सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस: भावार्थ और व्याख्या Class 10
Updated 14 October 2026 · Fact-checked
‘पर्वत प्रदेश में पावस’ सुमित्रानंदन पंत की कविता है (स्पर्श भाग 2)। इसमें वर्षा ऋतु में पहाड़ी प्रदेश की प्रकृति के पल-पल बदलते रूप का चित्र है। पर्वत, ताल, झरने, पेड़ और बादल मनुष्य की तरह काम करते दिखाए गए हैं। बोर्ड इस पर काव्यांश आधारित पाँच MCQ और 2 अंक के प्रश्न पूछता है।
What सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस is about
‘पर्वत प्रदेश में पावस’ स्पर्श भाग 2 के पद्य खंड की चौथी कविता है। इसके कवि सुमित्रानंदन पंत हैं, जिन्हें NCERT छायावाद का प्रमुख स्तंभ बताती है। कविता एक पंक्ति में यह कहती है: वर्षा ऋतु में पहाड़ों की प्रकृति हर पल अपना रूप बदलती है, और यह दृश्य किसी जादू जैसा लगता है।
बोर्ड पेपर के खंड ग (काव्य खंड) में यह कविता दो तरह से आती है। पहला, पठित काव्यांश देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (1×5) पूछे जाते हैं, जिनमें एक कथन-कारण प्रश्न भी हो सकता है। दूसरा, कविताओं पर आधारित चार में से तीन प्रश्नों के उत्तर 25-30 शब्दों में लिखने होते हैं, और हर प्रश्न 2 अंक का होता है। इसलिए शब्दार्थ, भाव, अलंकार और मानवीकरण, चारों की पक्की समझ ज़रूरी है।
In real board papers: Course A, asked in 1 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.3 marks per paper; Course B, asked in 5 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 1.3 marks per paper. See the questions
सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस: explanation
In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.
पहला भाग (पर्वत और ताल): वर्षा ऋतु है और कवि पहाड़ी प्रदेश में है। यहाँ प्रकृति का रूप हर पल बदल रहा है। करधनी के आकार की ढाल वाला विशाल पर्वत खड़ा है। उस पर खिले हज़ारों फूल मानो उसकी आँखें हैं। इन आँखों को फाड़कर वह नीचे के जल में अपना विशाल आकार बार-बार देख रहा है। पर्वत के चरणों में पला तालाब दर्पण की तरह दूर तक फैला है। इससे लगता है कि पर्वत अपनी सुंदरता पर मुग्ध है।
दूसरा भाग (झरने): पर्वत से गिरते झरने झर-झर की आवाज़ करते हुए मानो पर्वत के गौरव का गीत गा रहे हैं। उनकी मस्ती देखकर नस-नस में उत्साह भर जाता है। झाग भरे ये झरने मोती की लड़ियों जैसे सुंदर लगते हैं।
तीसरा भाग (पेड़): पर्वत के हृदय से ऊँचे-ऊँचे पेड़ उठे हैं। वे ऊँचा उठने की कामना लिए शांत आकाश की ओर एकटक और अटल होकर देख रहे हैं। वे कुछ चिंता में भी डूबे लगते हैं, मानो सोच रहे हों कि आकाश तक कैसे पहुँचें।
चौथा भाग (अचानक बदलाव): अचानक दृश्य बदल जाता है। ऐसा लगता है कि पर्वत पारे जैसे चमकीले पंख फड़फड़ाकर उड़ गया। भाव यह है कि घने बादलों ने उसे ढक लिया। झरने दिखने बंद हो गए, केवल उनकी आवाज़ बची। ऐसी वर्षा हुई मानो आकाश धरती पर टूट पड़ा हो। शाल के पेड़ ऐसे छिप गए मानो डरकर धरती में धँस गए हों। ताल से धुआँ-सा उठ रहा है, मानो ताल में आग लग गई हो। कवि कहता है कि इस प्रकार बादल रूपी विमान में घूमते हुए इंद्र जादू का खेल खेल रहे थे।
केंद्रीय भाव: कविता वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रकृति के क्षण-क्षण बदलते, सजीव और रहस्य भरे सौंदर्य को दिखाती है। कवि ने मानवीकरण और चित्रात्मक भाषा से प्रकृति को जीवित पात्र बना दिया है, जिससे पाठक को लगता है कि वह स्वयं पहाड़ों में घूम रहा है।
Themes and message
प्रकृति का पल-पल बदलता रूप
कविता का मूल भाव यही है कि वर्षा ऋतु में पहाड़ी प्रकृति एक जैसी नहीं रहती। पहले भाग में धूप जैसा साफ़ दृश्य है, जिसमें पर्वत ताल में अपना रूप देख रहा है। अंतिम भाग में अचानक बादल छा जाते हैं, पर्वत ओझल हो जाता है और तेज़ वर्षा होने लगती है। यह बदलाव इतना तेज़ है कि कवि को यह इंद्र का जादू लगता है। इससे पता चलता है कि कवि प्रकृति की अस्थिरता को भी सुंदरता मानता है।
From the text: ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।’ और बाद में ‘उड़ गया, अचानक लो, भूधर’
प्रकृति का मानवीकरण और सजीवता
पंत ने पूरी कविता में प्रकृति को मनुष्य की तरह भावनाएँ और क्रियाएँ करते दिखाया है। पर्वत आँखें फाड़कर अपना रूप देखता है, झरने गौरव का गीत गाते हैं, पेड़ चिंता में डूबकर आकाश की ओर झाँकते हैं और शाल के पेड़ डर जाते हैं। इससे प्रकृति केवल दृश्य नहीं रहती, वह जीवित पात्र बन जाती है। पाठक इन भावनाओं से जुड़ जाता है और कविता अधिक प्रभावशाली हो जाती है।
From the text: ‘अवलोक रहा है बार-बार’, ‘गिरि का गौरव गाकर झर-झर’, ‘धँस गए धरा में सभय शाल!’
