रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण Class 10: भावार्थ और प्रश्न-उत्तर
Updated 14 October 2026 · Fact-checked
'आत्मत्राण' रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रार्थना-कविता है। इसका बंगला से हिंदी अनुवाद हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है। कवि ईश्वर से विपत्ति से बचाने की नहीं, बल्कि विपत्ति से स्वयं लड़ने की शक्ति, निर्भयता और अटूट आस्था माँगता है। बोर्ड इस पर काव्यांश आधारित बहुविकल्पी प्रश्न, कथन-कारण और 25-30 शब्दों के 2 अंक वाले प्रश्न पूछता है।
What रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण is about
'आत्मत्राण' स्पर्श भाग 2 के पद्य खंड की कविता है। इसके कवि रवींद्रनाथ ठाकुर हैं, जो नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय हैं। मूल कविता बंगला में है और इसका हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है। एक पंक्ति में कहें तो यह ऐसी प्रार्थना है जिसमें कवि ईश्वर से सहायता नहीं, बल्कि दुख और संकट का सामना स्वयं करने का आत्मबल माँगता है।
बोर्ड परीक्षा में यह कविता खंड ग (काव्य खंड) में आती है। प्रश्न 7 में पठित काव्यांश देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (1-1 अंक) पूछे जा सकते हैं, जिनमें कथन-कारण प्रश्न भी होता है। प्रश्न 8 में चार में से तीन प्रश्नों के उत्तर 25-30 शब्दों में लिखने होते हैं, हर प्रश्न 2 अंक का होता है। कवि, अनुवादक, पंक्तियों का भाव और शीर्षक की सार्थकता पर प्रश्न बनते हैं।
In real board papers: Course A, not asked in any of the 21 board papers we hold (2023 to 2026); Course B, asked in 2 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.2 marks per paper. See the questions
रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण: explanation
In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.
पहला भाग (विपदा में भय न हो): कवि कहता है कि हे करुणामय प्रभु! मेरी प्रार्थना यह नहीं है कि आप मुझे विपत्तियों से बचाएँ। मैं बस इतना चाहता हूँ कि विपत्ति आने पर मेरे मन में डर न हो।
दूसरा भाग (दुख पर विजय): यदि दुख की पीड़ा से मेरा मन दुखी हो और आप मुझे तसल्ली न दें, तो भी कोई बात नहीं। बस मुझमें इतनी शक्ति हो कि मैं दुख को सदा जीत सकूँ।
तीसरा भाग (अकेले में भी आत्मबल): यदि मुझे कहीं कोई मददगार न मिले, तब भी मेरा बल और पराक्रम न डगमगाए। संसार में मुझे हानि उठानी पड़े और लाभ के बदले केवल धोखा मिले, तब भी मैं मन से हार न मानूँ और इसे अपना नाश न समझूँ।
चौथा भाग (तैरने की शक्ति): कवि कहता है कि आप प्रतिदिन मेरी रक्षा करें, यह मेरी प्रार्थना नहीं है। मुझे बस संकटों से पार पाने की स्वस्थ और पूरी शक्ति मिले। आप मेरा बोझ हल्का न करें और सांत्वना भी न दें, तो भी ठीक है। मेरी विनती केवल इतनी है कि मैं इस बोझ को बिना डरे उठा सकूँ।
पाँचवाँ भाग (सुख-दुख दोनों में आस्था): सुख के दिनों में मैं सिर झुकाकर, विनम्र रहकर हर पल आपका मुख पहचानूँ, यानी आपको याद रखूँ। और जिस दिन दुख की रात में पूरी धरती मुझे धोखा दे, उस दिन भी मेरे मन में आप पर कोई संदेह न हो।
केंद्रीय भाव: कविता का केंद्रीय भाव आत्मनिर्भरता और ईश्वर में अटूट विश्वास है। कवि मानता है कि प्रभु सब कुछ कर सकते हैं, फिर भी वह नहीं चाहता कि प्रभु उसका संघर्ष उसके बदले लड़ें। वह संकट से मुक्ति नहीं, संकट से जूझने का साहस माँगता है। इसीलिए यह प्रार्थना सामान्य प्रार्थनाओं से अलग है। इससे पता चलता है कि कवि के लिए सच्चा 'त्राण' (बचाव) बाहर से मिली मदद नहीं, बल्कि अपने भीतर का आत्मबल है।
Themes and message
आत्मनिर्भरता और स्वयं संघर्ष
कविता का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जीवन का संघर्ष हमें स्वयं करना चाहिए। कवि ईश्वर से यह नहीं कहता कि वह उसकी विपत्तियाँ दूर कर दे या रोज़ उसकी रक्षा करे। वह केवल शक्ति माँगता है ताकि हर कठिनाई से खुद पार पा सके। पाठ प्रवेश में तैराक, परीक्षार्थी और पहलवान के उदाहरण भी यही समझाते हैं कि दूसरे हमारा साथ दे सकते हैं, पर तैरना, परीक्षा देना और कुश्ती लड़ना हमें ही होता है। इससे पता चलता है कि कवि परावलंबन को नहीं, आत्मबल को महत्त्व देता है।
From the text: "मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं" और "तरने की हो शक्ति अनामय" — कवि रोज़ की रक्षा नहीं, पार जाने की शक्ति माँगता है।
निर्भयता
कवि विपत्ति को टालना नहीं चाहता, बल्कि उसके डर को मन से निकालना चाहता है। उसके अनुसार विपत्ति से बड़ी समस्या उससे पैदा होने वाला भय है। जब मन निर्भय होता है तो मनुष्य संकट का सामना शांत होकर कर पाता है। कवि जीवन के बोझ को कम करवाना भी नहीं चाहता, बस उसे बिना डरे उठाना चाहता है। यह भाव कविता में दो बार अलग-अलग रूपों में आता है, जिससे पता चलता है कि निर्भयता कवि की प्रार्थना का मूल है।
From the text: "कभी न विपदा में पाऊँ भय" और "वहन कर सकूँ इसको निर्भय"।
हानि, धोखे और अकेलेपन में भी आत्मबल
