलहमदुलिल्लाह' का अर्थ है—तमाम तारीफ़ ईश्वर के लिए।
- खाँ साहब प्रशंसा का श्रेय स्वयं न लेकर ईश्वर को देते हैं: विनम्रता और आस्था।
Answer: लोग 'सुबहान अल्लाह' कहकर उनकी प्रशंसा करते, पर खाँ साहब 'अलहमदुलिल्लाह' कहकर सारी तारीफ़ ईश्वर को सौंप देते। इससे उनकी विनम्रता और ईश्वर के प्रति आस्था प्रकट होती है।
Example 5: एक जीत के बाद अभ्यास छोड़ना · 2 marks · Short answerHOTS / competency
मान लीजिए आपका मित्र विद्यालय की संगीत प्रतियोगिता जीतने के बाद अभ्यास करना छोड़ देता है। बिस्मिल्ला खाँ के जीवन के आधार पर आप उसे क्या सलाह देंगे?
Try it first, then show the solutionSolution
- बड़े सम्मान (भारतरत्न) के बाद भी खाँ साहब ने साधना नहीं छोड़ी।
- वे अस्सी बरस तक नमाज़ में सच्चा सुर माँगते रहे; 'फटा सुर न बख्शें' उनकी दुआ थी।
- सलाह: एक जीत मंज़िल नहीं, निरंतर रियाज़ से ही कला निखरती है।
Answer: मैं उसे बताऊँगा कि भारतरत्न पाकर भी बिस्मिल्ला खाँ अस्सी बरस तक सच्चा सुर माँगते रहे। एक जीत मंज़िल नहीं है; निरंतर रियाज़ से ही कला निखरती है।
Example 6: आज के समाज के लिए बिस्मिल्ला खाँ का संदेश · 2 marks · Short answerHOTS / competency
धर्म के नाम पर बढ़ती दूरियों के बीच बिस्मिल्ला खाँ का जीवन हमें कैसे राह दिखा सकता है? तर्क सहित लिखिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- वे पाँचों वक्त के नमाज़ी थे और मुहर्रम की परंपरा निभाते थे।
- साथ ही बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते, संकटमोचन की सभा में जाते, विश्वनाथ के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे।
- सीख: अपनी आस्था निभाते हुए दूसरों की आस्था का सम्मान; लेखक के अनुसार वे दो कौमों को भाईचारे की प्रेरणा देते रहे।
Answer: नमाज़ी खाँ साहब बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते और विश्वनाथ में श्रद्धा रखते थे। वे सिखाते हैं कि अपनी आस्था निभाते हुए दूसरों की आस्था का सम्मान संभव है।
Where the marks are
How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.
'काशी में बाबा विश्वनाथ और बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं'—इस कथन को पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (25-30 शब्द) (2 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| खाँ साहब की अपने मजहब के प्रति निष्ठा (पाँचों वक्त की नमाज़, मुहर्रम की परंपरा) का उल्लेख | 0.5 |
| हिंदू आस्था-स्थलों से जुड़ाव: बालाजी मंदिर में शहनाई, संकटमोचन की सभा, विश्वनाथ की ओर मुँह करके शहनाई बजाना | 0.5 |
| निष्कर्ष: गंगा-जमुनी संस्कृति और दो कौमों में भाईचारे की प्रेरणा | 0.5 |
| शब्द-सीमा में स्पष्ट, शुद्ध भाषा (उत्तर-बिंदु सांकेतिक हैं; भिन्न किंतु उपयुक्त उत्तर पर भी अंक) | 0.5 |
पठित गद्यांश (जैसे मुहर्रम वाला अंश) पर आधारित पाँच बहुविकल्पी प्रश्न, कथन-कारण सहित (1×5) (5 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| प्रश्न (i): तथ्यात्मक प्रश्न—सही विकल्प (क्रमांक और पाठ सहित) लिखने पर | 1 |
| प्रश्न (ii): गद्यांश की घटना पर आधारित प्रश्न—सही विकल्प | 1 |
| प्रश्न (iii): कथन-कारण—दोनों की सत्यता और व्याख्या का सही संबंध चुनने पर | 1 |
| प्रश्न (iv): व्यक्तित्व/भाव पर आधारित बहु-कथन प्रश्न—सही संयोजन चुनने पर | 1 |
