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HindiCBSE Class 10 · Chapter 2

गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन Class 10: सार, पात्र और मूल भाव

Updated 14 October 2026 · Fact-checked

'सपनों के-से दिन' संचयन भाग 2 का पाठ है, जिसमें गुरदयाल सिंह अपने बचपन, खेल-कूद, छुट्टियों, स्कूल के डर और दो अध्यापकों, कठोर पीटी प्रीतमचंद और स्नेही हेडमास्टर शर्मा जी, की यादें सुनाते हैं। बोर्ड परीक्षा में इस पर 50-60 शब्दों के 3 अंक वाले प्रश्न पूछे जाते हैं।

What गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन is about

'सपनों के-से दिन' संचयन भाग 2 (हिंदी पाठ्यक्रम-ब) का दूसरा पाठ है। इसके लेखक गुरदयाल सिंह हैं। लेखक 'मैं' बनकर अपने बचपन की यादें सुनाते हैं, इसलिए इसकी शैली संस्मरण जैसी है। पाठ एक पंक्ति में: गरीब परिवारों के बच्चों का खेल-प्रेम, स्कूल का डर, छुट्टियों का मज़ा और कठोर व स्नेही अध्यापकों के अनुशासन का अंतर।

बोर्ड पेपर में यह पाठ खंड ग के प्रश्न 11 (पूरक पाठ्यपुस्तक संचयन) में आता है। वहाँ तीन में से दो प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में लिखने होते हैं, हर प्रश्न 3 अंक का है। इस पुस्तक पर गद्यांश-आधारित प्रश्न नहीं आते, इसलिए पूरे पाठ की घटनाएँ, पात्रों की विशेषताएँ और पाठ का संदेश अच्छी तरह याद होना चाहिए।

In real board papers: Course A, not asked in any of the 21 board papers we hold (2023 to 2026); Course B, asked in 1 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.3 marks per paper. See the questions

गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन: summary

In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.

लेखक बताते हैं कि उनके साथ खेलने वाले सभी बच्चे नंगे पाँव, फटे कपड़ों और बिखरे बालों वाले होते थे। खेल में चोट खाकर घर लौटते तो माँ-बाप तरस खाने के बजाय पिटाई करते, फिर भी अगले दिन बच्चे फिर खेलने आ जाते। इसका कारण लेखक को बाद में अध्यापक-प्रशिक्षण में बाल-मनोविज्ञान पढ़कर समझ आया।

अधिकतर साथी स्कूल नहीं जाते थे। दुकानदार भी सोचते थे कि बेटे को तहसीलदार थोड़े ही बनाना है; पंडत घनश्याम दास से लंडे सीखकर वह दुकान की बहियाँ लिख लेगा। आधे से ज़्यादा साथी राजस्थान या हरियाणा से आए परिवारों के थे। उनकी बोली अलग थी, पर खेलते समय सब एक-दूसरे की बात समझ लेते। स्कूल में बैठना सबको 'कैद' लगता था।

लेखक को स्कूल के रास्ते के अलियार के झाड़ों और फूलों की महक आज भी याद है। नयी श्रेणी में जाने पर बड़े होने का उत्साह होता, पर किताबों-कापियों की गंध से मास्टरों का डर जाग जाता। छुट्टियों में वे माँ के साथ ननिहाल जाते, जहाँ नानी दूध-दही खिलाती और वे तालाब में नहाते। ननिहाल न जा पाते तो अपने यहाँ के तालाब और रेतीले टीले पर खेलते। छुट्टियाँ खत्म होने लगतीं तो काम का हिसाब लगाते; हिसाब के मास्टर जी दो सौ सवाल देते। काम न होने पर कुछ बच्चे पिटाई को 'सस्ता सौदा' मानते, और ऐसे में उनका नेता ओमा होता, जो सिर की टक्कर से लड़ता था।

स्कूल में हेडमास्टर मदनमोहन शर्मा नरम स्वभाव के थे, जबकि पीटी मास्टर प्रीतमचंद बहुत कठोर थे। फिर भी स्काउटिंग और परेड में पीटी साहब की 'शाबाश' बच्चों को फ़ौज के तमगों जैसी लगती। लेखक को हर साल शर्मा जी की लाई पुरानी किताबें मिलतीं; इसी कारण उनकी पढ़ाई चलती रही। वे अपने दो परिवारों में स्कूल जाने वाले पहले लड़के थे।

दूसरे विश्व-युद्ध के समय नौटंकी वाले गाने गाकर लोगों को फ़ौज में भरती होने के लिए लुभाते थे। एक दिन चौथी श्रेणी में फ़ारसी का शब्द-रूप कोई न सुना पाया, तो प्रीतमचंद ने सबको पीठ ऊँची करके कान पकड़वाए। शर्मा जी ने यह बर्बरता देखी, उन्हें रोका और मुअत्तल करके आदेश मंजूरी के लिए नाभा भेज दिया। पीटी साहब निश्चिंत होकर अपने चौबारे में तोतों को बादाम खिलाते रहे। बच्चों को यह अलौकिक लगता था कि इतना कठोर आदमी तोतों से मीठी बातें कैसे कर लेता है।

Themes and message

बचपन का खेल-प्रेम और बाल-मनोविज्ञान

पाठ दिखाता है कि बच्चों के लिए खेल सबसे प्यारी चीज़ है। चोट लगने और घर पर बुरी पिटाई होने के बाद भी बच्चे अगले दिन फिर खेलने पहुँच जाते थे। लेखक कहते हैं कि यह बात उन्हें तब समझ आई जब उन्होंने अध्यापक बनने के प्रशिक्षण में बाल-मनोविज्ञान पढ़ा। इससे पता चलता है कि खेल बच्चे की स्वाभाविक ज़रूरत है, उसे डर या मार से रोका नहीं जा सकता। बड़ों को बच्चों का यह मन समझना चाहिए।

From the text: फटे कपड़ों और छिले घुटनों पर माँ-बहनें 'और पिटाई करतीं', फिर भी बच्चे 'दूसरे दिन फिर खेलने चले आते'। लेखक ने यह बात प्रशिक्षण में बाल-मनोविज्ञान पढ़कर समझी।

शिक्षा के प्रति उदासीनता और गरीबी

उस समय गरीब और व्यापारी परिवार पढ़ाई को ज़रूरी नहीं मानते थे। दुकानदार सोचते थे कि लंडे और मुनीमी सीख लेना ही काफ़ी है। एक रुपया भी बड़ी रकम थी, इसलिए खाते-पीते घरों के लड़के ही स्कूल जाते। लेखक की पढ़ाई भी इसीलिए चल पाई कि उन्हें शर्मा जी से पुरानी किताबें मिल जाती थीं। इससे पता चलता है कि छोटी-सी मदद किसी बच्चे का भविष्य बदल सकती है।