ऊँचा उठने की आकांक्षा
तीसरे भाग में पेड़ पर्वत के हृदय से उठकर आकाश की ओर देख रहे हैं। शब्दार्थ के अनुसार ‘उच्चाकांक्षा’ का अर्थ है ऊँचा उठने की कामना। इससे लगता है कि पेड़ पर्वत के मन की ऊँची इच्छाओं के रूप हैं। वे एकटक और अटल हैं, पर कुछ चिंतित भी हैं। इसे मनुष्य के मन से जोड़कर समझा जा सकता है: बड़े लक्ष्य के लिए दृढ़ता चाहिए, और लक्ष्य तक पहुँचने की चिंता भी साथ रहती है।
From the text: ‘उच्चाकांक्षाओं से तरुवर’ और ‘अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।’
प्रकृति का रहस्य और जादू
कविता के अंत में कवि सारे बदलावों को इंद्र के जादू का खेल कहता है। पर्वत का उड़ जाना, ताल से धुआँ उठना, आकाश का धरती पर टूट पड़ना, ये सब असंभव लगने वाली बातें हैं। कवि इन्हें वास्तविक घटनाओं के कल्पनापूर्ण रूप में दिखाता है। इससे पता चलता है कि छायावादी कवि की तरह पंत प्रकृति में एक रहस्य और अद्भुतता देखते हैं, जिसे आँखों से देखा जा सकता है पर पूरी तरह समझा नहीं जा सकता।
From the text: ‘था इंद्र खेलता इंद्रजाल।’ (शब्दार्थ: इंद्रजाल - जादूगरी)
आत्म-मुग्धता और गौरव
पहले दो भागों में पर्वत का गौरव दिखता है। वह अपने विशाल आकार को ताल रूपी दर्पण में बार-बार देखता है, जैसे कोई अपने रूप पर मोहित हो। झरने भी उसी के गौरव का गान करते हैं। इससे पर्वत एक शक्तिशाली, गर्वीले राजा जैसा लगता है, जिसके चरणों में ताल पला है। अंत में वही पर्वत बादलों में छिप जाता है, जिससे यह भी संकेत मिलता है कि प्रकृति में कोई भी रूप स्थायी नहीं।
From the text: ‘नीचे जल में निज महाकार,’ और ‘दर्पण-सा फैला है विशाल!’
The speaker and the people in the poem
कवि (वक्ता)
कविता का वक्ता, जो पर्वत प्रदेश में वर्षा ऋतु का दृश्य स्वयं देखकर उसका वर्णन करता है।
- प्रकृति-प्रेमी: पर्वत, ताल, झरने, पेड़ और बादल, हर दृश्य को प्रेम से देखता है।
- सूक्ष्म निरीक्षक: ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।’ लिखकर हर क्षण के बदलाव को पकड़ता है।
- कल्पनाशील: पर्वत के उड़ने और ताल के जलने की कल्पना करता है।
- विस्मित और रोमांचित: ‘उड़ गया, अचानक लो, भूधर’ में ‘लो’ शब्द उसके आश्चर्य को दिखाता है।
पूरी कविता कवि की आँखों से देखा गया चित्र है। अंत में वह सब कुछ ‘था इंद्र खेलता इंद्रजाल।’ कहकर अपने विस्मय को प्रकट करता है।
पर्वत (मानवीकृत)
कविता का मुख्य वर्णित पात्र, जिसे मनुष्य की तरह देखते, सोचते और उड़ते दिखाया गया है।
- विशाल और गौरवशाली: ‘मेखलाकार पर्वत अपार’
- आत्म-मुग्ध: ताल रूपी दर्पण में अपना रूप बार-बार देखता है।
- ऊँची आकांक्षा वाला: उसके हृदय से उठे पेड़ आकाश को छूने की इच्छा रखते हैं।
- क्षणभंगुर रूप वाला: अचानक बादलों में ओझल होकर ‘उड़’ जाता है।
‘अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,’ और ‘अवलोक रहा है बार-बार’ में वह मनुष्य की तरह आँखें फाड़कर देखता है; ‘फड़का अपार पारद के पर!’ में वह पक्षी की तरह उड़ता दिखता है।
इंद्र (वर्णित)
वर्षा के देवता, जिन्हें कवि अंत में सारे बदलावों का कारण, एक जादूगर के रूप में बताता है।
- जादूगर: पूरे दृश्य को ‘इंद्रजाल’ यानी जादू की तरह बदल देते हैं।
- गतिशील: बादल रूपी विमान में घूमते हैं।