| प्रश्न (v): शब्दार्थ या आशय—सही विकल्प (केवल विकल्प-क्रमांक गलत लिखने पर अंक नहीं) | 1 |
Where students lose marks in यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: जन्मस्थान गलत लिखना
पाठ काशी के बारे में बहुत कुछ कहता है, इसलिए विद्यार्थी मान लेते हैं कि खाँ साहब का जन्म भी काशी में हुआ।
Wrong working
बिस्मिल्ला खाँ का जन्म काशी में हुआ और वहीं वे बड़े हुए।
Right working
बिस्मिल्ला खाँ का जन्म डुमराँव (बिहार) में हुआ; 5-6 वर्ष बाद वे ननिहाल काशी आ गए।
Do this: याद रखें: जन्म डुमराँव, कर्मभूमि काशी।
Usually costs: MCQ में पूरा 1 अंक; 2 अंक के उत्तर में आधा से एक अंक।
Mistake: रीड और नरकट के बारे में गलत तथ्य
काशी और गंगा का बार-बार ज़िक्र होने से नदी का नाम गड़बड़ा जाता है।
Wrong working
रीड बनाने वाली नरकट घास काशी में गंगा के किनारे मिलती है।
Right working
रीड नरकट से बनती है, जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है; इसलिए शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं।
Do this: 'सोन-डुमराँव-नरकट' को एक साथ जोड़कर याद करें।
Usually costs: डुमराँव वाले प्रश्न में मुख्य बिंदु कटने से 1 अंक तक।
Mistake: मुहर्रम पर राग बजाने की बात लिखना
विद्यार्थी सोचते हैं कि बड़ा कलाकार हर अवसर पर राग बजाता होगा।
Wrong working
आठवीं तारीख को खाँ साहब शोक में करुण राग बजाते थे।
Right working
आठवीं तारीख को कोई राग नहीं बजता; खाँ साहब खड़े होकर शहनाई पर नौहा बजाते हुए लगभग आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए चलते थे।
Do this: 'राग नहीं, नौहा' — यह जोड़ा याद रखें।
Usually costs: कथन-कारण या MCQ में 1 अंक; 2 अंक के उत्तर में 1 अंक।
Mistake: आशय पूछने पर केवल कहानी दोहराना
फटी तहमद का प्रसंग रोचक है, इसलिए विद्यार्थी पूरा किस्सा लिख देते हैं पर अर्थ नहीं बताते।
Wrong working
एक दिन शिष्या ने खाँ साहब से कहा कि फटी तहमद न पहनें, तो खाँ साहब मुसकराए और बोले कि आगे से नहीं पहनेंगे...
Right working
आशय: खाँ साहब के लिए कपड़े नहीं, सुर महत्त्वपूर्ण था। लुंगी फटी हो तो सी जाएगी, पर सुर फटा हो तो कला नष्ट हो जाएगी—इससे उनकी सादगी और कला-निष्ठा दिखती है।
Do this: पहली पंक्ति में ही 'आशय/भाव' लिखें, प्रसंग केवल एक वाक्य में।
Usually costs: 2 में से 1 अंक तक।
Mistake: शब्द-सीमा से बहुत आगे लिखना
सब कुछ लिख देने के डर से 25-30 शब्दों की जगह 60-70 शब्द लिखे जाते हैं, जिससे समय भी जाता है और मुख्य बिंदु दब जाता है।
Wrong working
काशी के बारे में लंबा परिचय, फिर खाँ साहब का पूरा जीवन, और अंत में प्रश्न का उत्तर एक पंक्ति में।
Right working
सीधा उत्तर: 'काशी में संगीत, भक्ति और हर धर्म के कलाकार एक-दूसरे से अलग नहीं; यहाँ की अपनी तहज़ीब, बोली और उत्सव हैं, इसलिए यह संस्कृति की पाठशाला है।'
Do this: 2 अंक = 2-3 वाक्य; हर वाक्य में एक मूल्य-बिंदु।
Usually costs: भाषा/प्रस्तुति के लिए आधा अंक, और आगे के प्रश्नों का समय।
यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत: previous year questions
- Course A: Asked in 5 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 1.2 marks per paper; 6 questions in all, counting OR alternatives. In 0 of 4 sample papers.