कवि मानता है कि जीवन में ऐसे पल आ सकते हैं जब कोई सहायक न मिले, नुकसान उठाना पड़े और लाभ की जगह धोखा मिले। ऐसी स्थिति में भी वह चाहता है कि उसका बल और पौरुष न डगमगाए और वह मन में हार न माने। 'क्षय' का अर्थ नाश है; कवि हानि को अपने मन का नाश नहीं बनने देना चाहता। इससे पता चलता है कि कवि की दृष्टि में असली हार बाहर की हानि नहीं, मन का टूट जाना है।
From the text: "कोई कहीं सहायक न मिले / तो अपना बल पौरुष न हिले;" तथा "तो भी मन में ना मानूँ क्षय"।
सुख में विनम्रता और दुख में अटूट आस्था
कविता के अंत में कवि सुख और दुख, दोनों स्थितियों में ईश्वर से जुड़े रहने की कामना करता है। सुख के दिनों में वह सिर झुकाकर, यानी विनम्र होकर, हर पल प्रभु को पहचानना चाहता है, ताकि सुख उसे घमंडी न बनाए। दुख की रात में जब पूरी धरती उसे छल ले, तब भी वह ईश्वर पर संदेह नहीं करना चाहता। इससे पता चलता है कि कवि की आस्था परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है; वह सुख में भूलती नहीं और दुख में डिगती नहीं।
From the text: "नत शिर होकर सुख के दिन में / तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।" तथा "तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय"।
The speaker and the people in the poem
कवि (वक्ता / प्रार्थना करने वाला)
कविता का 'मैं', जो करुणामय ईश्वर से प्रार्थना करता है। वह संकटों से बचाव नहीं, उनसे लड़ने की शक्ति माँगता है।
- आत्मनिर्भर — वह चाहता है कि संघर्ष स्वयं करे; "मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं"
- साहसी और निर्भय — विपदा में भय न हो और बोझ को "निर्भय" होकर उठाए
- दृढ़ मनोबल वाला — सहायक न मिलने पर भी "बल पौरुष न हिले"
- विनम्र — सुख के दिनों में "नत शिर होकर" प्रभु को याद रखना चाहता है
- आस्थावान — धरती के धोखा देने पर भी ईश्वर पर "संशय" नहीं करना चाहता
पूरी कविता में कवि बार-बार कहता है कि 'यह मेरी प्रार्थना नहीं' और फिर बताता है कि वह क्या चाहता है — भय-रहित मन, दुख पर जय, तरने की शक्ति और अटूट विश्वास। इससे उसका आत्मबल और ईश्वर-प्रेम दोनों दिखते हैं।
करुणामय ईश्वर (संबोधित)
जिनसे कवि प्रार्थना करता है। कविता में उन्हें बार-बार 'करुणामय' कहकर पुकारा गया है।
- करुणामय — दूसरों पर दया करने वाले; कवि उन्हें बार-बार इसी नाम से पुकारता है
- सर्वशक्तिमान — पाठ प्रवेश के अनुसार प्रभु में सब कुछ संभव कर देने की सामर्थ्य है
- शक्ति और साहस के दाता — कवि उनसे "तरने की हो शक्ति अनामय" जैसी शक्ति माँगता है
- विश्वास के आधार — दुख की रात में भी कवि उन पर संशय नहीं करना चाहता
"उस दिन ऐसा हो करुणामय, / तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय॥" — यहाँ ईश्वर को संबोधित करके कवि अपनी आस्था बनाए रखने की विनती करता है।
Poetic devices
| Device | Example | Effect |
|---|---|---|
| पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार | "तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में" — 'छिन-छिन' शब्द की आवृत्ति | एक ही शब्द के दोहराव से 'हर पल' का भाव गहरा होता है; कवि बताता है कि सुख में वह क्षण भर भी प्रभु को न भूले। |
| रूपक अलंकार | "दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही" — दुख को रात्रि के रूप में दिखाया गया | दुख और रात्रि में अभेद दिखाने से दुख का अँधेरा, अकेलापन और डर सजीव हो उठता है; इसी अँधेरे में आस्था बनाए रखने का महत्त्व बढ़ जाता है। |
| अनुप्रास अलंकार | "दुख को मैं कर सकूँ सदा जय" — 'स' वर्ण की आवृत्ति (सकूँ, सदा) | वर्णों की आवृत्ति से पंक्ति में लय और संगीत आता है, जिससे प्रार्थना गाने योग्य और याद रखने में सरल बनती है। |
| तुकांत / अंत्यानुप्रास | "भय", "जय", "क्षय", "अनामय", "निर्भय", "संशय"; तथा "न मिले" – "न हिले" | हर भाग का अंत मिलते-जुलते स्वर से होता है, इससे कविता में गेयता और प्रार्थना-गीत जैसी लय बनती है। |
| आवृत्ति (टेक) और संबोधन | "यह मेरी प्रार्थना नहीं" और '(करुणामय)' का बार-बार प्रयोग | बार-बार 'यह मेरी प्रार्थना नहीं' कहकर कवि सामान्य प्रार्थना से अपनी अलग माँग पर ज़ोर देता है, और 'करुणामय' संबोधन से विनय व आत्मीयता झलकती है। |
| प्रतीकात्मकता और तत्सम भाषा | "तरने की हो शक्ति अनामय" — 'तरना' (तैरकर पार जाना) | 'तरना' यहाँ संकटों को पार करने का प्रतीक लगता है (यह व्याख्या है)। 'त्राण', 'अनामय', 'वंचना', 'निखिल' जैसे तत्सम शब्द कविता को गंभीर और भक्तिपूर्ण स्वर देते हैं। |
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
कवि: कविता की पहली पंक्ति, जिसमें कवि ईश्वर को अपनी प्रार्थना का स्वरूप बताता है।
यह पंक्ति पूरी कविता की दिशा तय करती है: कवि संकट से बचाव नहीं चाहता, संकट से लड़ना चाहता है।
कभी न विपदा में पाऊँ भय
कवि: पहले भाग का अंत, जहाँ कवि बताता है कि वह वास्तव में क्या चाहता है।
निर्भयता कवि की असली माँग है; इसी आधार पर पूछा जा सकता है कि कवि किससे छुटकारा चाहता है — भय से।
दुख को मैं कर सकूँ सदा जय
कवि: सांत्वना न मिलने की स्थिति में कवि की इच्छा।
कवि दुख से भागना नहीं, उसे जीतना चाहता है; यह आत्मबल का भाव है।
तो अपना बल पौरुष न हिले