From the text: "मास्टर जी हमने इसे क्या तहसीलदार लगवाना है।" और लेखक का कथन कि नयी किताबें लानी पड़तीं तो पढ़ाई तीसरी-चौथी श्रेणी में छूट जाती; "हमारे दो परिवारों में मैं पहला लड़का था जो स्कूल जाने लगा था।"

कठोर दंड बनाम स्नेहपूर्ण अनुशासन

पाठ अनुशासन के दो तरीके सामने रखता है। पीटी प्रीतमचंद डर और मारपीट से अनुशासन रखते थे, इसलिए बच्चे उनसे डरते भी थे और नफ़रत भी करते थे। हेडमास्टर शर्मा जी हल्की-सी चपत से काम चलाते थे, जो बच्चों को मज़ेदार लगती थी। जब पीटी साहब ने चौथी श्रेणी के बच्चों को क्रूर सज़ा दी, तो शर्मा जी ने उसे रोका और उन्हें मुअत्तल कर दिया। पाठ की पाद-टिप्पणी में भी लिखा है कि आजकल स्कूलों में विद्यार्थियों को पीटना मना है। इससे संदेश मिलता है कि बच्चों को डर से नहीं, समझ और स्नेह से सिखाना चाहिए।

From the text: पीटी साहब ने शब्द-रूप न सुनाने पर बच्चों को पीठ ऊँची करके कान पकड़वाए; शर्मा जी बोले: "क्या चौथी श्रेणी को सजा देने का यह ढंग है? इसे फौरन बंद करो।"

भाषा से बड़ी मित्रता

लेखक के आधे से अधिक साथी राजस्थान या हरियाणा से आए परिवारों के थे। छोटे होने पर बच्चे उनकी बोली कम समझ पाते थे और कुछ शब्दों पर हँसी भी आती थी। पर खेल के समय सब एक-दूसरे की बात अच्छी तरह समझ लेते थे। इससे पता चलता है कि भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती; मेल-जोल और साथ खेलने का भाव हर दूरी मिटा देता है।

From the text: "परंतु खेलते तो सभी एक-दूसरे की बात खूब अच्छी तरह समझ लेते।"

बचपन की मधुर-कड़वी यादें

पाठ का नाम ही बताता है कि बचपन के दिन अब सपने जैसे लगते हैं। लेखक को अलियार के झाड़ों और मोतिया की कलियों की महक, ननिहाल का दूध-दही, तालाब में नहाना सब याद है। साथ ही छुट्टियाँ खत्म होने का डर, नयी किताबों की गंध से आने वाली उदासी और पिटाई का भय भी याद है। इससे पता चलता है कि बचपन में खुशी और डर दोनों गहरे बैठते हैं और जीवन भर याद रहते हैं।

From the text: "बचपन में घास अधिक हरी और फूलों की सुगंध अधिक मनमोहक लगती है।" छुट्टियों के आख़िरी दिनों में 'प्रत्येक दिन डर बढ़ता चला जाता'।

Characters

लेखक (गुरदयाल सिंह, बालक रूप में)

कथावाचक; अपने बचपन और स्कूली दिनों की यादें सुनाने वाला

  • संवेदनशील और कल्पनाशील
  • पढ़ाई और मार से डरने वाला
  • ईमानदार, अपनी कमज़ोरी खुलकर मानने वाला
  • सीखने की लगन रखने वाला

संवेदनशीलता: उन्हें अलियार के झाड़ों और मोतिया की महक आज भी महसूस होती है। डर: नयी कापियों और पुरानी किताबों की गंध से उनका मन उदास हो जाता था। ईमानदारी: वे स्वयं को 'सबसे कमज़ोर शरीर वाले' बताते हैं और मानते हैं कि वे पिटाई से बहुत डरते थे। लगन: अपने दो परिवारों में स्कूल जाने वाले वे पहले लड़के थे और पुरानी किताबों के सहारे लगभग सात साल स्कूल में पढ़े।

पीटी मास्टर प्रीतमचंद

स्कूल के कठोर पीटी अध्यापक, जो स्काउटिंग-परेड और चौथी श्रेणी को फ़ारसी भी पढ़ाते थे

  • अत्यंत कठोर और अनुशासनप्रिय
  • बच्चों के प्रति निर्दयी
  • स्काउटिंग-परेड में कुशल
  • निश्चिंत और स्वाभिमानी
  • पक्षियों के प्रति कोमल

कठोरता: कतार में कोई सिर हिलाता तो वे 'बाघ की तरह झपट पड़ते'। निर्दयता: शब्द-रूप न सुनाने पर बच्चों से पीठ ऊँची करवाकर कान पकड़वाए। कुशलता: परेड में उनकी 'शाबाश' बच्चों को फ़ौज के तमगों जैसी लगती थी। निश्चिंतता: मुअत्तल होने की उन्हें 'रत्ती भर भी चिंता नहीं थी'। कोमलता: वे अपने दो तोतों को भिगोए बादाम खिलाते और उनसे बातें करते थे।

हेडमास्टर मदनमोहन शर्मा

स्कूल के प्रधानाध्यापक, जो पाँचवीं और आठवीं श्रेणी को अंग्रेज़ी पढ़ाते थे

  • नरम और स्नेही स्वभाव
  • बाल-मनोविज्ञान को समझने वाले
  • अन्याय का विरोध करने वाले
  • परोपकारी

नरमी: गुस्से में भी वे बस उँगलियों से हल्की 'चपत' लगाते, जिस पर बच्चे हँस देते। बच्चों की समझ: प्रार्थना में सीधी कतारें देखकर उनका चेहरा खिल उठता। अन्याय-विरोध: पीटी साहब की बर्बरता देखकर उन्होंने उसे फौरन रुकवाया और उन्हें मुअत्तल करके आदेश नाभा भेजा। परोपकार: वे हर साल धनी लड़के की पुरानी किताबें लेखक को ला देते थे।

ओमा

लेखक का सहपाठी, जिसे काम न करने वाले बच्चे अपना 'नेता' मानते थे

  • निडर और दबंग
  • अनोखी शक्ल-सूरत वाला
  • लड़ाकू
  • पिटाई से न डरने वाला

शक्ल: 'हाँड़ी जितना बड़ा सिर' और ठिगना शरीर। लड़ाकू स्वभाव: "लड़ाई वह हाथ-पाँव नहीं, सिर से किया करता।" उसकी टक्कर को बच्चों ने 'रेल-बम्बा' नाम दिया था। निडरता: छुट्टियों का काम न करके पिटाई को 'सस्ता सौदा' मानने वाले बच्चों का वह सबसे बड़ा नेता था।