- Course B: Not asked in any of the 21 board papers we hold (2023 to 2026).
Counted from the real papers on our previous year papers page, not estimated. Average marks are over every board paper we hold, with an OR pair counted once. Chapter tags are ours.
Solved board questions from यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत
Real questions from recent papers. Try each one first, then open our step-by-step solution with marks per step.
2026 Course A, set 3/1/1, Q7 · 5 marks · MCQCompetency-based
निम्नलिखित पठित गद्यांश पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए : 5 × 1 = 5
किसी दिन एक शिष्या ने डरते-डरते खाँ साहब को टोका, ''बाबा! आप यह क्या करते हैं, इतनी प्रतिष्ठा है आपकी। अब तो आपको भारतरत्न भी मिल चुका है, यह फटी तहमद न पहना करें। अच्छा नहीं लगता, जब भी कोई आता है आप इसी फटी तहमद में सबसे मिलते हैं।'' खाँ साहब मुस्कराए। लाड़ से भरकर बोले, ''धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं। तुम लोगों की तरह बनाव सिंगार देखते रहते, तो उमर ही बीत जाती, हो चुकती शहनाई। तब क्या खाक रियाज़ हो पाता। ठीक है बिटिया, आगे से नहीं पहनेंगे, मगर इतना बताई देते हैं कि मालिक से यही दुआ है फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।''
- (i)1 mark
शिष्या द्वारा बिस्मिल्ला खाँ को टोकने के पीछे कौन-से कारण थे?
उचित विकल्प का चयन कर लिखिए :
I. शिष्या को फटी तहमद के कारण शर्म आ रही थी।
II. शिष्या खाँ साहब की प्रतिष्ठा के लिए चिंतित थी।
III. खाँ साहब बनाव-शृंगार को विशेष महत्त्व नहीं देते थे।
IV. शिष्या खाँ साहब के प्रति आत्मीयता का भाव रखती थी।
विकल्प :- (A)कथन I और III सही हैं।
- (B)कथन I और IV सही हैं।
- (C)कथन II और IV सही हैं।
- (D)कथन II और III सही हैं।
- (ii)1 mark
बिस्मिल्ला खाँ द्वारा अपनी शिष्या को 'धत्! पगली' कहकर संबोधित करने में कौन-सा भाव प्रकट होता है?
- (A)हास का
- (B)स्नेह का
- (C)क्रोध का
- (D)उपहास का
- (iii)1 mark
निम्नलिखित कथन और कारण पर विचार करते हुए उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए :
कथन : बिस्मिल्ला खाँ ईश्वर से सच्चे सुरों की प्रार्थना करते थे।
कारण : भारतरत्न पुरस्कार से सम्मानित होने के कारण वे अधिक विनम्र हो गए थे।- (A)कथन सही है परंतु कारण गलत है।
- (B)कथन और कारण दोनों गलत हैं।
- (C)कथन और कारण दोनों सही हैं और कारण कथन की उचित व्याख्या है।
- (D)कथन और कारण दोनों सही हैं परंतु कारण कथन की उचित व्याख्या नहीं है।
- (iv)1 mark
इस गद्यांश के आधार पर खाँ साहब की विशेषताएँ हैं।
उचित विकल्प का चयन कर लिखिए :
I. परिश्रमी
II. प्रतिभावान
III. सरल- (A)I, II और III तीनों
- (B)I और II दोनों
- (C)II और III दोनों
- (D)I और III दोनों
- (v)1 mark
'मालिक फटा सुर न बख्शें' का क्या आशय है?