कवि: जब कोई सहायक न मिले, उस स्थिति के लिए प्रार्थना।
अकेलेपन में भी मनोबल न टूटे — यह आत्मनिर्भरता का सबसे सीधा प्रमाण है।
तरने की हो शक्ति अनामय
कवि: प्रतिदिन की रक्षा न माँगकर कवि पार जाने की शक्ति माँगता है।
'अनामय' यानी स्वस्थ, पूर्ण शक्ति; कवि संघर्ष स्वयं करना चाहता है।
वहन कर सकूँ इसको निर्भय
कवि: कवि की विनती कि बोझ हल्का न हो तो भी वह उसे उठा सके।
कवि ज़िम्मेदारी से बचना नहीं चाहता, उसे बिना डरे निभाना चाहता है।
नत शिर होकर सुख के दिन में
कवि: अंतिम भाग, सुख के समय कवि का व्यवहार।
सुख में विनम्रता और ईश्वर-स्मरण का भाव; सुख में घमंड न आए।
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय
कवि: कविता की अंतिम पंक्ति, दुख की रात में धरती के धोखा देने की स्थिति।
कविता अटूट आस्था पर समाप्त होती है: हर परिस्थिति में ईश्वर पर विश्वास बना रहे।
रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण in real life
Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
आत्मनिर्भरता और स्वयं संघर्ष
मान लीजिए आपकी छोटी बहन रोज़ कहती है कि आप उसका गणित का गृहकार्य कर दें, क्योंकि सवाल उसे कठिन लगते हैं। आप चाहें तो दस मिनट में सारे सवाल हल कर सकते हैं।
'आत्मत्राण' के कवि के दृष्टिकोण के आधार पर बताइए कि आपको क्या करना चाहिए और क्यों। (25-30 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- कवि ईश्वर से बचाव या भार हल्का करना नहीं, शक्ति माँगता है।
- इसी प्रकार बहन का काम स्वयं करना उसे कमज़ोर बनाएगा।
- सही रास्ता: तरीका समझाना, साथ बैठना, पर हल उसे स्वयं करने देना।
Answer: मैं उसका गृहकार्य नहीं करूँगा, बल्कि तरीका समझाकर साथ बैठूँगा। आत्मत्राण के कवि की तरह उसे भी अपनी कठिनाई स्वयं हल करने की शक्ति चाहिए, किसी और का सहारा नहीं।
Memory hook: सवाल हल करके देना 'त्राण' है, सवाल हल करना सिखाना 'आत्मत्राण' है।
निर्भयता
कल्पना कीजिए कि विद्यालय की वाद-विवाद प्रतियोगिता में आपका नाम आया है। मंच पर बोलने के विचार से ही आपके हाथ काँपने लगते हैं और आप सोचते हैं कि बीमारी का बहाना बनाकर नाम वापस ले लें।
'कभी न विपदा में पाऊँ भय' पंक्ति के आधार पर बताइए कि इस स्थिति में आपका निर्णय क्या होना चाहिए। (25-30 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- कवि विपदा से बचना नहीं, विपदा में निडर रहना चाहता है।
- मंच का डर भी एक छोटी विपदा है; बहाना बनाना उससे भागना है।
- सही निर्णय: डर स्वीकार करना, तैयारी करना, साहस से बोलना।
Answer: कवि विपदा से बचाव नहीं, विपदा में निर्भयता माँगता है। इसी तरह मुझे मंच से भागना नहीं चाहिए; डर को स्वीकार कर तैयारी करनी चाहिए और साहस से बोलना चाहिए।
Memory hook: मंच से भागना नहीं, मंच पर डटना: यही 'कभी न विपदा में पाऊँ भय'।
हानि, धोखे और अकेलेपन में भी आत्मबल
मान लीजिए मोहल्ले के क्रिकेट टूर्नामेंट के फ़ाइनल से ठीक एक दिन पहले आपकी टीम का सबसे अच्छा खिलाड़ी चुपचाप विरोधी टीम में चला जाता है। आपकी टीम मैच हार जाती है और आप बहुत निराश हो जाते हैं।
'हानि उठानी पड़े जगत् में' वाली पंक्तियों के भाव से तुलना करते हुए बताइए कि इस हार और धोखे के बाद आपकी सोच कैसी होनी चाहिए। (25-30 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- कविता में स्थिति: हानि उठानी पड़े, लाभ के स्थान पर वंचना (धोखा) मिले।
- कवि की प्रार्थना: फिर भी मन में क्षय (नाश/हार) न माने।
- अपनी स्थिति से जोड़: हार और धोखे से टूटना नहीं, नई तैयारी करना।
Answer: कवि हानि और धोखे के बाद भी मन में क्षय नहीं मानना चाहता। मैं भी हार और मित्र के धोखे से टूटूँगा नहीं, नई तैयारी से फिर खेलूँगा।
Memory hook: मैच हारा है, मन नहीं: 'तो भी मन में ना मानूँ क्षय'।
सुख में विनम्रता और दुख में अटूट आस्था
कल्पना कीजिए कि आपके बोर्ड परीक्षा के परिणाम में बहुत अच्छे अंक आए हैं। घर पर रिश्तेदार आपकी प्रशंसा कर रहे हैं और आपको लगने लगता है कि यह सब केवल आपकी अपनी बुद्धि का कमाल है।
'नत शिर होकर सुख के दिन में' पंक्ति के आलोक में बताइए कि सफलता के इस समय आपका व्यवहार कैसा होना चाहिए। (25-30 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- कवि सुख के दिन में सिर झुकाकर हर क्षण ईश्वर को पहचानना चाहता है।
- इसका संकेत: सुख में अहंकार नहीं, विनम्रता।
- अपने व्यवहार में: घमंड न करना, माता-पिता और शिक्षकों का आभार मानना।
Answer: सुख के दिन में कवि सिर झुकाकर हर क्षण ईश्वर को पहचानना चाहता है। मुझे भी सफलता पर घमंड न कर विनम्र रहना चाहिए और शिक्षकों-माता-पिता का आभार मानना चाहिए।
Memory hook: अंक ऊँचे, सिर नीचा: 'नत शिर होकर सुख के दिन में'।
Topics in this chapter
- आत्मत्राण कविता का भावार्थComing soon
- आत्मत्राण के प्रश्न-उत्तरComing soon
- आत्मत्राण का केंद्रीय भाव और संदेशComing soon
- आत्मत्राण के अंशों का भाव स्पष्ट कीजिएComing soon
- रवींद्रनाथ ठाकुर का जीवन परिचयComing soon
How the board asks रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण
The question patterns to expect, and the method that works for each.