- खिलाड़ी स्वभाव: प्रकृति के बदलाव को ‘खेल’ की तरह करते हैं।
‘—यों जलद-यान में विचर-विचर’ के बाद ‘था इंद्र खेलता इंद्रजाल।’ शब्दार्थ में जलद-यान का अर्थ बादल रूपी विमान और इंद्रजाल का अर्थ जादूगरी दिया गया है।
Poetic devices
| Device | Example | Effect |
|---|---|---|
| मानवीकरण अलंकार | ‘अवलोक रहा है बार-बार’ (पर्वत), ‘हैं झाँक रहे नीरव नभ पर’ (पेड़), ‘धँस गए धरा में सभय शाल!’ | पर्वत देखता है, पेड़ झाँकते हैं, शाल डरते हैं। जड़ प्रकृति पर मानवीय भाव और क्रियाएँ आरोपित होने से पूरा दृश्य जीवित और नाटकीय बन जाता है। |
| अनुप्रास अलंकार | ‘पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,’ और ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।’ (‘प’ वर्ण की आवृत्ति); ‘झरते हैं झाग भरे निर्झर!’ (‘झ’ की आवृत्ति) | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति से पंक्तियों में संगीत और लय आती है, और झरने की ध्वनि जैसा प्रभाव पैदा होता है। |
| उपमा अलंकार | ‘दर्पण-सा फैला है विशाल!’ और ‘मोती की लड़ियों-से सुंदर’ | ताल की तुलना दर्पण से उसकी स्वच्छता और फैलाव दिखाती है, जिसमें पर्वत का प्रतिबिंब दिखता है। झरनों की तुलना मोती की लड़ियों से उनकी चमक और सफ़ेद झाग को आँखों के सामने ले आती है। |
| रूपक अलंकार | ‘अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,’ और ‘—यों जलद-यान में विचर-विचर’ | फूलों को आँखें (दृग-सुमन) और बादलों को विमान (जलद-यान) मान लिया गया है। उपमेय और उपमान एक हो जाने से चित्र अधिक गहरा और कल्पनापूर्ण बनता है। |
| पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार | ‘बार-बार’, ‘झर-झर’, ‘नस-नस’, ‘उठ-उठ कर’, ‘विचर-विचर’ | शब्दों की आवृत्ति से क्रिया का लगातार होना दिखता है, जैसे पर्वत का बार-बार देखना या पेड़ों का एक के बाद एक उठना। इससे लय और भाव दोनों गहरे होते हैं। |
| अतिशयोक्ति अलंकार | ‘है टूट पड़ा भू पर अंबर!’ और ‘उठ रहा धुआँ, जल गया ताल!’ | मूसलाधार वर्षा और ताल से उठती भाप जैसी स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है। इससे वर्षा की तीव्रता और दृश्य की अद्भुतता का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। |
| चित्रात्मक भाषा और तुकांत लय | ‘प्रदेश’ और ‘प्रकृति-वेश’, ‘ताल’ और ‘विशाल’ जैसे तुकांत शब्द; ‘उड़ गया, अचानक लो, भूधर’ जैसा दृश्य | हर पंक्ति एक चित्र की तरह आँखों के सामने बनती है। तुकांत शब्दों से कविता गेय बनती है, और पाठक को लगता है कि वह पहाड़ों में खड़ा होकर दृश्य देख रहा है। |
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।
कवि: कविता की दूसरी पंक्ति, जहाँ कवि वर्षा ऋतु के पहाड़ी प्रदेश का परिचय देता है।
यह पूरी कविता का मूल भाव है: वर्षा में प्रकृति हर क्षण अपना रूप बदलती है। इसमें ‘प’ वर्ण का अनुप्रास और ‘पल-पल’ में पुनरुक्ति प्रकाश है।
अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,
कवि: पर्वत के वर्णन में, जब वह नीचे ताल में अपना रूप देख रहा है।
पर्वत पर खिले हज़ारों फूलों को उसकी आँखें माना गया है (रूपक)। आँखें फाड़कर देखना पर्वत के मानवीकरण और उसकी आत्म-मुग्धता को दिखाता है।
दर्पण-सा फैला है विशाल!