- (A)ईश्वर उनके वादन में सुरीलापन सदैव बनाए रखे।
- (B)ईश्वर उनके गायन में सुरीलापन सदैव बनाए रखे।
- (C)ईश्वर की अनुकंपा सदैव बनी रही।
- (D)ईश्वर किसी को बेसुरा न बनाए।
Try it first, then show our solutionSolution
- 1 mark
(i) शिष्या खाँ साहब की प्रतिष्ठा के लिए चिंतित थी (II) और आत्मीयता रखती थी (IV)। उसे शर्म नहीं आ रही थी। सही विकल्प (C) है।
- 1 mark
(ii) 'धत्! पगली' लाड़ से भरकर कहा गया है, इसलिए इसमें स्नेह का भाव है। सही विकल्प (B) है।
- 1 mark
(iii) कथन सही है, क्योंकि वे 'फटा सुर न बख्शें' की दुआ करते थे। कारण गलत है, क्योंकि प्रार्थना का कारण पुरस्कार से आई विनम्रता नहीं, संगीत के प्रति समर्पण है। सही विकल्प (A) है।
- 1 mark
(iv) रियाज़ पर ज़ोर से परिश्रमी, शहनाई पर भारतरत्न मिलने से प्रतिभावान और सादे पहनावे से सरल। तीनों सही हैं, इसलिए (A)।
- 1 mark
(v) 'फटा सुर' का संबंध शहनाई वादन से है। इसका आशय है कि ईश्वर उनके वादन में सुरीलापन सदा बनाए रखे। सही विकल्प (A) है।
Answer: (i) C; (ii) B; (iii) A; (iv) A; (v) A
Where the marks are
- (i) सही विकल्प C (1 अंक)
- (ii) सही विकल्प B (1 अंक)
- (iii) सही विकल्प A (1 अंक)
- (iv) सही विकल्प A (1 अंक)
- (v) सही विकल्प A (1 अंक)
2024 Course A, set 3/1/1, Q10 · 2 marks · MCQ
गद्य पाठों के आधार पर निम्नलिखित दो बहुविकल्पी प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प चुनकर लिखिए :
- (i)1 mark
बिस्मिल्ला खाँ काशी छोड़कर क्यों नहीं जाना चाहते थे? अनुपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए:
- (A)उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि होने के कारण उन्हें काशी से विशेष लगाव था।
- (B)अपने पुरखों के समान वे भी काशी के बालाजी से जुड़े रहना चाहते थे।
- (C)काशी से दूर जाने पर उन्हें स्वयं पर विश्वास कम प्रतीत होने लगता था।
- (D)बाबा विश्वनाथ और गंगा मइया के कारण, दोनों ही काशी में, जिनसे उनका लगाव था।
- (ii)1 mark
'लखनवी अंदाज' पाठ के आधार पर लिखिए कि लेखक को नवाब साहब 'नयी कहानी' के लेखक कब लगे?
- (A)उन्हें पहली बार रेलगाड़ी के डिब्बे में देखकर।
- (B)उन्हें खीरा खाने की तैयारी करते हुए देखकर।
- (C)उन्हें खीरा सूंघकर उसका रसास्वादन करते देखकर।
- (D)उनके बिना खीरा खाए ही ऊँची डकार को सुनकर।
Try it first, then show our solutionSolution
- 1 mark
(i) (C): काशी से दूर जाने पर आत्मविश्वास कम होने की बात पाठ में नहीं है। इसलिए यही अनुपयुक्त कारण है।
- 1 mark
(ii) (D): नवाब साहब के बिना खीरा खाए ही ऊँची डकार लेने पर लेखक को वे 'नयी कहानी' के लेखक लगे, जो बिना घटना-पात्र के कहानी लिख देते हैं।
Answer: (i) C; (ii) D
Where the marks are
- (i) C (1 अंक)
- (ii) D (1 अंक)
2024 Course A, set 3/3/1, Q11 · 6 marks · Short answer
गद्य पाठों के आधार पर निम्नलिखित चार प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर लगभग 25-30 शब्दों में लिखिए : (3 × 2 = 6)
- (क)2 marks
'नौबतखाने में इबादत' पाठ में काशी को संस्कृति की पाठशाला क्यों कहा गया है ?