| Question type | How it is asked | Method |
|---|---|---|
| काव्यांश आधारित बहुविकल्पी प्रश्न (1×5) | कविता का एक अंश देकर पाँच MCQ पूछे जाते हैं, जैसे — कवि किससे छुटकारा चाहता है, 'अनामय' या 'वंचना' का अर्थ, किस स्थिति में कवि क्या माँगता है, कौन-सा कथन अंश से मेल खाता है। | अंश को दो बार पढ़ें और हर पंक्ति का सीधा अर्थ समझें। शब्दार्थ (त्राण, क्षय, अनामय, वंचना, निखिल, संशय) याद रखें। विकल्पों में 'विपत्ति से बचाना' जैसे आकर्षक पर गलत विकल्प से सावधान रहें, क्योंकि कवि बचाव नहीं, शक्ति माँगता है। |
| कथन-कारण प्रश्न | कथन (A) और कारण (R) देकर पूछा जाता है कि दोनों सही हैं या नहीं और R, A की सही व्याख्या है या नहीं; जैसे — A: कवि प्रतिदिन रक्षा की प्रार्थना नहीं करता; R: वह संकट से स्वयं पार पाना चाहता है। | पहले A और R को अलग-अलग कविता से जाँचें। फिर देखें कि R, A का कारण बनता है या नहीं। केवल दोनों के सही होने से 'सही व्याख्या' मत मान लें। |
| तथ्य-आधारित प्रश्न (कवि और अनुवादक) | कविता के अनुवादक का नाम, मूल भाषा, या कवि से जुड़ा तथ्य MCQ या छोटे प्रश्न के रूप में पूछा जाता है। | याद रखें: कवि रवींद्रनाथ ठाकुर, मूल भाषा बंगला, हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी। रवींद्रनाथ को 'गीतांजलि' के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। कवि और अनुवादक के नाम आपस में न मिलाएँ। |
| भाव स्पष्ट कीजिए (25-30 शब्द, 2 अंक) | कविता की एक-दो पंक्तियाँ देकर उनका भाव पूछा जाता है, जैसे सुख के दिन में सिर झुकाने वाली पंक्ति या हानि-लाभ वाली पंक्ति। | पहले कठिन शब्दों का अर्थ अपने उत्तर में घोलें, फिर कवि की इच्छा बताएँ और अंत में एक वाक्य में संदेश जोड़ें। 25-30 शब्दों में रहें; पंक्ति को दोबारा लिखने में शब्द बर्बाद न करें। |
| विश्लेषणात्मक / शीर्षक और संदेश (25-30 शब्द, 2 अंक) | शीर्षक 'आत्मत्राण' की सार्थकता, कविता का केंद्रीय भाव, या यह प्रार्थना अन्य प्रार्थनाओं से अलग कैसे है — ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं। | 'आत्मत्राण' = अपना बचाव स्वयं करना, यह अर्थ पहले लिखें। फिर कविता से एक प्रमाण (जैसे रोज़ की रक्षा न माँगना, तरने की शक्ति माँगना) दें। अंत में बताएँ कि इसलिए शीर्षक या भाव उचित है। |
| मूल्य-आधारित / जीवन से जोड़ने वाले प्रश्न (2 अंक) | 'मान लीजिए' जैसी नई स्थिति देकर पूछा जा सकता है कि कवि की सीख वहाँ कैसे काम आएगी, या आप कठिनाई में प्रार्थना के साथ क्या करेंगे। | स्थिति को कविता के किसी एक भाव (निर्भयता, आत्मबल, हार न मानना) से जोड़ें। कविता का एक संकेत दें और अपना ठोस कदम बताएँ। उपदेश लंबा न करें, शब्द-सीमा का ध्यान रखें। |
Tricks to remember रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
'नहीं... बस इतना' सूत्र
पूरी कविता एक ही ढाँचे पर चलती है: पहले कवि बताता है कि वह क्या नहीं माँगता (बचाव नहीं, सांत्वना नहीं, प्रतिदिन त्राण नहीं, भार हल्का नहीं), फिर कहता है 'केवल इतना' या 'बस इतना' (भय न हो, दुख पर जय, तरने की शक्ति, निर्भय वहन)। याद रखिए: 'माँग नहीं सहारे की, माँग है हिम्मत की।'
Use it when: किसी भी पंक्ति का भाव लिखते समय पहले 'क्या नहीं माँगता' और फिर 'क्या माँगता है' लिखिए; दोनों बिंदुओं पर अंक मिलते हैं।
पंक्तियों का क्रम: आठ शब्दों की माला
क्रम याद रखने के लिए यह माला दोहराइए: भय → जय → पौरुष → क्षय → तरना → वहन → नत शिर → संशय। वाक्य बनाइए: 'भय न हो, जय हो, पौरुष न हिले, क्षय न मानूँ; तरूँ, वहन करूँ, सुख में सिर झुकाऊँ, दुख में संशय न करूँ।'
Use it when: काव्यांश पहचानने और यह बताने में मदद करता है कि कोई पंक्ति कविता के आरंभ, मध्य या अंत की है।
कवि और अनुवादक अलग
'रवि ने लिखा बंगला में, हजारी लाए हिंदी में।' रवि = रवींद्रनाथ ठाकुर (मूल कवि), हजारी = हजारीप्रसाद द्विवेदी (अनुवादक)।
Use it when: कवि, अनुवादक और मूल भाषा वाले बहुविकल्पी प्रश्नों में भ्रम से बचाता है।
पाठ प्रवेश के तीन उदाहरण
'तैरो, लिखो, लड़ो: खुद।' तैराक को स्वयं हाथ-पाँव चलाने पड़ते हैं, परीक्षार्थी को स्वयं परीक्षा देनी होती है, पहलवान को स्वयं कुश्ती लड़नी होती है। दूसरे केवल उत्साह और आशीर्वाद देते हैं।
Use it when: केंद्रीय भाव (आत्मनिर्भरता) समझाने और जीवन से जोड़ने वाले प्रश्नों में उदाहरण देने के काम आता है।
रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण: extract-based questions
Read the extract, answer every part on paper, then open the answers.
Extract 1: काव्यांश 1: विपदा में निर्भयता और दुख पर विजय
कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे (करुणामय)
दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।
(1) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: कवि कहता है कि विपदाओं से बचाने की प्रार्थना वह नहीं कर रहा।) काव्यांश के अनुसार कवि करुणामय ईश्वर से क्या माँगता है?
(क) विपदाओं से सदा बचाव
(ख) विपदा आने पर भय न लगे
(ग) दुखी मन के लिए सांत्वना
(घ) धन और सांसारिक सुख(2) · 1 mark · MCQ
'दुःख-ताप से व्यथित चित्त' का आशय है—
(क) कष्ट की पीड़ा से दुखी मन
(ख) गरमी से थका हुआ शरीर
(ग) क्रोध से भरा हृदय
(घ) रोग से पीड़ित शरीर(3) · 1 mark · MCQ
सांत्वना न मिलने की स्थिति में भी कवि क्या चाहता है?
(क) ईश्वर उसका दुख स्वयं दूर कर दें
(ख) वह दुख पर सदा विजय पा सके
(ग) उसे कोई सहायक मिल जाए
(घ) वह अपना दुख भूल जाए(4) · 1 mark · MCQ
इस काव्यांश में कवि के किस भाव की झलक सबसे स्पष्ट मिलती है?
(क) निराशा और पलायन
(ख) ईश्वर से शिकायत
(ग) आत्मबल और निर्भयता
(घ) सांसारिक सुख की लालसा(5) · 1 mark · Assertion-reason
कथन (A): कवि ईश्वर से सांत्वना न मिलने पर भी कोई शिकायत नहीं करता।
कारण (R): कवि चाहता है कि वह दुख को स्वयं जीत सके।
(क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या है।
(ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, किंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(ग) कथन (A) सही है, किंतु कारण (R) गलत है।
(घ) कथन (A) गलत है, किंतु कारण (R) सही है।
Show the answersAnswers
- (ख) विपदा आने पर भय न लगे
- (क) कष्ट की पीड़ा से दुखी मन
- (ख) वह दुख पर सदा विजय पा सके
- (ग) आत्मबल और निर्भयता
- (क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या है। कवि 'न दो सांत्वना नहीं सही' कहता है, क्योंकि वह दुख पर स्वयं विजय पाना चाहता है।
Extract 2: काव्यांश 2: सुख में विनम्रता, दुख में आस्था
दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय॥
(1) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: इससे पहले कवि कहता है कि सुख के दिनों में वह 'नत शिर होकर' हर क्षण ईश्वर का मुख पहचाने।) 'नत शिर होकर' का अर्थ है—
(क) सिर झुकाकर, विनम्रता से
(ख) सिर उठाकर, गर्व से
(ग) आँखें बंद करके
(घ) हाथ जोड़कर, डरते हुए(2) · 1 mark · MCQ
'तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में' पंक्ति से कवि की कौन-सी इच्छा प्रकट होती है?