कवि: पर्वत के चरणों में फैले ताल का वर्णन।
उपमा अलंकार। ताल स्वच्छ और विशाल है, इसलिए उसमें पर्वत का प्रतिबिंब दर्पण की तरह दिखता है।
मोती की लड़ियों-से सुंदर
कवि: पर्वत से गिरते झाग भरे झरनों का वर्णन।
उपमा अलंकार। झरनों की सफ़ेदी, चमक और लगातार बहने को मोती की माला से जोड़कर सुंदर चित्र बनाया गया है।
अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।
कवि: पर्वत के हृदय से उठे पेड़ों का वर्णन, जो आकाश की ओर देख रहे हैं।
पेड़ एकटक, स्थिर और कुछ चिंतित हैं। यह ऊँचा उठने की आकांक्षा के साथ आने वाली दृढ़ता और चिंता को दिखाता है।
है टूट पड़ा भू पर अंबर!
कवि: अचानक बादल छाने के बाद होने वाली तेज़ वर्षा का वर्णन।
अतिशयोक्ति अलंकार। मूसलाधार वर्षा ऐसी है मानो आकाश ही धरती पर गिर पड़ा हो।
था इंद्र खेलता इंद्रजाल।
कवि: कविता की अंतिम पंक्ति, जहाँ कवि सारे बदलावों का कारण बताता है।
पूरे दृश्य को इंद्र के जादू का खेल कहकर कवि प्रकृति के रहस्य और अद्भुतता को सामने रखता है।
सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस in real life
Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
प्रकृति का पल-पल बदलता रूप
मान लीजिए आप परिवार के साथ बरसात में किसी पहाड़ी कस्बे में गए हैं। सुबह घाटी और झील साफ़ दिख रही थी, पर दस मिनट में बादल उतर आए और सामने की पहाड़ी दिखनी बंद हो गई। केवल पास के झरने की आवाज़ आती रही।
अपने इस अनुभव की तुलना 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता के अंतिम अंश से कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- अनुभव का मुख्य बदलाव: पहाड़ी का ओझल होना, केवल आवाज़ बचना
- कविता से मेल: 'उड़ गया... भूधर' और 'रव-शेष रह गए हैं निर्झर'
- निष्कर्ष: प्रकृति का वेश पल-पल बदलता है
Answer: मेरा अनुभव कविता जैसा था। कवि को भी बादलों में भूधर उड़ता लगा और निर्झर 'रव-शेष' रह गए। पहाड़ी का गायब होना और झरने की आवाज़ ठीक यही दृश्य है।
Memory hook: पहाड़ी छिपी, आवाज़ बची = 'रव-शेष रह गए हैं निर्झर'।
आत्म-मुग्धता और गौरव
कल्पना कीजिए कि आपकी कक्षा का एक मित्र नई पोशाक पहनकर आया है। वह पूरे दिन बार-बार मोबाइल के कैमरे में अपना चेहरा देखता है और तस्वीरें खींचता रहता है।
मित्र के व्यवहार की तुलना कविता के पर्वत से कीजिए। दोनों में क्या समानता है?
Try it first, then show the solutionSolution
- पर्वत ताल रूपी दर्पण में बार-बार अपना महाकार देखता है
- मित्र कैमरे को दर्पण की तरह प्रयोग कर रहा है
- समानता: अपने रूप पर मुग्ध होना
Answer: जैसे पर्वत ताल रूपी दर्पण में बार-बार अपना महाकार देखता है, वैसे ही मित्र कैमरे में खुद को निहारता है। दोनों में अपने रूप पर मुग्ध होने का भाव है।
Memory hook: मोबाइल का कैमरा = पर्वत का ताल रूपी दर्पण।
ऊँचा उठने की आकांक्षा
मान लीजिए आपकी बड़ी बहन बोर्ड परीक्षा में ऊँचे अंक लाने का लक्ष्य रखकर रोज़ मेहनत करती है। पर रात को वह चिंता में चुपचाप छत पर बैठकर आसमान ताकती रहती है।
बहन की स्थिति को कविता के तरुवरों से जोड़कर लिखिए और उसे एक सलाह दीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- तरुवर उच्चाकांक्षा से नीरव नभ की ओर झाँक रहे हैं
- वे 'कुछ चिंतापर' हैं, फिर भी 'अटल' हैं
- सलाह: दृढ़ता रखो, चिंता कम करो
Answer: बहन तरुवरों जैसी है, जो उच्चाकांक्षा से नभ की ओर देखते हुए 'कुछ चिंतापर' हैं। मैं कहूँगा कि वृक्षों की तरह अटल रहो, चिंता कम और मेहनत ज़्यादा करो।
Memory hook: ऊँचा लक्ष्य + थोड़ी चिंता + अटल मन = पंत के तरुवर।
प्रकृति का मानवीकरण
कल्पना कीजिए कि विद्यालय की पत्रिका के लिए आपको अपने मोहल्ले की बरसात पर कुछ पंक्तियाँ लिखनी हैं। आप चाहते हैं कि आपका वर्णन भी पंत की कविता की तरह सजीव लगे।
मानवीकरण का प्रयोग करते हुए अपने मोहल्ले की बरसात पर दो वाक्य लिखिए और बताइए कि मानवीकरण कहाँ है।
Try it first, then show the solutionSolution
- प्रकृति की किसी वस्तु को मनुष्य जैसी क्रिया देना
- कविता में जैसे शाल 'सभय' धँसते हैं, झरने गौरव गाते हैं
- अपने वाक्यों में मानवीय क्रिया को पहचानकर बताना
Answer: 'नीम का पेड़ भीगकर खुशी से झूम रहा है। डरी हुई गली अपने गड्ढों में पानी छिपा रही है।' पेड़ का झूमना और गली का डरना मानवीय क्रियाएँ हैं।
Memory hook: जहाँ पेड़-पहाड़ हँसें, डरें या गाएँ, वहाँ मानवीकरण।
Topics in this chapter
- पर्वत प्रदेश में पावस प्रश्न-उत्तरComing soon
- पर्वत प्रदेश में पावस का भावार्थComing soon
- पर्वत प्रदेश में पावस का काव्य सौंदर्यComing soon
- पावस ऋतु में प्रकृति के परिवर्तनComing soon
- सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचयComing soon
How the board asks सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस
The question patterns to expect, and the method that works for each.