नानी

लेखक की नानी, जिनके घर वे छुट्टियों में जाते थे

  • स्नेहमयी
  • उदार
  • नाती की बातों पर प्रसन्न होने वाली

नानी 'खूब दूध-दही, मक्खन खिलाती, बहुत प्यार करती'। वे लेखक के बोलने के ढंग से खुश होतीं और अपने पोतों को भी वैसा ही बोलने-खाने को कहतीं।

How it is written

DeviceExampleEffect
आत्मकथात्मक (संस्मरण) शैली और पूर्वदीप्तिलेखक 'मैं' बनकर बचपन की बातें बताते हैं और बीच-बीच में कोष्ठक में आज की समझ जोड़ते हैं, जैसे बाल-मनोविज्ञान पढ़ने के बाद खेल-प्रेम का कारण समझना।पाठ सच्चा और आत्मीय लगता है। बचपन की भावना और बड़े होकर की गई समझ दोनों साथ दिखती हैं।
हास्य और व्यंग्यओमा का सिर ऐसा लगता 'जैसे बिल्ली के बच्चे के माथे पर तरबूज रखा हो'; शर्मा जी की चपत 'भाई भीखे की नमकीन पापड़ी' जैसी मज़ेदार लगती। पिटाई को 'सस्ता सौदा' मानने वालों को 'बहादुर' कहा गया है।गंभीर बातें (मार, डर, गरीबी) भी हल्के-फुल्के ढंग से कही जाती हैं, इससे पाठ रोचक बनता है और व्यंग्य उभरता है।
तुलना और विरोधाभासकठोर पीटी प्रीतमचंद और नरम शर्मा जी का अंतर; बच्चों को पीटने वाले प्रीतमचंद का तोतों से मीठी-मीठी बातें करना।पात्र एकदम सजीव लगते हैं और पाठक सोचता है कि एक ही व्यक्ति में कठोरता और कोमलता दोनों हो सकती हैं।
उपमा और मुहावरेपरेड करते हुए लगता 'जैसे हम विद्यार्थी नहीं, बहुत महत्त्वपूर्ण आदमी हों'; पीटी साहब 'खाल खींचने' के मुहावरे को 'प्रत्यक्ष करके दिखा देते'; 'चमड़ी उधेड़ना'।भाषा चित्रात्मक बनती है; बच्चों का डर और गर्व आँखों के सामने आ जाता है।
लोकभाषा और लोकगीत का प्रयोगपंजाबी लोकोक्ति 'एह खेडण दे दिन चार' और नौटंकी वालों का भरती गीत 'भरती हो जा रे रंगरूट'।उस समय का वातावरण, पंजाब की रियासत का माहौल और फ़ौजी भरती का लालच जीवंत हो उठता है।

Key quotations

Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.

  • परंतु खेलते तो सभी एक-दूसरे की बात खूब अच्छी तरह समझ लेते।

    लेखक (कथावाचक): राजस्थान-हरियाणा से आए साथियों की बोली अलग होने की बात के बाद।

    यह सिद्ध करता है कि भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती; खेल और मित्रता लोगों को जोड़ देते हैं।

  • मास्टर जी हमने इसे क्या तहसीलदार लगवाना है।

    परचूनिये-आढ़तीये (बच्चों के अभिभावक): अध्यापक से बात होने पर दुकानदार अपने बच्चों को स्कूल न भेजने का कारण बताते थे।

    उस समय के समाज की शिक्षा के प्रति उदासीनता और संकुचित सोच दिखती है।

  • बचपन में घास अधिक हरी और फूलों की सुगंध अधिक मनमोहक लगती है।

    लेखक (किसी पुस्तक में पढ़ा वाक्य): लेखक बताते हैं कि यह वाक्य आधी शती पहले पढ़ा था, पर आज तक याद है।

    बचपन की भावनाओं की ताज़गी बताता है; पाठ के शीर्षक 'सपनों के-से दिन' से जुड़ता है।

  • लड़ाई वह हाथ-पाँव नहीं, सिर से किया करता।

    लेखक (कथावाचक): छुट्टियों का काम न करने वाले बच्चों के नेता ओमा का वर्णन।

    ओमा की अनोखी, दबंग छवि उभरती है; उसकी टक्कर का नाम 'रेल-बम्बा' इसी से पड़ा।

  • जैसे हमने किसी फ़ौज के सभी तमगे जीत लिए हों

    लेखक (कथावाचक): स्काउटिंग में गलती न करने पर पीटी साहब की 'शाबाश' कैसी लगती थी।

    रोज़ डाँटने वाले की एक प्रशंसा बच्चों के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार थी; इससे पता चलता है कि प्रशंसा बच्चों पर गहरा असर डालती है।

  • क्या चौथी श्रेणी को सजा देने का यह ढंग है? इसे फौरन बंद करो।

    हेडमास्टर शर्मा जी (अंग्रेज़ी वाक्य का अर्थ, बड़े लड़कों के बताए अनुसार): पीटी साहब बच्चों को पीठ ऊँची करवाकर कान पकड़वा रहे थे, तभी शर्मा जी आ गए।

    शर्मा जी की संवेदनशीलता और अन्याय-विरोध दिखता है; यही घटना पीटी साहब के मुअत्तल होने का कारण बनी।

  • वह अपने तोतों से मीठी-मीठी बातें कैसे कर लेते थे?

    लेखक (कथावाचक): मुअत्तल होने के बाद पीटी साहब चौबारे में आराम से तोतों को बादाम खिलाते थे।

    पीटी साहब के चरित्र का दूसरा, कोमल पक्ष सामने आता है; बच्चों को यह 'अलौकिक' लगता था।

  • हमारे दो परिवारों में मैं पहला लड़का था जो स्कूल जाने लगा था।

    लेखक (कथावाचक): पुरानी किताबें मिलने और पढ़ाई के खर्च की बात के बाद।

    लेखक के घर में पढ़ाई का माहौल न होने और गरीबी के बीच उनकी शिक्षा की कठिन शुरुआत बताता है।

गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन in real life

Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.

बच्चों के लिए खेल की ज़रूरत

मान लीजिए आपके पड़ोस में एक बच्चे को उसके माता-पिता हर शाम केवल ट्यूशन भेजते हैं और खेलने से मना करते हैं। बच्चा चिड़चिड़ा रहने लगा है।

पाठ के बाल-मनोविज्ञान वाले प्रसंग के आधार पर माता-पिता को क्या सलाह देंगे?