(क) सुख के समय भी हर क्षण ईश्वर को याद रखना
(ख) केवल दुख के समय ईश्वर को पुकारना
(ग) ईश्वर का चित्र बनाना
(घ) सुख में ईश्वर को भूल जाना(3) · 1 mark · MCQ
'निखिल मही' का अर्थ है—
(क) संपूर्ण संसार
(ख) निर्मल आकाश
(ग) अँधेरी रात
(घ) अपना घर-परिवार(4) · 1 mark · MCQ
दुःख-रात्रि में सारा संसार धोखा दे, तब कवि ईश्वर से क्या प्रार्थना करता है?
(क) वह संसार से बदला ले सके
(ख) वह ईश्वर पर कुछ भी संदेह न करे
(ग) ईश्वर दुख की रात तुरंत समाप्त कर दें
(घ) उसे कोई नया सहायक मिल जाए(5) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: पहले की पंक्तियों में कवि सुख के दिनों में विनम्र रहकर हर क्षण ईश्वर को याद रखना चाहता है।) इस काव्यांश का केंद्रीय भाव है—
(क) सुख में विनम्रता और दुख में अटूट आस्था
(ख) सुख में उत्सव और दुख में शोक
(ग) संसार के प्रति घृणा
(घ) ईश्वर से सुख की माँग
Show the answersAnswers
- (क) सिर झुकाकर, विनम्रता से
- (क) सुख के समय भी हर क्षण ईश्वर को याद रखना
- (क) संपूर्ण संसार
- (ख) वह ईश्वर पर कुछ भी संदेह न करे
- (क) सुख में विनम्रता और दुख में अटूट आस्था
रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण: board-level solved questions
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Example 1: अकेलेपन में कवि की माँग · 2 marks · Short answerBoard level
'कोई कहीं सहायक न मिले' पंक्ति के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए कि कवि अकेलेपन की स्थिति के लिए ईश्वर से क्या माँगता है। (25-30 शब्द)
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- स्थिति: संसार में कहीं कोई सहायक न मिले।
- माँग: उसका अपना बल और पौरुष (पराक्रम) न डगमगाए।
- भाव: कवि दूसरों पर निर्भर न रहकर स्वयं साहस से संघर्ष करना चाहता है।
Answer: कवि प्रार्थना करता है कि यदि कहीं कोई सहायक न मिले, तब भी उसका बल और पौरुष न डगमगाए। वह अकेले ही साहस से संघर्ष करना चाहता है।
Example 2: हानि और धोखे में मन की दृढ़ता · 2 marks · Short answerHarder board level
लाभ के स्थान पर धोखा मिलने पर भी कवि मन में 'क्षय' क्यों नहीं मानना चाहता? इससे उसकी कौन-सी सोच प्रकट होती है? (25-30 शब्द)
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- पंक्ति का संकेत: संसार में हानि उठानी पड़े और लाभ के बदले वंचना (धोखा) मिले।
- 'क्षय' का अर्थ नाश है; कवि मन को हारा हुआ नहीं मानना चाहता।
- सोच: बाहरी नुकसान को वह मन की पराजय नहीं बनने देना चाहता।
Answer: कवि चाहता है कि हानि या धोखा मिलने पर भी उसका मन हार न माने। इससे स्पष्ट है कि वह बाहरी नुकसान को मन की पराजय नहीं बनने देना चाहता।
Example 3: सहायता नहीं, शक्ति की माँग · 2 marks · Short answerHarder board level
"'आत्मत्राण' का कवि ईश्वर से सहायता नहीं, शक्ति माँगता है।" कविता के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए। (25-30 शब्द)
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- कवि क्या नहीं माँगता: विपदाओं से बचाव, सांत्वना, प्रतिदिन त्राण, भार को हल्का करना।
- कवि क्या माँगता है: विपदा में निर्भयता, दुख पर विजय, तरने की अनामय शक्ति।
- अपना भार निर्भय होकर स्वयं उठाने की क्षमता।
Answer: कवि विपदाओं से बचाव, सांत्वना या भार हल्का करने की माँग नहीं करता। वह केवल निर्भयता, दुख पर विजय और अपना भार निर्भय होकर उठाने की शक्ति माँगता है।
Example 4: सुख और दुख दोनों में ईश्वर से संबंध · 2 marks · Short answerHarder board level
कवि सुख और दुख, दोनों स्थितियों में ईश्वर से अपना संबंध किस प्रकार बनाए रखना चाहता है? (25-30 शब्द)
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- सुख के दिन: 'नत शिर होकर', अर्थात विनम्र रहकर हर क्षण ईश्वर को पहचानना।
- दुःख-रात्रि: जब सारा संसार (निखिल मही) धोखा दे।
- उस समय भी ईश्वर पर कोई संशय न करना, यानी अटूट आस्था।
Answer: सुख में कवि विनम्र रहकर हर क्षण ईश्वर को याद रखना चाहता है। दुख में सारा संसार धोखा दे, तब भी वह ईश्वर पर संदेह नहीं करना चाहता।
Example 5: प्रार्थना और परिश्रम: मित्र को सलाह · 2 marks · Short answerHOTS / competency
मान लीजिए आपका एक मित्र बोर्ड परीक्षा से पहले केवल प्रार्थना करता है और पढ़ाई नहीं करता। 'आत्मत्राण' के आधार पर आप उसे क्या सलाह देंगे? (25-30 शब्द)
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- कविता का संदेश: कवि ईश्वर से केवल शक्ति माँगता है, संघर्ष स्वयं करता है।
- प्रार्थना का स्थान: इससे मनोबल मिलता है।
- निष्कर्ष: परीक्षा की तैयारी और परिश्रम स्वयं करना होगा।
Answer: मैं उसे समझाऊँगा कि आत्मत्राण का कवि भी ईश्वर से केवल शक्ति माँगता है, संघर्ष स्वयं करता है। प्रार्थना से मनोबल मिलता है, पर परीक्षा की तैयारी स्वयं करनी होगी।
Example 6: क्या कवि ईश्वर में अविश्वास रखता है? · 2 marks · Short answerHOTS / competency
कवि ईश्वर से बचाव, सांत्वना और सहायता नहीं माँगता। क्या इसका अर्थ यह है कि उसे ईश्वर में विश्वास नहीं है? तर्क सहित उत्तर दीजिए। (25-30 शब्द)
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- निर्णय: नहीं, कवि आस्थावान है।
- प्रमाण 1: वह बार-बार ईश्वर को 'करुणामय' कहकर पुकारता है।
- प्रमाण 2: दुःख-रात्रि में भी ईश्वर पर संशय न करने की प्रार्थना करता है।
- निष्कर्ष: वह ईश्वर से केवल आत्मबल माँगता है।
Answer: नहीं, कवि ईश्वर पर विश्वास रखता है। वह उन्हें 'करुणामय' कहकर पुकारता है और दुख-रात्रि में भी उन पर संशय न करने की प्रार्थना करता है; बस आत्मबल माँगता है।
Where the marks are
How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.