| Question type | How it is asked | Method |
|---|---|---|
| पठित काव्यांश पर पाँच MCQ (1×5) | कविता का एक भाग (जैसे पर्वत और ताल वाला भाग या झरने और पेड़ वाला भाग) देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न पूछे जाते हैं: शब्द का अर्थ, किस ऋतु की बात है, ताल की तुलना दर्पण से क्यों, पेड़ किसे देख रहे हैं आदि। | पहले काव्यांश को दो बार पढ़ें। शब्दार्थ (मेखलाकार, दृग-सुमन, अनिमेष, चिंतापर) पक्के रखें। हर विकल्प को पंक्ति से मिलाएँ। ‘सर्वाधिक उपयुक्त’ विकल्प वही है जो कारण भी बताए, जैसे ताल का दर्पण जैसा होना उसकी स्वच्छता और विशालता से जुड़ा है। |
| कथन-कारण प्रश्न | कथन (A) और कारण (R) देकर पूछा जाता है कि दोनों सही हैं या नहीं, और क्या R, A की सही व्याख्या है। उदाहरण का विषय: पर्वत का अपने रूप पर मुग्ध होना और ताल में प्रतिबिंब दिखना। | पहले A को अलग से कविता से जाँचें, फिर R को। उसके बाद देखें कि R सचमुच A का कारण है या केवल एक सही बात है। ‘क्योंकि’ लगाकर दोनों को जोड़कर पढ़ें; वाक्य तर्कपूर्ण बने तभी R सही व्याख्या है। |
| पंक्ति का भाव या आशय (2 अंक, 25-30 शब्द) | किसी पंक्ति का आशय पूछा जाता है, जैसे ‘उड़ गया, अचानक लो, भूधर’ या ‘था इंद्र खेलता इंद्रजाल।’ का भाव स्पष्ट कीजिए। | पहले शाब्दिक अर्थ एक वाक्य में, फिर उसका प्राकृतिक कारण (बादल, कोहरा, वर्षा) एक वाक्य में लिखें। अंत में कवि की कल्पना या भाव बताएँ। 30 शब्द से आगे न जाएँ। |
| मानवीकरण और काव्य सौंदर्य (2 अंक) | प्रकृति के मानवीय क्रियाकलापों के दो उदाहरण, कविता में प्रयुक्त अलंकार, या चित्रात्मक शैली के स्थल पूछे जाते हैं। | हर उदाहरण के साथ प्रकृति का अंग और उसकी मानवीय क्रिया दोनों लिखें, जैसे पर्वत का ताल में अपना रूप देखना, पेड़ों का चिंता में डूबकर आकाश की ओर झाँकना। अलंकार का नाम और पंक्ति दोनों दें। |
| प्रकृति के परिवर्तन और प्रतीक (2 अंक) | पावस ऋतु में आए परिवर्तन, पेड़ आकाश की ओर क्यों देख रहे हैं, शाल धरती में क्यों धँस गए, झरने किसका गौरव गाते हैं जैसे प्रश्न। | उत्तर कविता की घटनाओं पर ही टिकाएँ। प्रश्न के दोनों भाग (क्या और क्यों) का उत्तर दें। जहाँ प्रतीक हो (पेड़ = पर्वत की उच्चाकांक्षाएँ), वहाँ उसे स्पष्ट शब्दों में लिखें। |
| सौंदर्य-वर्णन अपने शब्दों में (अधिक शब्दों वाला प्रश्न) | कविता में वर्णित पर्वतीय प्रदेश की सुंदरता का वर्णन अपने शब्दों में करने को कहा जाता है। | चारों दृश्य क्रम से लिखें: पर्वत और ताल, झरने, पेड़, फिर अचानक बादल और वर्षा। हर दृश्य में एक विशेषता बताएँ और अंत में कवि का भाव (प्रकृति का जादुई, बदलता रूप) एक वाक्य में दें। |
Tricks to remember सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
दृश्यों का क्रम: 'पता झरे तरु, बादल इंद्र'
प-ता: पर्वत और ताल (दर्पण) → झरे: झाग भरे निर्झर → तरु: उच्चाकांक्षी तरुवर → बादल: भूधर उड़ा, निर्झर रव-शेष, अंबर टूटा, शाल धँसे, ताल से धुआँ → इंद्र: इंद्रजाल।
Use it when: काव्यांश पहचानने और 'कौन-सी पंक्ति पहले आती है' जैसे प्रश्नों में क्रम याद रखने के लिए।
कविता के दो भाग: 'खुला दृश्य, ढका दृश्य'
पहला भाग खुला दृश्य है—पर्वत, ताल, झरने, तरुवर सब दिखते हैं। 'उड़ गया, अचानक लो' से ढका दृश्य शुरू—सब बादलों में छिपता है और अंत में इंद्र का जादू।
Use it when: 'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' को समझाने और बदलाव वाले प्रश्नों में।
मानवीय भावों की जोड़ी