Try it first, then show the solutionSolution
  1. पाठ: पिटाई के बाद भी बच्चे अगले दिन फिर खेलने आते थे।
  2. कारण: खेल बच्चे की स्वाभाविक ज़रूरत है।
  3. सलाह: पढ़ाई के साथ खेल का समय भी दें, ताकि बच्चा खुश और स्वस्थ रहे।

Answer: पाठ बताता है कि पिटाई के बाद भी बच्चे खेलने आते थे, क्योंकि खेल उनकी स्वाभाविक ज़रूरत है। माता-पिता को पढ़ाई के साथ खेल का समय भी देना चाहिए।

Memory hook: पिटाई के बाद भी अगले दिन मैदान में: खेल बचपन की साँस है।

पुरानी किताबों से किसी की पढ़ाई बचाना

कल्पना कीजिए कि आप दसवीं पास करके ग्यारहवीं में जा रहे हैं। आपकी गली में एक बच्चा किताबें न खरीद पाने के कारण पढ़ाई छोड़ने की सोच रहा है।

शर्मा जी के उदाहरण से बताइए कि आप क्या कर सकते हैं।

Try it first, then show the solutionSolution
  1. पाठ: शर्मा जी की लाई पुरानी किताबों से लेखक की पढ़ाई सात साल चली।
  2. प्रयोग: अपनी दसवीं की किताबें उस बच्चे को देना।
  3. विस्तार: स्कूल में पुरानी किताबों का बैंक बनाना।

Answer: शर्मा जी की पुरानी किताबों ने लेखक की पढ़ाई बचाई थी। मैं अपनी पुरानी किताबें उस बच्चे को दूँगा और स्कूल में पुरानी किताबों का बैंक बनाने का सुझाव दूँगा।

Memory hook: शर्मा जी की पुरानी किताब = किसी की नयी ज़िंदगी।

डर नहीं, प्रोत्साहन से सीखना

मान लीजिए आपके कोच हर गलती पर चिल्लाते हैं, पर एक दिन सही शॉट पर 'शाबाश' कहते हैं और पूरी टीम का उत्साह बढ़ जाता है।

पीटी साहब की 'शाबाश' वाले प्रसंग से इसे जोड़िए।

Try it first, then show the solutionSolution
  1. पाठ: कठोर प्रीतमचंद की एक 'शाबाश' फ़ौज के तमगों जैसी लगती।
  2. सीख: प्रशंसा का प्रभाव डर से कहीं अधिक गहरा होता है।
  3. निष्कर्ष: अध्यापक और कोच प्रोत्साहन से बेहतर परिणाम पा सकते हैं।

Answer: जैसे प्रीतमचंद की एक 'शाबाश' बच्चों को तमगे जैसी लगती थी, वैसे ही कोच की प्रशंसा टीम का उत्साह बढ़ाती है। डर से अधिक प्रोत्साहन सिखाता है।

Memory hook: सौ डाँट पर एक 'शाबाश' भारी।

Topics in this chapter

  • पीटी साहब (प्रीतमचंद) का चरित्र-चित्रणComing soon
  • सपनों के-से दिन प्रश्न-उत्तर (बोध-प्रश्न)Coming soon
  • हेडमास्टर शर्मा जी और पीटी साहब की तुलनाComing soon
  • छुट्टियों का काम और ओमा का चरित्रComing soon
  • सपनों के-से दिन का मूल भाव और संदेशComing soon

How the board asks गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन

The question patterns to expect, and the method that works for each.

Question typeHow it is askedMethod
चरित्र-चित्रणपीटी प्रीतमचंद, हेडमास्टर शर्मा जी या ओमा की चारित्रिक विशेषताएँ 50-60 शब्दों में लिखने को कहा जाता है; कभी 'पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर' जोड़ा जाता है।तीन विशेषताएँ लिखें और हर एक के साथ पाठ की एक घटना दें, जैसे कठोरता के साथ फ़ारसी वाली सज़ा, कोमलता के साथ तोतों को बादाम खिलाना। अंत में एक पंक्ति में अपनी राय दें। शब्द-सीमा 50-60 रखें।
तुलनाहेडमास्टर शर्मा जी और पीटी साहब के स्वभाव या अनुशासन के तरीकों की तुलना कीजिए; आज की मान्यताओं से जोड़कर विचार लिखिए।पहले दोनों का तरीका एक-एक वाक्य में (मार-पीट और डर बनाम हल्की चपत और स्नेह), फिर एक घटना (मुअत्तल करना)। अंत में बताएँ कि आज स्कूलों में पीटना मना है और बच्चे स्नेह से अधिक सीखते हैं।
कारण बताइएशर्मा जी ने पीटी साहब को मुअत्तल क्यों किया; नयी किताबों की गंध से लेखक उदास क्यों होता था; 'शाबाश' तमगों-सी क्यों लगती थी; बच्चे ओमा को नेता क्यों मानते थे।सीधे कारण से उत्तर शुरू करें, फिर पाठ की घटना और उसका परिणाम लिखें। उदाहरण: बर्बर सज़ा देखी, फौरन रोका, मुअत्तल कर आदेश मंजूरी के लिए नाभा भेजा।
मूल्य-आधारित / अपने जीवन से जोड़ना (HOTS)क्या आप ओमा जैसे किसी को अपना आदर्श बनाना चाहेंगे? खेल बच्चों के लिए क्यों ज़रूरी है? कठोर दंड उचित है या नहीं? तर्कसहित उत्तर दीजिए।पहले पाठ का संबंधित तथ्य एक वाक्य में, फिर अपनी स्पष्ट राय और दो तर्क। राय के दोनों पक्ष देखें (जैसे ओमा का साहस अच्छा, पर काम से बचना और सिर से लड़ना ठीक नहीं)। भाषा शालीन रखें।
पाठ का संदेश / शीर्षक'सपनों के-से दिन' शीर्षक की सार्थकता या पाठ का मूल भाव लिखिए; पाठ से सिद्ध कीजिए कि भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती।बचपन की मधुर (खेल, ननिहाल, फूलों की महक) और कड़वी (डर, मार) दोनों तरह की यादें गिनाएँ; बताएँ कि ये अब सपनों जैसी लगती हैं। संदेश स्पष्ट शब्दों में लिखें।

Tricks to remember गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन

Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.