'आत्मत्राण' कविता में कवि ईश्वर से क्या नहीं माँगता और क्या माँगता है? स्पष्ट कीजिए। (25-30 शब्द) (2 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| क्या नहीं माँगता: विपदाओं से बचाव, दुख में सांत्वना, प्रतिदिन त्राण या भार को हल्का करना (कोई दो उदाहरण) | 1 |
| क्या माँगता है: विपदा में निर्भयता, दुख पर विजय, तरने की अनामय शक्ति और ईश्वर पर अटूट आस्था (कोई दो बिंदु); उत्तर-बिंदु सांकेतिक हैं, भिन्न किंतु उपयुक्त उत्तर भी मान्य | 1 |
पठित काव्यांश ('नत शिर होकर सुख के दिन में' से 'तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय' तक) पर आधारित पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (5 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| प्रश्न 1: 'नत शिर होकर' का सही अर्थ चुनना (सिर झुकाकर, विनम्रता से) | 1 |
| प्रश्न 2: 'तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में' का भाव पहचानना (सुख में भी हर क्षण ईश्वर को याद रखना) | 1 |
| प्रश्न 3: 'निखिल मही' का अर्थ चुनना (संपूर्ण संसार) | 1 |
| प्रश्न 4: दुःख-रात्रि में कवि की प्रार्थना पहचानना (ईश्वर पर संशय न करना) | 1 |
| प्रश्न 5: काव्यांश का केंद्रीय भाव चुनना (सुख में विनम्रता, दुख में आस्था); हर प्रश्न में केवल सही विकल्प लिखने पर ही 1 अंक | 1 |
Where students lose marks in रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: कवि और अनुवादक को आपस में मिला देना
कविता के नीचे 'अनुवाद: हजारीप्रसाद द्विवेदी' लिखा है, जिसे देखकर विद्यार्थी उन्हें ही कवि मान लेते हैं।
Wrong working
'आत्मत्राण' कविता के कवि हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं।
Right working
'आत्मत्राण' के कवि रवींद्रनाथ ठाकुर हैं; इसका बंगला से हिंदी में अनुवाद हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है।
Do this: उत्तर लिखने से पहले खुद से पूछिए: मूल रचना किसकी है और अनुवाद किसका?
Usually costs: बहुविकल्पी प्रश्न का पूरा 1 अंक
Mistake: कविता का उलटा अर्थ लिखना कि कवि बचाव माँगता है
विद्यार्थी पहली पंक्ति का आधा भाग 'विपदाओं से मुझे बचाओ' पढ़कर रुक जाते हैं और 'यह मेरी प्रार्थना नहीं' पर ध्यान नहीं देते।
Wrong working
कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वे उसे सभी विपदाओं से बचाएँ।
Right working
कवि विपदाओं से बचाव नहीं माँगता; वह केवल इतना चाहता है कि विपदा में उसे भय न लगे।
Do this: हर पंक्ति को उसके 'नहीं' के साथ पूरा पढ़िए; कविता का हर भाग नकार से शुरू होता है।
Usually costs: 2 अंक के उत्तर में पूरे 2 अंक, क्योंकि केंद्रीय भाव ही गलत हो जाता है
Mistake: कठिन शब्दों के गलत अर्थ, विशेषकर 'वंचना' और 'क्षय'
'वंचना' को 'वंचित रहना' और 'क्षय' को 'कमी' समझ लिया जाता है।
Wrong working
लाभ से वंचित रहने पर भी कवि मन में कमी महसूस न करे।
Right working
लाभ के स्थान पर धोखा (वंचना) मिलने पर भी कवि मन में क्षय यानी नाश या हार न माने।
Do this: शब्दार्थ याद कीजिए: वंचना = धोखा/छलना, क्षय = नाश, अनामय = रोग रहित, निखिल = संपूर्ण, संशय = संदेह।
Usually costs: भाव वाले उत्तर में 1 अंक; शब्दार्थ वाले बहुविकल्पी प्रश्न में पूरा 1 अंक
Mistake: अंतिम पंक्ति में संदेह किस पर, यह गलत लिखना
'करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही' पढ़कर विद्यार्थी लिखते हैं कि कवि संसार पर संदेह न करे।
Wrong working
दुख की रात में कवि चाहता है कि वह संसार पर संदेह न करे।
Right working
दुख की रात में सारा संसार धोखा दे, तब भी कवि चाहता है कि वह ईश्वर पर कोई संशय न करे।
Do this: 'तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय' में 'तुम' करुणामय ईश्वर है, इसे रेखांकित करके याद रखिए।
Usually costs: 2 अंक के उत्तर में 1 अंक
Mistake: प्रश्न का उत्तर देने के बजाय पूरी कविता का सार लिख देना और शब्द-सीमा पार करना
विद्यार्थी सोचते हैं कि लंबा उत्तर अधिक अंक दिलाएगा, इसलिए हर पंक्ति का अर्थ लिख देते हैं।
Wrong working
(प्रश्न: सहायक न मिलने पर कवि क्या चाहता है?) कवि पहले विपदा में भय न होने की बात करता है, फिर दुख पर विजय की, फिर सहायक की, फिर हानि की... (60 से अधिक शब्द)
Right working
कवि चाहता है कि कहीं कोई सहायक न मिले, तब भी उसका बल और पौरुष न डगमगाए और वह स्वयं संघर्ष करे।
Do this: केवल पूछी गई पंक्ति का भाव लिखिए और 25-30 शब्दों में दो स्पष्ट बिंदु दीजिए।
Usually costs: 2 अंक के उत्तर में 1 अंक, क्योंकि मुख्य बिंदु स्पष्ट नहीं होता
रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण: previous year questions
- Course A: Not asked in any of the 21 board papers we hold (2023 to 2026).
- Course B: Asked in 2 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.2 marks per paper; 2 questions in all, counting OR alternatives. In 0 of 4 sample papers.
Counted from the real papers on our previous year papers page, not estimated. Average marks are over every board paper we hold, with an OR pair counted once. Chapter tags are ours.