पर्वत = आईना देखता घमंडी (आत्म-मुग्धता), झरने = गायक (गौरव गान), तरुवर = सपने देखता चिंतित विद्यार्थी (उच्चाकांक्षा), शाल = डरपोक (सभय), इंद्र = जादूगर (इंद्रजाल)।
Use it when: मानवीकरण और पात्र-भाव वाले 2 अंक के प्रश्नों में तुरंत उदाहरण देने के लिए।
अलंकार पहचान सूत्र
'सा/से' दिखे तो उपमा (दर्पण-सा, मोती की लड़ियों-से); 'रूपी' का भाव हो तो रूपक (दृग-सुमन, जलद-यान); एक शब्द दोहराया तो पुनरुक्ति (बार-बार, झर-झर); एक वर्ण दोहराया तो अनुप्रास (पल-पल परिवर्तित प्रकृति)।
Use it when: काव्य सौंदर्य और अलंकार वाले MCQ में।
सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस: extract-based questions
Read the extract, answer every part on paper, then open the answers.
Extract 1: पर्वत का प्रतिबिंब और झाग भरे निर्झर
गिरि का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस-नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों-से सुंदर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!
(1) · 1 mark · MCQ
'अवलोक रहा है बार-बार नीचे जल में निज महाकार' में 'निज महाकार' से क्या अभिप्राय है?
(क) ताल का फैलाव
(ख) पर्वत का अपना विशाल आकार
(ग) झरनों की लंबाई
(घ) आकाश की ऊँचाई(2) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: इससे ठीक पहले कवि बताते हैं कि मेखलाकार पर्वत नीचे फैले दर्पण-जैसे विशाल ताल में अपना आकार बार-बार देख रहा है।) 'जिसके चरणों में पला ताल' में 'जिसके' शब्द किसके लिए आया है?
(क) झरनों के लिए
(ख) तरुवरों के लिए
(ग) मेखलाकार पर्वत के लिए
(घ) इंद्र के लिए(3) · 1 mark · MCQ
काव्यांश में झरनों की सुंदरता किसके समान बताई गई है?
(क) दर्पण के समान
(ख) मोती की लड़ियों के समान
(ग) पारे के पंखों के समान
(घ) पुष्प रूपी आँखों के समान(4) · 1 mark · MCQ
'मद में नस-नस उत्तेजित कर' पंक्ति से झरनों की कौन-सी दशा प्रकट होती है?
(क) थकान
(ख) भय
(ग) मस्ती और उमंग
(घ) उदासी(5) · 1 mark · Assertion-reason
निम्नलिखित कथन और कारण को पढ़कर सही विकल्प चुनिए:
कथन (A): काव्यांश में झरनों को मनुष्य जैसी क्रिया करते हुए दिखाया गया है।
कारण (R): झरने झर-झर करते हुए गिरि का गौरव गा रहे हैं।
(क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या है।
(ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(ग) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
(घ) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।
Show the answersAnswers
- (ख) पर्वत का अपना विशाल आकार
- (ग) मेखलाकार पर्वत के लिए
- (ख) मोती की लड़ियों के समान
- (ग) मस्ती और उमंग
- (क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या है। गौरव गाना मनुष्य की क्रिया है, इसलिए यहाँ मानवीकरण है।
Extract 2: बादलों का खेल और इंद्रजाल
रव-शेष रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अंबर!
धँस गए धरा में सभय शाल!
उठ रहा धुआँ, जल गया ताल!
(1) · 1 mark · MCQ
'धँस गए धरा में सभय शाल!' पंक्ति के अनुसार शाल के वृक्ष कैसे प्रतीत होते हैं?
(क) मानो डरकर धरती में धँस गए हों
(ख) मानो हवा में उड़ गए हों
(ग) मानो आग में जल गए हों
(घ) मानो फूलों से लद गए हों(2) · 1 mark · MCQ
'रव-शेष रह गए हैं निर्झर!' पंक्ति का आशय है—
(क) झरने सूख गए
(ख) झरने दिखने बंद हो गए, केवल उनकी आवाज़ रह गई
(ग) झरने और तेज़ बहने लगे
(घ) झरनों का पानी ताल में मिल गया(3) · 1 mark · MCQ
'है टूट पड़ा भू पर अंबर!' से कवि क्या संकेत करता है?