  • पाठ का क्रम: 'खेल-स्कूल-ननिहाल-ओमा-प्रीतमचंद-शर्मा-किताबें-मुअत्तल-तोते'

    खेल में चोट और पिटाई → स्कूल 'कैद' → ननिहाल की छुट्टियाँ → दो सौ सवाल, ओमा का 'सस्ता सौदा' → प्रीतमचंद की कठोरता और 'शाबाश' → शर्मा जी का नरम स्वभाव → पुरानी किताबें → प्रीतमचंद मुअत्तल → तोतों को बादाम।

    Use it when: प्रश्न किस प्रसंग का है, यह तुरंत पहचानें।

  • दो अध्यापक, दो ध्रुव

    'प्री = प्रहार, श = शांति': प्रीतमचंद कठोर (बाघ की तरह झपटना), शर्मा जी नरम (हलकी चपत, पुरानी किताबें)।

    Use it when: तुलना वाले प्रश्न।

गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन: board-level solved questions

Ordered from board level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.

Example 1: भाषा की बाधा नहीं बनी · 3 marks · Long answerBoard level

कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती — पाठ के किस अंश से यह सिद्ध होता है? (लगभग 50-60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. लेखक के आधे से ज़्यादा साथी राजस्थान या हरियाणा से आकर बसे परिवारों के थे।
  2. उनकी बोली अलग थी, कुछ शब्द सुनकर हँसी भी आती।
  3. पर खेलते समय सब एक-दूसरे की बात खूब समझ लेते थे।

Answer: लेखक के आधे से ज़्यादा साथी राजस्थान या हरियाणा से आकर मंडी में बसे परिवारों के थे। उनकी बोली अलग थी और कुछ शब्द सुनकर हँसी भी आती थी, फिर भी खेलते समय सब बच्चे एक-दूसरे की बात आसानी से समझ लेते थे। इससे सिद्ध होता है कि भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती।

Example 2: पीटी साहब की 'शाबाश' · 3 marks · Long answerHarder board level

पीटी साहब की 'शाबाश' बच्चों को फ़ौज के तमगों जैसी क्यों लगती थी? (लगभग 50-60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. पीटी मास्टर प्रीतमचंद अत्यंत कठोर थे; छोटी गलती पर भी कड़ी सज़ा देते।
  2. स्काउटिंग और परेड में गलती न होने पर ही वे 'शाबाश' कहते।
  3. इतने कठोर अध्यापक की दुर्लभ प्रशंसा बच्चों को सबसे बड़ा सम्मान लगती।

Answer: पीटी मास्टर प्रीतमचंद बहुत कठोर थे और छोटी-सी गलती पर भी बच्चों की 'खाल खींच' देते थे। स्काउटिंग के अभ्यास में कोई गलती न होने पर ही वे आँखें झपकाकर 'शाबाश' कहते। ऐसे सख्त अध्यापक की दुर्लभ प्रशंसा बच्चों को किसी फ़ौज के सभी तमगे जीत लेने जैसी लगती थी।

Example 3: पुरानी किताबों से पढ़ाई · 3 marks · Long answerHarder board level

लेखक की पढ़ाई जारी रहने में हेडमास्टर शर्मा जी की क्या भूमिका थी? (लगभग 50-60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. शर्मा जी हर साल अप्रैल में एक साल पुरानी किताबें ले आते।
  2. लेखक के घर में किसी को पढ़ाई में रुचि नहीं थी; नयी किताबें लानी पड़तीं तो पढ़ाई छूट जाती।
  3. इसी सहायता से लेखक सात साल स्कूल में पढ़ पाए; वे अपने दो परिवारों में स्कूल जाने वाले पहले लड़के थे।

Answer: नया साल शुरू होने पर शर्मा जी लेखक के लिए एक साल पुरानी किताबें ले आते थे। लेखक के घर में किसी को पढ़ाई में रुचि नहीं थी; नयी किताबें खरीदनी पड़तीं तो शायद पढ़ाई तीसरी-चौथी श्रेणी में ही छूट जाती। शर्मा जी की इसी सहायता से लेखक सात साल स्कूल में पढ़ सके।

Example 4: प्रीतमचंद और शर्मा जी की तुलना · 3 marks · Long answerHarder board level

हेडमास्टर शर्मा जी और पीटी मास्टर प्रीतमचंद के स्वभाव की तुलना कीजिए। (लगभग 50-60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. प्रीतमचंद: बहुत कठोर; सिर हिलाने पर भी 'बाघ की तरह झपट पड़ते'।
  2. शर्मा जी: नरम स्वभाव; गुस्से में अधिक से अधिक एक हलकी चपत।
  3. शर्मा जी ने बच्चों पर बर्बरता देखकर प्रीतमचंद को मुअत्तल किया।

Answer: पीटी मास्टर प्रीतमचंद बहुत कठोर थे; ज़रा-सा सिर हिलाने पर भी बच्चे पर बाघ की तरह झपट पड़ते थे। इसके उलट हेडमास्टर शर्मा जी नरम स्वभाव के थे और गुस्से में अधिक से अधिक हलकी चपत लगाते थे। बच्चों पर बर्बरता देखकर उन्होंने ही प्रीतमचंद को मुअत्तल किया।

Example 5: पिटाई के बावजूद खेलने आना · 3 marks · Long answerHOTS / competency

चोट खाने और घर पर पिटने के बावजूद बच्चे अगले दिन फिर खेलने क्यों आ जाते थे? बाल-मनोविज्ञान के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (लगभग 50-60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. खेल बच्चों की स्वाभाविक ज़रूरत है; उसमें आनंद और साथ मिलता है।
  2. पिटाई का डर खेल के आकर्षण के आगे कमज़ोर पड़ जाता है।
  3. लेखक को यह बात अध्यापक-प्रशिक्षण में बाल-मनोविज्ञान पढ़कर समझ आई।

Answer: खेल बच्चों की स्वाभाविक ज़रूरत है, जिसमें उन्हें आनंद, आज़ादी और साथियों का साथ मिलता है। इसका आकर्षण इतना प्रबल होता है कि चोट और पिटाई का डर उसके आगे कमज़ोर पड़ जाता है। लेखक को यह रहस्य बाद में अध्यापक-प्रशिक्षण के दौरान बाल-मनोविज्ञान पढ़कर समझ आया।

Example 6: आज के विद्यालय और अनुशासन · 3 marks · Long answerHOTS / competency

प्रीतमचंद जैसे कठोर दंड देने वाले अध्यापक आज के विद्यालयों में स्वीकार्य क्यों नहीं हैं? बच्चों में अनुशासन लाने का बेहतर तरीका क्या हो सकता है? (लगभग 50-60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. कठोर दंड से बच्चों में डर पैदा होता है; वे स्कूल से भागते हैं ('रोते-चिल्लाते स्कूल जाना')।
  2. आज शारीरिक दंड वर्जित है, क्योंकि यह बच्चे के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है।
  3. बेहतर तरीका: प्रेम, प्रोत्साहन ('शाबाश'), स्पष्ट नियम और संवाद।

Answer: कठोर दंड से बच्चों में डर बैठ जाता है और वे स्कूल को कैद समझने लगते हैं, जैसे पाठ के बच्चे रोते-चिल्लाते स्कूल जाते थे। आज शारीरिक दंड बच्चे के आत्मसम्मान पर चोट माना जाता है। अनुशासन के लिए प्रेम, प्रोत्साहन, स्पष्ट नियम और संवाद अधिक प्रभावी हैं।

Where the marks are

How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.