- (ख)2 marks
'लखनवी अंदाज़' पाठ में 'लेखक नवाब साहब के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित थे ।' – इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए ।
- (ग)2 marks
मानव की आरंभिक खोजों यथा आग, पहिया आदि की खोज के पीछे क्या प्रेरणा रही होगी ? 'संस्कृति' पाठ के आधार पर लिखिए ।
- (घ)2 marks
'जीवन में सफल होने के लिए बाहरी रंग-रूप ही महत्वपूर्ण नहीं हैं ।' 'एक कहानी यह भी' के आधार पर तर्कसंगत उत्तर दीजिए ।
Try it first, then show our solutionSolution
- 2 marks
(क) काशी प्राचीन नगरी है, जो शास्त्रों में आनंद-कानन के नाम से प्रतिष्ठित है। यहाँ गंगा-जमुनी संस्कृति और संगीत, साहित्य व अदब की समृद्ध परंपरा रही है। पं. कंठे महाराज, विद्याधरी और बिस्मिल्ला खाँ जैसी विभूतियाँ यहाँ रहीं, इसलिए इसे संस्कृति की पाठशाला कहा गया (कोई दो बिंदु)।
- 2 marks
(ख) लेखक ने नवाब साहब को देखे बिना ही धारणा बना ली कि वे खीरे के साथ देखे जाने के संकोच में होंगे और मध्यम दर्जे में सफ़र करते देखे जाने में भी संकोच करेंगे। अपरिचित होकर भी ऐसी राय बनाना उनका पूर्वग्रह था।
- 2 marks
(ग) आग और पहिये जैसी खोजों के पीछे आत्मरक्षा और सुरक्षा की प्रेरणा रही होगी। साथ ही आरामदायक जीवन की इच्छा और लोक कल्याण की भावना भी रही होगी (कोई दो प्रेरणाएँ)।
- 2 marks
(घ) लेखिका साधारण रूप-रंग की थीं और पिता गोरी बहन से तुलना करते थे। फिर भी वे अपने गुणों और स्वतंत्र निर्णयों से प्रसिद्ध लेखिका बनीं और आंदोलनों में सक्रिय रहीं। इससे सिद्ध होता है कि सफलता के लिए बाहरी रंग-रूप नहीं, व्यक्तित्व और योग्यता महत्त्वपूर्ण हैं।
Answer: किन्हीं तीन उपभागों के उत्तर: (क) आनंद-कानन, गंगा-जमुनी संस्कृति, संगीत-साहित्य परंपरा; (ख) देखे बिना पूर्वग्रह; (ग) आत्मरक्षा, आरामदायक जीवन, लोक कल्याण; (घ) व्यक्तित्व और गुण रंग-रूप से बड़े हैं
Where the marks are
- (क) कोई दो उपयुक्त बिंदु (1+1 = 2 अंक)
- (ख) पूर्वग्रह का भाव और कारण (2 अंक)
- (ग) कोई दो प्रेरणाएँ (1+1 = 2 अंक)
- (घ) पाठ-संदर्भ सहित तर्कपूर्ण उत्तर (2 अंक)
Every यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत question, by year
Course A (6 questions, sample papers included)
Course B (0 questions, sample papers included)
Practice questions on यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 1 mark · MCQBoard level
बालाजी मंदिर पर रोज़ शहनाई बजाने के बदले अमीरुद्दीन को क्या मेहनताना मिलता था?