Solved board questions from रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण
Real questions from recent papers. Try each one first, then open our step-by-step solution with marks per step.
2023 Course B, set 4/4/1, Q8 · 2 marks · MCQ
पद्य खंड पर आधारित निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर देने के लिए सर्वाधिक उचित विकल्प चुनकर लिखिए।
- (i)1 mark
'आत्मत्राण' कविता में कवि किससे छुटकारा प्राप्त करना चाहता है ?
- (a)आत्मिक भय से
- (b)सुख और दुःख से
- (c)हानि और लाभ से
- (d)जीवन और मरण से
- (ii)1 mark
'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता के आधार पर बताइए कि पर्वतों की ऊँचाई से गिरने वाले झरने किसके यश का गुणगान कर रहे हैं ?
- (a)अंबर के
- (b)इंद्र के
- (c)गिरि के
- (d)पावस के
Try it first, then show our solutionSolution
- 1 mark
(i) 'आत्मत्राण' में कवि प्रभु से आत्मिक भय से मुक्ति (निर्भयता) चाहता है। (a)
- 1 mark
(ii) झरने गिरि (पर्वत) के यश का गान करते हैं। (c)
Answer: (i) a; (ii) c
Where the marks are
- (i) विकल्प (a) (1 अंक)
- (ii) विकल्प (c) (1 अंक)
Every रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण question, by year
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Practice questions on रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 1 mark · MCQBoard level
'आत्मत्राण' कविता मूल रूप से किस भाषा में लिखी गई और इसका हिंदी अनुवाद किसने किया?
(क) संस्कृत; रवींद्रनाथ ठाकुर
(ख) बंगला; हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) बंगला; रवींद्रनाथ ठाकुर
(घ) अंग्रेज़ी; हजारीप्रसाद द्विवेदीHint
कवि और अनुवादक को अलग-अलग पहचानिए; पाठ प्रवेश में अनुवाद की बात लिखी है।
Answer
(ख) बंगला; हजारीप्रसाद द्विवेदी। कविता रवींद्रनाथ ठाकुर की है, जिसका बंगला से हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया।
Q2 · 2 marks · Short answerBoard level
कवि ईश्वर से प्रतिदिन अपना 'त्राण' क्यों नहीं करवाना चाहता? इसके स्थान पर वह क्या माँगता है? (25-30 शब्द)
Hint
'अनुदिन' और 'अनामय' शब्दों के अर्थ याद कीजिए।
Answer
उत्तर-बिंदु: कवि स्वयं संघर्ष करना चाहता है; 'अनुदिन' = प्रतिदिन; वह कठिनाइयों को पार करने की स्वस्थ (अनामय) शक्ति माँगता है।
आदर्श उत्तर: कवि स्वयं संघर्ष करना चाहता है, इसलिए प्रतिदिन ईश्वर से बचाव नहीं माँगता। वह केवल कठिनाइयों को पार करने की स्वस्थ, अनामय शक्ति माँगता है।
Q3 · 2 marks · Short answerHarder board level
'त्राण' का अर्थ बचाव है, फिर भी कवि 'मेरा त्राण करो' को अपनी प्रार्थना नहीं मानता। ऐसे में कविता का शीर्षक 'आत्मत्राण' कैसे उचित है? (25-30 शब्द)
Hint
शीर्षक को 'आत्म' और 'त्राण' में तोड़कर देखिए।
Answer
उत्तर-बिंदु: आत्म + त्राण = स्वयं अपना बचाव; कवि ईश्वर से बचाव नहीं, स्वयं को बचाने की शक्ति माँगता है; इसलिए शीर्षक सार्थक है।
आदर्श उत्तर: 'आत्मत्राण' का अर्थ है स्वयं अपना बचाव। कवि ईश्वर से बचाव नहीं, बल्कि स्वयं को बचाने की शक्ति और निर्भयता माँगता है, इसलिए शीर्षक सार्थक है।
Q4 · 2 marks · Short answerHarder board level
'वहन कर सकूँ इसको निर्भय' पंक्ति में 'इसको' किसके लिए आया है? इस पंक्ति से कवि का कौन-सा दृष्टिकोण प्रकट होता है? (25-30 शब्द)
Hint
इससे ठीक पहले वाली पंक्ति में 'मेरा भार' शब्द देखिए।
Answer
उत्तर-बिंदु: 'इसको' = कवि का भार (व्याख्या: जीवन के दुख और दायित्व); कवि भार हल्का नहीं करवाना चाहता; वह उसे बिना डरे स्वयं उठाना चाहता है।
आदर्श उत्तर: 'इसको' का संकेत कवि के जीवन के भार, अर्थात दुखों और ज़िम्मेदारियों की ओर है। कवि भार हल्का नहीं करवाना चाहता, बल्कि उसे बिना डरे स्वयं उठाना चाहता है।
Q5 · 2 marks · Short answerHarder board level
कविता में ईश्वर को बार-बार 'करुणामय' कहकर संबोधित करने का क्या प्रभाव पड़ता है? (25-30 शब्द)
Hint
सोचिए, यह शब्द कवि की विनम्रता और ईश्वर पर विश्वास के बारे में क्या बताता है।
Answer
उत्तर-बिंदु: कवि की विनम्रता; ईश्वर की दया पर विश्वास; प्रार्थना में आत्मीयता और लय।
आदर्श उत्तर: बार-बार 'करुणामय' कहकर पुकारने से कवि की विनम्रता और ईश्वर की दया पर उसका विश्वास प्रकट होता है। इससे प्रार्थना में आत्मीयता और लय भी आती है।
Q6 · 2 marks · Short answerHarder board level
'आत्मत्राण' के आधार पर कवि के व्यक्तित्व की दो विशेषताएँ प्रमाण सहित लिखिए। (25-30 शब्द)
Hint
एक विशेषता कविता के बीच के भाग से और एक अंत के भाग से चुनिए।
Answer
उत्तर-बिंदु: आत्मनिर्भरता (सहायक न मिलने पर भी पौरुष न हिले); विनम्र आस्था (सुख में नत शिर होकर ईश्वर को पहचानना)।
आदर्श उत्तर: कवि आत्मनिर्भर है; वह सहायक न मिलने पर भी अपना पौरुष नहीं डिगने देना चाहता। वह विनम्र आस्थावान भी है, जो सुख में सिर झुकाकर ईश्वर को पहचानना चाहता है।
Q7 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
कल्पना कीजिए कि कवि की यह प्रार्थना पूरी हो जाती है। ऐसे में विपत्ति आने पर उसका व्यवहार कैसा होगा? कविता के आधार पर लिखिए। (25-30 शब्द)
Hint
कवि ने जो-जो माँगा है (निर्भयता, पौरुष, क्षय न मानना, संशय न करना), उसे व्यवहार में बदलकर लिखिए।
Answer
उत्तर-बिंदु: भय नहीं; सहायक की प्रतीक्षा नहीं; हानि-धोखे में भी हिम्मत बनी रहेगी; ईश्वर पर विश्वास अटल रहेगा।
आदर्श उत्तर: तब विपत्ति आने पर कवि न डरेगा, न किसी सहायक की राह देखेगा। वह धोखा और हानि सहकर भी हिम्मत नहीं हारेगा और ईश्वर पर विश्वास बनाए रखेगा।
Q8 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
परीक्षा के तनाव और असफलता के डर से जूझ रहे विद्यार्थियों के लिए 'आत्मत्राण' का संदेश कितना उपयोगी है? तर्क सहित लिखिए। (25-30 शब्द)
Hint
'कभी न विपदा में पाऊँ भय' और 'मन में ना मानूँ क्षय' के भाव को विद्यार्थी के जीवन से जोड़िए।
Answer
उत्तर-बिंदु: संदेश उपयोगी है; कठिनाई से भागना नहीं, निर्भय होकर सामना करना; असफलता को मन की हार न मानना; फिर प्रयास करना।
आदर्श उत्तर: यह संदेश उपयोगी है। कविता सिखाती है कि कठिनाई से भागना नहीं, निर्भय होकर उसका सामना करना है। असफलता को मन की हार न मानकर विद्यार्थी प्रयास कर सकते हैं।
Test your recall
Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.