पीटी साहब की 'शाबाश' बच्चों को फ़ौज के तमगों जैसी क्यों लगती थी? (लगभग 50-60 शब्द) (3 marks)

StepMarks
प्रीतमचंद की कठोरता का उल्लेख1
'शाबाश' का अवसर: स्काउटिंग में गलती न होने पर1
निष्कर्ष: कठोर अध्यापक की दुर्लभ प्रशंसा सबसे बड़ा सम्मान1

Where students lose marks in गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन

The slips examiners see most often, and what to write instead.

  • Mistake: प्रीतमचंद को हेडमास्टर लिखना

    प्रीतमचंद पीटी मास्टर थे; हेडमास्टर मदनमोहन शर्मा थे।

    Wrong working

    हेडमास्टर प्रीतमचंद ने बच्चों को सज़ा दी।

    Right working

    पीटी मास्टर प्रीतमचंद ने सज़ा दी; हेडमास्टर शर्मा जी ने उन्हें मुअत्तल किया।

    Do this: दोनों के पद और स्वभाव अलग-अलग याद रखें।

    Usually costs: 1 अंक

  • Mistake: यह लिखना कि लेखक को नयी श्रेणी में जाने का बहुत चाव था

    पाठ के अनुसार लेखक को नयी श्रेणी का चाव कभी महसूस नहीं हुआ; पुरानी किताबों की गंध और मास्टरों का डर उदास करता था।

    Do this: लेखक की अपनी भावनाएँ पाठ से ही लिखें।

    Usually costs: 1 अंक

  • Mistake: 3 अंक के उत्तर में केवल एक बिंदु लिखना

    संचयन के प्रश्न लगभग 50-60 शब्दों के होते हैं; मूल्यांकन में तीन बिंदु देखे जाते हैं।

    Do this: हर उत्तर में तीन बिंदु: तथ्य, कारण, निष्कर्ष।

    Usually costs: 1-2 अंक

  • Mistake: पीटी साहब के मुअत्तल होने के बाद उन्हें दुखी बताना

    पाठ के अनुसार वे निश्चिंत होकर चौबारे में तोतों को बादाम खिलाते रहे।

    Do this: घटना के बाद का व्यवहार पाठ के अनुसार लिखें।

    Usually costs: 1 अंक

गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन: previous year questions

  • Course A: Not asked in any of the 21 board papers we hold (2023 to 2026).
  • Course B: Asked in 1 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.3 marks per paper; 1 questions in all, counting OR alternatives. In 0 of 4 sample papers.

Counted from the real papers on our previous year papers page, not estimated. Average marks are over every board paper we hold, with an OR pair counted once. Chapter tags are ours.

Solved board questions from गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन

Real questions from recent papers. Try each one first, then open our step-by-step solution with marks per step.

2026 Course B, set 4/5/1, Q11 · 6 marks · Short answerCompetency-based

पूरक पाठ्य-पुस्तक 'संचयन' पर आधारित निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर लगभग 40-50 शब्दों में लिखिए : 2 × 3 = 6

  1. (i)

    'सपनों के से दिन' के लेखक और उनके साथी द्वारा ओमा को अपना नेता मानने के क्या कारण थे ? क्या आप भी ओमा जैसे किसी को अपना आदर्श बनाना चाहेंगे ? तर्कसम्मत उत्तर लिखिए।

    3 marks
  2. (ii)

    अपनी माँ से लगाव और उनकी परवाह होने के बावजूद उनके द्वारा मना किए जाने पर भी टोपी ने इफ़्फ़न के घर जाना बंद क्यों नहीं किया ? 'टोपी शुक्ला' पाठ के आधार पर उत्तर लिखिए।

    3 marks
  3. (iii)

    'हरिहर काका' कहानी में परिवार और ठाकुरबारी दोनों ने ही अपनी वास्तविक भूमिका का त्याग कर दिया था। यदि समाज में सचमुच ये दोनों अपने मूल दायित्व को छोड़ दें तो समाज पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?

    3 marks
Try it first, then show our solutionSolution
  1. (i) ओमा शारीरिक बनावट और व्यवहार में अन्य विद्यार्थियों से अलग था। उसकी निडरता से लेखक और साथी प्रभावित थे, इसलिए उसे नेता मानते थे।

    2 marks
  2. (i) हाँ, मैं ऐसे साहसी और निडर व्यक्ति को आदर्श मानूँगा, बशर्ते वह अपने साहस का प्रयोग सही दिशा में करे। (तर्कसम्मत कोई भी मत मान्य)

    1 mark
  3. (ii) टोपी का परिवार उसकी भावनाओं को नहीं समझता था। उसे अपने परिवार की तुलना में इफ़्फ़न और उसकी दादी से अधिक प्रेम और अपनापन मिलता था। टोपी और इफ़्फ़न में गहरी दोस्ती थी, और घर में वह उपेक्षित महसूस करता था, इसलिए वह मना करने पर भी वहाँ जाना बंद नहीं कर सका।

    3 marks
  4. (iii) परिवार और ठाकुरबारी अपना मूल दायित्व छोड़ दें तो समाज में अराजकता, अन्याय और अनाचार बढ़ेगा। स्वच्छंदता, उच्छृंखलता और निरंकुशता बढ़ेगी। व्यक्ति अकेला पड़ जाएगा और व्यक्ति तथा समाज दोनों का नैतिक पतन होगा।

    3 marks

Answer: (i) ओमा की अलग बनावट और निडरता; हाँ, तर्क सहित आदर्श; (ii) घर में उपेक्षा, इफ़्फ़न और दादी का प्रेम, गहरी दोस्ती; (iii) अराजकता, अन्याय, व्यक्ति का अकेलापन और नैतिक पतन

Where the marks are

  • (i) कारण, ओमा की अलग बनावट और निडरता (2 अंक); अपना मत तर्क सहित (1 अंक)
  • (ii) कोई तीन बिंदु (3 अंक)
  • (iii) कोई तीन प्रभाव (3 अंक)

See it in the full 2026 board paper, set 4/5/1

Every गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन question, by year

Course A (0 questions, sample papers included)

Course B (1 questions, sample papers included)

2026

Set 4/5/1: Q11 (6 marks, solved)

Practice questions on गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन

Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.