(क) छः पैसे
(ख) एक अठन्नी
(ग) दो पैसे
(घ) एक रुपयाHint
वही कमाई जिससे वह सुलोचना की फ़िल्म देखने जाता था।
Answer
(ख) एक अठन्नी। इसी कमाई से वह सुलोचना की नयी फ़िल्में देखता और कुलसुम की कचौड़ी खाता था। (छः पैसे थर्ड क्लास टिकट का दाम था।)
Q2 · 2 marks · Short answerBoard level
काशी के संकटमोचन मंदिर में होने वाले संगीत आयोजन का परिचय दीजिए।
Hint
स्थान, अवसर, अवधि और बिस्मिल्ला खाँ की उपस्थिति—चारों बातें लिखिए।
Answer
उत्तर-बिंदु: शहर के दक्षिण में लंका पर स्थित मंदिर; हनुमान जयंती का अवसर; पाँच दिन शास्त्रीय-उपशास्त्रीय गायन-वादन; बिस्मिल्ला खाँ अवश्य शामिल।
आदर्श उत्तर: काशी के दक्षिण में लंका पर स्थित संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती पर पाँच दिनों तक शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन-वादन की सभा होती है, जिसमें बिस्मिल्ला खाँ अवश्य रहते थे।
Q3 · 2 marks · Short answerHarder board level
फटी तहमद पर शिष्या के टोकने पर खाँ साहब ने जो उत्तर दिया, उससे उनके कौन-से जीवन-मूल्य सामने आते हैं?
Hint
भारतरत्न किस चीज़ पर मिला है—शहनाई पर या लुंगी पर?
Answer
उत्तर-बिंदु: सम्मान कला के कारण मिला, कपड़ों के कारण नहीं; बनाव-सिंगार में लगते तो रियाज़ न हो पाता; सादगी और कला-निष्ठा।
आदर्श उत्तर: खाँ साहब के अनुसार भारतरत्न शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं। वे बनाव-सिंगार से अधिक सुर और रियाज़ को महत्त्व देते थे। इससे उनकी सादगी और कला-निष्ठा दिखती है।
Q4 · 2 marks · Short answerHarder board level
'उस फकीर की दुआ लगी जिसने अमीरुद्दीन से कहा था—"बजा, बजा।"'—इस पंक्ति के संदर्भ में बताइए कि खाँ साहब के हाथों शहनाई को क्या स्थान मिला।
Hint
डेढ़ सतक से दो सतक का साज और 'साजों की कतार में सरताज'।
Answer
उत्तर-बिंदु: शहनाई डेढ़ सतक के साज से दो सतक का साज बनी; साजों की कतार में सरताज हो गई; लेखक इसे फकीर की दुआ का फल मानता है।
आदर्श उत्तर: खाँ साहब की साधना से शहनाई साधारण साज से साजों की कतार में सरताज बन गई। लेखक इसे फकीर की 'बजा, बजा' वाली दुआ का फल बताता है।
Q5 · 2 marks · Short answerHarder board level
काशी से बाहर रहने पर भी बिस्मिल्ला खाँ काशी से किस प्रकार जुड़े रहते थे? इससे उनके बारे में क्या पता चलता है?
Hint
वे किस दिशा में मुँह करके बैठते थे और शहनाई का प्याला किधर घुमाते थे?
Answer
उत्तर-बिंदु: विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठना; उसी ओर शहनाई का प्याला घुमाना; भीतर की आस्था रीड से बजना; काशी-प्रेम और श्रद्धा।
आदर्श उत्तर: काशी से बाहर होने पर वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठते और उसी ओर शहनाई का प्याला घुमाते। इससे उनकी आस्था और काशी-प्रेम झलकता है।
Q6 · 2 marks · Short answerHarder board level
लेखक के अनुसार बिस्मिल्ला खाँ भविष्य में संगीत के नायक किस कारण बने रहेंगे? उनकी सबसे बड़ी देन क्या है?
Hint
पाठ का अंतिम अनुच्छेद—पुरस्कार नहीं, कुछ और।
Answer
उत्तर-बिंदु: भारतरत्न, पद्मविभूषण आदि सम्मानों के कारण नहीं; अजेय संगीतयात्रा के कारण; अस्सी बरस संगीत को संपूर्णता से सीखने की जिजीविषा जीवित रखना सबसे बड़ी देन।
आदर्श उत्तर: भारतरत्न, पद्मविभूषण जैसे सम्मानों से नहीं, बल्कि अपनी अजेय संगीतयात्रा के कारण वे नायक रहेंगे। अस्सी बरस तक संगीत सीखने की ललक को जीवित रखना उनकी सबसे बड़ी देन है।
Q7 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
मान लीजिए आपके मोहल्ले में हर साल लगने वाला पुराना मेला अब बंद हो गया है। सन् 2000 की काशी को लेकर बिस्मिल्ला खाँ की पीड़ा से इसकी तुलना करते हुए बताइए कि परंपराएँ बचाना क्यों ज़रूरी है।
Hint
मलाई बरफ़, कचौड़ी-जलेबी, कजली-चैती और रियाज़ का आदर—खाँ साहब को क्या-क्या खलता था?