1.'आत्मत्राण' के मूल कवि कौन हैं और यह मूलतः किस भाषा में है?Show answer
रवींद्रनाथ ठाकुर; मूलतः बंगला में।
2.इस कविता का हिंदी अनुवाद किसने किया?Show answer
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने।
3.कवि ईश्वर को किस संबोधन से बार-बार पुकारता है?Show answer
'करुणामय', अर्थात दूसरों पर दया करने वाला।
4.कवि की पहली प्रार्थना क्या है, जो वह बचाव के स्थान पर माँगता है?Show answer
'कभी न विपदा में पाऊँ भय', यानी विपदा में भी निडर रहे।
5.सहायक न मिलने पर कवि क्या चाहता है? पंक्ति बताइए।Show answer
'तो अपना बल पौरुष न हिले', उसका अपना पराक्रम न डगमगाए।
6.'तरने की हो शक्ति अनामय' में 'अनामय' का अर्थ क्या है?Show answer
रोग रहित / स्वस्थ; कवि कठिनाइयों को पार करने की स्वस्थ शक्ति माँगता है।
7.सुख के दिनों में कवि कैसा रहना चाहता है?Show answer
'नत शिर होकर', सिर झुकाकर, विनम्रता से हर क्षण ईश्वर को पहचानते हुए।
8.कविता की अंतिम पंक्ति क्या है और इसका भाव क्या है?Show answer
'तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय'; सारा संसार धोखा दे, तब भी ईश्वर पर संदेह न हो।
Quick revision checklist
The night before the exam: can you do each of these without looking?
- क्या आप बता सकते हैं कि 'आत्मत्राण' का अर्थ क्या है और शीर्षक क्यों सार्थक है?
- क्या आप कवि, अनुवादक और मूल भाषा तीनों बिना देखे लिख सकते हैं?
- क्या आप कविता की चार 'नहीं' वाली माँगें और उनके बदले की चार 'बस इतना' वाली माँगें गिना सकते हैं?
- क्या आप वंचना, क्षय, अनामय, अनुदिन, निखिल, संशय, पौरुष और त्राण के अर्थ बता सकते हैं?
- क्या आप 'हानि उठानी पड़े जगत् में' वाली पंक्तियों का भाव 25-30 शब्दों में लिख सकते हैं?
- क्या आप बता सकते हैं कि सुख और दुख, दोनों में कवि ईश्वर से कैसा संबंध रखना चाहता है?
- क्या आप पाठ प्रवेश के तीन उदाहरण (तैराक, परीक्षार्थी, पहलवान) कविता के संदेश से जोड़ सकते हैं?
- क्या आप कवि के व्यक्तित्व की दो विशेषताएँ कविता की पंक्तियों के प्रमाण सहित बता सकते हैं?
रवींद्रनाथ ठाकुर – आत्मत्राण: frequently asked questions
'आत्मत्राण' कविता का अनुवाद किसने किया है?
'आत्मत्राण' मूल रूप से रवींद्रनाथ ठाकुर ने बंगला में लिखी थी। इसका हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है। पाठ प्रवेश के अनुसार यह अनुवाद मूल रचना की 'आत्मा' को सुरक्षित रखता है।
'आत्मत्राण' शीर्षक का अर्थ क्या है और यह सार्थक क्यों है?
'आत्म' का अर्थ है स्वयं और 'त्राण' का अर्थ है बचाव या भय निवारण; अर्थात अपना बचाव स्वयं करना। कवि ईश्वर से रक्षा नहीं, संकटों से खुद पार पाने की शक्ति माँगता है। इसलिए शीर्षक कविता के भाव से पूरी तरह मेल खाता है।
कवि ईश्वर से वास्तव में क्या माँगता है?
कवि विपत्ति से बचाव या रोज़ की रक्षा नहीं माँगता। वह चाहता है कि विपदा में उसे भय न हो, वह दुख पर जय पाए, सहायक न मिलने पर भी उसका पौरुष न हिले और वह बोझ निर्भय होकर उठा सके। साथ ही वह दुख की घड़ी में ईश्वर पर संशय न करने की शक्ति माँगता है।
यह प्रार्थना दूसरी प्रार्थनाओं से अलग कैसे है?
सामान्यतः प्रार्थना में लोग दुख दूर करने या सुख देने की माँग करते हैं। इस कविता में कवि साफ़ कहता है कि विपदाओं से बचाना उसकी प्रार्थना नहीं है। वह संघर्ष स्वयं करने का साहस माँगता है, इसलिए यह आत्मनिर्भरता की प्रार्थना है।
'नत शिर होकर सुख के दिन में तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में' का भाव क्या है?
कवि चाहता है कि सुख के दिनों में वह घमंड न करे, बल्कि सिर झुकाकर विनम्र बना रहे। वह हर क्षण ईश्वर को याद रखना चाहता है। इससे पता चलता है कि कवि सुख में भी प्रभु को नहीं भूलना चाहता।
रवींद्रनाथ ठाकुर के बारे में परीक्षा के लिए क्या याद रखें?
रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 6 मई 1861 को बंगाल में हुआ और वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय हैं। उन्हें यह सम्मान 'गीतांजलि' के लिए मिला। उन्होंने शांति निकेतन की स्थापना की और उनके गीतों से रवींद्र संगीत की धारा बनी।
Based on: CBSE हिंदी पाठ्यक्रम-ब (085), कक्षा 10, 2026-27; NCERT स्पर्श भाग 2 (Reprint 2026-27), आत्मत्राण