  1. Q1 · 3 marks · Long answerBoard level

    लेखक के अधिकतर साथी स्कूल क्यों नहीं जाते थे? (लगभग 50-60 शब्द)

    Hint

    दुकानदारों की सोच और पंडत घनश्याम दास।

    Answer

    उत्तर-बिंदु: माता-पिता पढ़ाई को ज़रूरी नहीं मानते थे; दुकानदार सोचते, बेटे को तहसीलदार थोड़े ही बनाना है; पंडत घनश्याम दास से लंडे सीखकर दुकान की बहियाँ लिख लेगा।

    आदर्श उत्तर: लेखक के अधिकतर साथियों के माता-पिता पढ़ाई को ज़रूरी नहीं मानते थे। दुकानदार सोचते थे कि बेटे को कौन-सा तहसीलदार बनाना है; वह पंडत घनश्याम दास से लंडे सीखकर दुकान की बहियाँ लिख लेगा। इसलिए बच्चे स्कूल न जाकर बचपन से ही काम-धंधे में लगा दिए जाते थे।

  2. Q2 · 3 marks · Long answerBoard level

    छुट्टियों में लेखक ननिहाल में कैसे समय बिताता था? (लगभग 50-60 शब्द)

    Hint

    नानी और तालाब।

    Answer

    उत्तर-बिंदु: माँ के साथ ननिहाल; नानी खूब दूध-दही खिलाती और प्यार करती; दोपहर तक तालाब में नहाना; ननिहाल न जा पाने पर अपने घर के पास के तालाब और रेतीले टीले पर खेलना।

    आदर्श उत्तर: छुट्टियों में लेखक अपनी माँ के साथ ननिहाल जाते थे। वहाँ नानी उन्हें बहुत प्यार करती और खूब दूध-दही खिलाती थी। वे दोपहर तक तालाब में नहाते और खेलते रहते। जिस साल ननिहाल न जा पाते, उस साल अपने घर के पास के तालाब और रेतीले टीलों पर खेलते थे।

  3. Q3 · 3 marks · Long answerHarder board level

    छुट्टियों के काम को लेकर बच्चे क्या हिसाब लगाते थे और ओमा उनका नेता क्यों था? (लगभग 50-60 शब्द)

    Hint

    दो सौ सवाल और 'सस्ता सौदा'।

    Answer

    उत्तर-बिंदु: हिसाब के मास्टर जी दो सौ सवाल देते; दिन गिनकर रोज़ के सवाल तय करते, पर काम टलता रहता; कुछ बच्चे पिटाई को 'सस्ता सौदा' मानते; ओमा ऐसे बच्चों का नेता, सिर की टक्कर से लड़ने वाला।

    आदर्श उत्तर: हिसाब के मास्टर जी छुट्टियों में दो सौ सवाल देते थे। बच्चे दिन गिनकर रोज़ के सवाल तय करते, पर काम टलता रहता। तब कुछ बच्चे सोचते कि काम करने से पिटाई सहना सस्ता सौदा है। ऐसे बच्चों का नेता ओमा था, जो सिर की टक्कर से लड़ाई करता था।

  4. Q4 · 3 marks · Long answerHarder board level

    नयी श्रेणी में जाने पर लेखक के मन में उत्साह के बजाय उदासी क्यों होती थी? (लगभग 50-60 शब्द)

    Hint

    पुरानी किताबों की गंध और नए मास्टरों का डर।

    Answer

    उत्तर-बिंदु: पुरानी किताबों-कापियों की गंध से मन उदास; नयी श्रेणी के मास्टरों की मार का डर; अलिआर के झाड़ों की गंध भी उदासी जगाती।

    आदर्श उत्तर: नयी श्रेणी में जाने पर लेखक को पुरानी किताबें मिलती थीं, जिनकी गंध उन्हें उदास कर देती थी। साथ ही नयी श्रेणी के मास्टरों का डर भी होता था, जिनमें कुछ 'चमड़ी उधेड़ देने को तैयार रहते'। रास्ते के अलिआर के झाड़ों की गंध भी उनका मन उदास कर देती थी।

  5. Q5 · 3 marks · Long answerHarder board level

    दूसरे विश्व-युद्ध के समय फ़ौज में भरती के लिए लोगों को कैसे लुभाया जाता था? (लगभग 50-60 शब्द)

    Hint

    अफसरों के साथ आने वाले नौटंकी वाले और उनका गाना।

    Answer

    उत्तर-बिंदु: भरती करने आए अफसरों के साथ नौटंकी वाले आते; रात को खुले मैदान में शामियाने लगाकर फ़ौज के सुख-आराम और बहादुरी के दृश्य दिखाते; मसखरे वर्दी और बड़े फ़ौजी बूट पहनकर 'भरती हो जा रे रंगरूट' गाते: यहाँ टूटे जूते, वहाँ बूट।

    आदर्श उत्तर: भरती करने आए अफसरों के साथ नौटंकी वाले भी आते थे। वे रात को खुले मैदान में शामियाने लगाकर फ़ौज के सुख-आराम और बहादुरी के दृश्य दिखाते। मसखरे फ़ौजी बूट पहनकर 'भरती हो जा रे रंगरूट' गाते कि यहाँ टूटे जूते मिलते हैं, वहाँ बूट मिलेंगे। इससे आकर्षित होकर कुछ नौजवान भरती हो जाते।

  6. Q6 · 3 marks · Long answerHarder board level

    शर्मा जी ने प्रीतमचंद को मुअत्तल क्यों किया? (लगभग 50-60 शब्द)

    Hint

    चौथी श्रेणी, फ़ारसी के शब्द-रूप और कान पकड़वाना।

    Answer

    उत्तर-बिंदु: चौथी श्रेणी में फ़ारसी के शब्द-रूप कोई न सुना सका; प्रीतमचंद ने सबको पीठ ऊँची करके कान पकड़वाए; शर्मा जी ने यह बर्बरता देखी, रोका और मुअत्तल करके आदेश मंजूरी के लिए नाभा भेजा।

    आदर्श उत्तर: चौथी श्रेणी में एक दिन कोई बच्चा फ़ारसी के शब्द-रूप नहीं सुना पाया, तो प्रीतमचंद ने सबको पीठ ऊँची करके कान पकड़वा दिए। शर्मा जी यह बर्बरता देखकर बहुत क्षुब्ध हुए और सहन न कर सके। उन्होंने तुरंत प्रीतमचंद को रोका, मुअत्तल किया और आदेश मंजूरी के लिए नाभा भेज दिया।