Answer
उत्तर-बिंदु: खाँ साहब को मलाई बरफ़, देशी घी की कचौड़ी, संगतियों का आदर, घंटों के रियाज़ और कजली-चैती के जमाने की कमी खलती थी; परंपराएँ पहचान और मेल-जोल से जुड़ी हैं।
आदर्श उत्तर: जैसे मलाई बरफ़, कजली-चैती और रियाज़ का आदर खोने पर खाँ साहब दुखी थे, वैसे ही मेला खोना हमारी पहचान खोना है। परंपराएँ समाज को जोड़ती हैं, इन्हें बचाना ज़रूरी है।
Q8 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
क्या केवल जन्मजात प्रतिभा से कोई महान कलाकार बन सकता है? बिस्मिल्ला खाँ के जीवन के आधार पर अपना मत तर्क सहित दीजिए।
Hint
बचपन की सम की समझ (प्रतिभा) और नौबतखाने का रियाज़ व अस्सी बरस की प्रार्थना (साधना)—दोनों को जोड़िए।
Answer
उत्तर-बिंदु: बचपन में ही सम पर आने की तमीज़ (प्रतिभा); किशोरावस्था में नौबतखाने में रियाज़; अस्सी बरस सच्चे सुर की प्रार्थना; निष्कर्ष—प्रतिभा को साधना निखारती है।
आदर्श उत्तर: नहीं। बचपन से सम की पहचान होने पर भी बिस्मिल्ला खाँ ने किशोरावस्था में नौबतखाने में रियाज़ किया और अस्सी बरस सुर माँगा। प्रतिभा को साधना ही निखारती है।
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1.बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम क्या था और जन्म कहाँ हुआ?Show answer
अमीरुद्दीन; जन्म डुमराँव (बिहार) में, फिर ननिहाल काशी आ गए।
2.अमीरुद्दीन के दोनों मामा कौन थे?Show answer
सादिक हुसैन और अलीबख्श—देश के जाने-माने शहनाई वादक।
3.किन गायिका बहनों को सुनकर संगीत के प्रति आसक्ति मिली?Show answer
रसूलनबाई और बतूलनबाई; उनकी ठुमरी, टप्पे, दादरा से।
4.शहनाई को कौन-सी उपाधि दी गई है और क्यों?Show answer
'शाहेनय' अर्थात् 'सुषिर वाद्यों में शाह'; अरब में नाड़ी वाले फूँक-वाद्य को 'नय' कहते हैं।
5.नमाज़ के बाद सज़दे में खाँ साहब क्या माँगते थे?Show answer
'मेरे मालिक एक सुर बख्श दे।'—सच्चा सुर, जिसकी तासीर से आँखों से सच्चे मोती जैसे आँसू निकलें।
6.'संगीतमय कचौड़ी' किसकी दुकान की थी?Show answer
पक्का महाल की कुलसुम हलवाइन की; छन्न की आवाज़ में खाँ साहब को आरोह-अवरोह दिखते थे।
7.खाँ साहब काशी क्यों नहीं छोड़ना चाहते थे?Show answer
वहाँ गंगा मइया, बाबा विश्वनाथ, बालाजी मंदिर हैं; खानदान की कई पुश्तों ने वहाँ शहनाई बजाई; वहीं तालीम और अदब पाई।
8.खाँ साहब का निधन कब और किस आयु में हुआ?Show answer
21 अगस्त 2006 को, नब्बे वर्ष की आयु में।
Quick revision checklist
The night before the exam: can you do each of these without looking?
- क्या आप बता सकते हैं कि डुमराँव और शहनाई एक-दूसरे के लिए उपयोगी क्यों हैं (नरकट, सोन नदी, रीड)?