(क) आकाश में बिजली चमकी
(ख) इतनी घनी वर्षा हुई मानो आकाश धरती पर उतर आया
(ग) आकाश एकदम साफ़ हो गया
(घ) तारे टूटकर धरती पर गिरे(4) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: अंतिम पंक्तियों में कवि कहते हैं कि 'जलद-यान' में घूमता इंद्र अपना इंद्रजाल खेल रहा था।) 'जलद-यान' शब्द का अर्थ है—
(क) बादल रूपी विमान
(ख) जल का जहाज़
(ग) जल में चलने वाली नाव
(घ) पर्वत की चोटी(5) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: अंतिम पंक्तियों में कवि इन बदलावों को बादलों में घूमते इंद्र के 'इंद्रजाल' से जोड़ते हैं।) काव्यांश के अनुसार प्रकृति के इन अचानक बदलावों को कवि क्या मानता है?
(क) प्राकृतिक आपदा
(ख) इंद्र की जादूगरी का खेल
(ग) पर्वत का क्रोध
(घ) शाल वृक्षों की शरारत
Show the answersAnswers
- (क) मानो डरकर धरती में धँस गए हों
- (ख) झरने दिखने बंद हो गए, केवल उनकी आवाज़ रह गई
- (ख) इतनी घनी वर्षा हुई मानो आकाश धरती पर उतर आया
- (क) बादल रूपी विमान
- (ख) इंद्र की जादूगरी का खेल
सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस: board-level solved questions
Ordered from board level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.
Example 1: प्रकृति का बदलता वेश · 2 marks · Short answerBoard level
'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- पावस अर्थात वर्षा ऋतु और पर्वत प्रदेश का संदर्भ
- 'प्रकृति-वेश' का अर्थ प्रकृति का रूप
- प्रकृति हर क्षण अपना रूप बदल रही है
- उदाहरण: कभी पर्वत, ताल, झरने साफ़ दिखते हैं, कभी बादल सब ढक लेते हैं (व्याख्या)
Answer: वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश की प्रकृति हर क्षण रूप बदल रही है। कभी पर्वत, ताल और झरने साफ़ दिखते हैं, तो कभी बादल सब कुछ ढक लेते हैं।
Example 2: तरुवरों की मनःस्थिति · 2 marks · Short answerHarder board level
कवि ने तरुवरों को 'अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर' कहा है। इन तीन विशेषणों से वृक्षों की कौन-सी मनःस्थिति प्रकट होती है?
Try it first, then show the solutionSolution
- अनिमेष = एकटक देखना, अर्थात लक्ष्य पर टिकी दृष्टि
- अटल = दृढ़ और स्थिर
- चिंतापर = चिंता में डूबे; संभवतः लक्ष्य तक न पहुँच पाने की चिंता (व्याख्या)
- वृक्ष उच्चाकांक्षी मनुष्य जैसे लगते हैं (मानवीकरण)
Answer: 'अनिमेष' से वृक्षों की एकटक दृष्टि, 'अटल' से उनकी दृढ़ता और 'कुछ चिंतापर' से शायद लक्ष्य तक न पहुँच पाने की चिंता झलकती है। वे महत्वाकांक्षी मनुष्य जैसे लगते हैं।
Example 3: पर्वत की आत्म-मुग्धता · 2 marks · Short answerHarder board level
पर्वत के बार-बार नीचे ताल में देखने से उसके किस मानवीय भाव का पता चलता है? स्पष्ट कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- ताल दर्पण-सा फैला है, उसमें पर्वत का महाकार दिखता है
- पर्वत 'सहस्र दृग-सुमन' (फूल रूपी आँखें) फाड़कर बार-बार देख रहा है
- इससे आत्म-मुग्धता और अपने रूप पर गर्व का भाव प्रकट होता है
- आईने में स्वयं को निहारते मनुष्य से तुलना
Answer: पर्वत ताल रूपी दर्पण में अपना विशाल आकार बार-बार निहार रहा है। इससे उसकी आत्म-मुग्धता प्रकट होती है, जैसे कोई मनुष्य आईने में स्वयं पर मुग्ध हो।
Example 4: ताल से उठता धुआँ · 2 marks · Short answerHarder board level
'उठ रहा धुआँ, जल गया ताल!' पंक्ति में कवि ने ताल के जलने की बात क्यों कही है?