  7. Q7 · 3 marks · Long answerHOTS / competency

    बच्चों को यह 'अलौकिक' क्यों लगता था कि प्रीतमचंद तोतों से मीठी बातें करते थे? इससे मनुष्य के स्वभाव के बारे में क्या पता चलता है? (लगभग 50-60 शब्द)

    Hint

    एक ही व्यक्ति के दो रूप।

    Answer

    उत्तर-बिंदु: बच्चों के लिए प्रीतमचंद अत्यंत कठोर थे; वही व्यक्ति तोतों को बादाम खिलाता और मीठी बातें करता; मनुष्य के स्वभाव के कई पक्ष होते हैं; परिस्थिति के अनुसार व्यवहार बदलता है।

    आदर्श उत्तर: बच्चों ने प्रीतमचंद को केवल कठोर और निर्दयी रूप में देखा था, इसलिए उन्हें तोतों से मीठी बातें करते देखना अलौकिक लगा। इससे पता चलता है कि मनुष्य के स्वभाव के कई पक्ष होते हैं; कठोर दिखने वाले व्यक्ति में भी कोमलता छिपी हो सकती है।

  8. Q8 · 3 marks · Long answerHOTS / competency

    पाठ का शीर्षक 'सपनों के-से दिन' कितना सार्थक है? तर्क सहित लिखिए। (लगभग 50-60 शब्द)

    Hint

    बचपन के सुख और डर, दोनों अब सपने-से लगते हैं।

    Answer

    उत्तर-बिंदु: बचपन के खेल, ननिहाल, तालाब, मस्ती; स्कूल का डर और पिटाई भी; बड़े होकर ये सब सपनों-से लगते हैं; शीर्षक सार्थक।

    आदर्श उत्तर: लेखक बचपन के खेल, ननिहाल की छुट्टियों, तालाब की मस्ती और स्कूल के डर को याद करते हैं। बीत जाने के बाद वे दिन सपनों जैसे मधुर और अवास्तविक लगते हैं; उनकी पीड़ा भी अब मीठी याद बन गई है। इसलिए 'सपनों के-से दिन' शीर्षक पूरी तरह सार्थक है।

Test your recall

Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.

  1. 1.पाठ के लेखक कौन हैं?Show answer

    गुरदयाल सिंह।

  2. 2.दुकानदार अपने बच्चों को किससे 'लंडे' सिखवाना चाहते थे?Show answer

    पंडत घनश्याम दास से।

  3. 3.हिसाब के मास्टर जी छुट्टियों में कितने सवाल देते थे?Show answer

    दो सौ।

  4. 4.प्रीतमचंद को मुअत्तल करने का आदेश मंजूरी के लिए कहाँ भेजा गया?Show answer

    नाभा।

  5. 5.उस ज़माने में एक रुपये में कितना घी आता था?Show answer

    एक सेर।

Quick revision checklist

The night before the exam: can you do each of these without looking?

  • क्या आप बता सकते हैं कि बच्चों के लिए स्कूल 'कैद' क्यों था?
  • क्या आप प्रीतमचंद और शर्मा जी के स्वभाव की तुलना तीन बिंदुओं में कर सकते हैं?
  • क्या आप लेखक की पढ़ाई जारी रहने का कारण लिख सकते हैं?
  • क्या आप प्रीतमचंद के मुअत्तल होने की घटना क्रम से बता सकते हैं?
  • क्या आप शीर्षक 'सपनों के-से दिन' की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं?

गुरदयाल सिंह – सपनों के-से दिन: frequently asked questions

'सपनों के-से दिन' पाठ के लेखक कौन हैं और यह किस पुस्तक में है?

इस पाठ के लेखक गुरदयाल सिंह हैं। यह हिंदी पाठ्यक्रम-ब की पूरक पाठ्यपुस्तक संचयन भाग 2 का दूसरा पाठ है। इसमें लेखक अपने बचपन और स्कूली दिनों की यादें सुनाते हैं।

हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को मुअत्तल क्यों किया?

चौथी श्रेणी में फ़ारसी का शब्द-रूप कोई बच्चा नहीं सुना पाया, तो पीटी प्रीतमचंद ने सबको पीठ ऊँची करके कान पकड़वाए। शर्मा जी यह बर्बरता सहन नहीं कर पाए। उन्होंने सज़ा फौरन रुकवाई और पीटी साहब को मुअत्तल करके आदेश मंजूरी के लिए नाभा भेज दिया।

बच्चे ओमा को अपना नेता क्यों मानते थे?

ओमा सबसे अलग था। उसकी बातें, गालियाँ और लड़ने का ढंग अनोखा था; वह सिर की टक्कर से बड़े लड़कों को भी चिल्लाने पर मजबूर कर देता था। छुट्टियों का काम न करके पिटाई को 'सस्ता सौदा' मानने वाले बच्चों का वह सबसे बड़ा नेता था।

पीटी साहब की 'शाबाश' बच्चों को फ़ौज के तमगों जैसी क्यों लगती थी?

पीटी साहब बहुत कठोर थे और कभी मुसकराते नहीं थे। ऐसे व्यक्ति से स्काउटिंग में गलती न करने पर मिली एक 'शाबाश' बच्चों को बहुत बड़ा सम्मान लगती थी। लेखक के अनुसार रोज़ फटकारने वाले की एक प्रशंसा चमत्कार जैसी लगती है।

इस पाठ पर बोर्ड में कितने अंक और कितने शब्दों के प्रश्न आते हैं?

यह संचयन का पाठ है, इसलिए प्रश्न 11 में तीन में से दो प्रश्न पूछे जाते हैं। हर उत्तर 50-60 शब्दों में लिखना होता है और हर प्रश्न 3 अंक का है। इस पाठ पर गद्यांश-आधारित प्रश्न नहीं आते।

पाठ का शीर्षक 'सपनों के-से दिन' क्यों रखा गया है?

लेखक बचपन के जिन दिनों को याद करते हैं, वे अब बीत चुके हैं और सपने जैसे लगते हैं। उनमें खेल, ननिहाल, तालाब और फूलों की महक की मीठी यादें हैं, तो मार और स्कूल के डर की कड़वी यादें भी। इसलिए यह शीर्षक पाठ के भाव के अनुकूल है।

Based on: CBSE हिंदी पाठ्यक्रम-ब (085), कक्षा 10, 2026-27; NCERT संचयन भाग 2 (Reprint 2026-27), सपनों के-से दिन