- क्या आप 'सुषिर वाद्य', 'शाहेनय' और 'नागस्वरम्' का संबंध बिना देखे लिख सकते हैं?
- क्या आप मुहर्रम की आठवीं तारीख को खाँ साहब क्या करते थे—नौहा, 8 किलोमीटर, कोई राग नहीं—याद कर सकते हैं?
- क्या आप बचपन के तीन प्रसंग—मीठी शहनाई की खोज, सम पर पत्थर, छः पैसे का टिकट—क्रम से सुना सकते हैं?
- क्या आप फटी तहमद प्रसंग का आशय 25-30 शब्दों में, बिना कहानी दोहराए, लिख सकते हैं?
- क्या आप काशी को 'संस्कृति की पाठशाला' कहने के दो कारण तुरंत बता सकते हैं?
- क्या आप सन् 2000 तक काशी में खाँ साहब को खलने वाली कम से कम तीन कमियाँ गिना सकते हैं?
- क्या आप बता सकते हैं कि लेखक के अनुसार खाँ साहब की सबसे बड़ी देन पुरस्कार नहीं, बल्कि क्या है?
यतींद्र मिश्र – नौबतखाने में इबादत: frequently asked questions
'नौबतखाने में इबादत' शीर्षक का क्या अर्थ है?
नौबतखाना प्रवेश द्वार के ऊपर मंगलध्वनि बजाने का स्थान है और इबादत का अर्थ उपासना है। बिस्मिल्ला खाँ बालाजी मंदिर के नौबतखाने में शहनाई बजाते थे और संगीत को पूजा मानते थे। इसलिए यह शीर्षक उनकी संगीत साधना को इबादत के रूप में दिखाता है।
शहनाई की दुनिया में डुमराँव का क्या महत्त्व है?
शहनाई बजाने के लिए रीड का प्रयोग होता है, जो नरकट नाम की घास से बनती है। यह घास डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारे मिलती है। साथ ही डुमराँव बिस्मिल्ला खाँ का जन्म-स्थान भी है।
बिस्मिल्ला खाँ को संगीत की प्रेरणा किनसे मिली?
उन्हें आरंभिक प्रेरणा रसूलनबाई और बतूलनबाई के गायन से मिली। इसके अलावा नाना की शहनाई, मामू अलीबख्श खाँ का वादन और बालाजी मंदिर का नौबतखाना भी उनकी साधना का आधार बने। एक फकीर की दुआ 'बजा, बजा' का भी पाठ में उल्लेख है।
बिस्मिल्ला खाँ को मिली-जुली संस्कृति का प्रतीक क्यों कहा जाता है?
वे पक्के नमाज़ी थे और मुहर्रम में शोक मनाते थे, पर बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे और काशी विश्वनाथ में भी गहरी श्रद्धा रखते थे। संकटमोचन मंदिर के संगीत समारोह में वे अवश्य जाते थे। इस तरह वे दो कौमों को भाईचारे की प्रेरणा देते रहे।
मुहर्रम में बिस्मिल्ला खाँ क्या करते थे?
मुहर्रम के दस दिनों में उनके खानदान का कोई व्यक्ति शहनाई नहीं बजाता था और न संगीत कार्यक्रम में शामिल होता था। आठवीं तारीख को वे खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंडी से फातमान तक लगभग आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए नौहा बजाते थे। उस दिन कोई राग नहीं बजाया जाता था।
काशी में हो रहे किन परिवर्तनों से बिस्मिल्ला खाँ दुखी थे?
पक्का महाल से मलाई बरफ़ बेचने वाले चले गए थे और देसी घी व कचौड़ी-जलेबी में पहले जैसी बात नहीं रही। गायकों के मन में संगतियों के लिए आदर नहीं रहा और घंटों रियाज़ को कोई नहीं पूछता था। कजली, चैती और अदब का पुराना ज़माना खो रहा था।
Based on: CBSE हिंदी पाठ्यक्रम-अ (002), कक्षा 10, 2026-27; NCERT क्षितिज भाग 2 (Reprint 2026-27), नौबतखाने में इबादत