Try it first, then show the solutionSolution
- ताल सचमुच नहीं जला; यह कवि की कल्पना है
- बादलों के छा जाने से ताल ढक गया (व्याख्या)
- ऊपर उठती धुंध धुएँ जैसी दिखती है
- इससे प्रकृति का रहस्यमय और जादुई रूप सामने आता है
Answer: बादलों से ताल ढक गया। ऊपर उठती धुंध धुएँ जैसी लगती है, इसलिए कवि को लगता है मानो ताल जल गया हो। यह प्रकृति का रहस्यमय रूप है।
Example 5: इंद्रजाल वाला अंत · 2 marks · Short answerHOTS / competency
कविता का अंत 'था इंद्र खेलता इंद्रजाल' से होता है। यह अंत पूरी कविता के लिए कितना उपयुक्त है? तर्क सहित लिखिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- अपना मत स्पष्ट: अंत उपयुक्त है
- अंतिम अंश के अचानक बदलाव: भूधर का उड़ना, अंबर का टूटना, ताल का जलना
- ये बदलाव जादू जैसे लगते हैं; इंद्रजाल = जादूगरी
- इंद्र को जादूगर बताकर कवि सब दृश्यों को एक सूत्र में जोड़ देता है
Answer: यह अंत उपयुक्त है। पर्वत का उड़ना, अंबर का टूटना, ताल का जलना आदि अचानक बदलाव जादू जैसे लगते हैं। इंद्र को जादूगर बताकर कवि सब दृश्य जोड़ देता है।
Example 6: तरुवरों से विद्यार्थी की सीख · 2 marks · Short answerHOTS / competency
तरुवरों की 'उच्चाकांक्षा' और उनके 'कुछ चिंतापर' होने को बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थी के जीवन से जोड़कर लिखिए कि इनसे क्या सीख मिलती है।
Try it first, then show the solutionSolution
- तरुवर पर्वत के उर से उठकर ऊँचे नभ को देख रहे हैं: ऊँचा लक्ष्य
- 'अटल' और 'अनिमेष': दृढ़ता और लक्ष्य पर टिकी दृष्टि
- 'कुछ चिंतापर': थोड़ी चिंता स्वाभाविक है
- सीख: ऊँचे लक्ष्य, दृढ़ता और एकाग्रता
Answer: वृक्षों की तरह विद्यार्थी को भी ऊँचे लक्ष्य रखने चाहिए और 'अटल' रहना चाहिए। थोड़ी चिंता स्वाभाविक है, पर एकटक लक्ष्य पर ध्यान और दृढ़ता ही उसे ऊपर उठाएगी।
Where the marks are
How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.
'उड़ गया, अचानक लो, भूधर' — कवि ने पर्वत के उड़ जाने की कल्पना क्यों की है? (25-30 शब्द) (2 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| कारण: अचानक बादल छा जाने से पर्वत आँखों से ओझल हो गया, मानो कहीं चला गया हो | 1 |
| कल्पना की व्याख्या: पारे जैसे चमकीले बादलों को पंख मानकर पर्वत को पंख फड़काकर उड़ता पक्षी दिखाया गया है | 1 |
पठित काव्यांश ('उड़ गया, अचानक लो, भूधर' से 'था इंद्र खेलता इंद्रजाल' तक) पर आधारित पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (कथन-कारण सहित) (5 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| प्रश्न 1: शब्दार्थ आधारित विकल्प (जैसे 'पारद के पर') — सही विकल्प | 1 |
| प्रश्न 2: पंक्ति का आशय ('रव-शेष रह गए हैं निर्झर') — सही विकल्प | 1 |
| प्रश्न 3: भाव या कल्पना ('है टूट पड़ा भू पर अंबर') — सही विकल्प | 1 |
| प्रश्न 4: शब्द या अलंकार ('जलद-यान' रूपक) — सही विकल्प | 1 |
| प्रश्न 5: कथन-कारण या केंद्रीय भाव (इंद्रजाल) — सही विकल्प; केवल विकल्प-संख्या या विकल्प-पाठ सही होने पर पूरा 1 अंक | 1 |
Where students lose marks in सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: 'पावस' का गलत अर्थ
विद्यार्थी 'पावस' को ग्रीष्म या बसंत समझ लेते हैं, जबकि शब्दार्थ में इसका अर्थ वर्षा ऋतु दिया है।
Wrong working
कविता में ग्रीष्म ऋतु के पर्वतीय सौंदर्य का वर्णन है।
Right working
कविता में पावस अर्थात वर्षा ऋतु में पर्वत प्रदेश के बदलते रूप का वर्णन है।
Do this: शब्दार्थ याद रखें: पावस = वर्षा ऋतु।
Usually costs: MCQ में पूरा 1 अंक; 2 अंक के उत्तर में आधार गलत होने से अंक कट सकते हैं।
Mistake: कल्पना को सचमुच की घटना लिखना
'जल गया ताल' या 'उड़ गया भूधर' को शाब्दिक अर्थ में लिख देते हैं और कवि की कल्पना नहीं समझाते।
Wrong working
वर्षा में तालाब में आग लग गई और उससे धुआँ उठने लगा।
Right working
बादलों से ढके ताल से उठती धुंध धुएँ जैसी लगती है, इसलिए कवि कल्पना करता है मानो ताल जल गया हो।
Do this: हर चौंकाने वाली पंक्ति के साथ 'मानो' या 'ऐसा लगता है' लिखकर कल्पना स्पष्ट करें।
Usually costs: 2 अंक के उत्तर में 1-2 अंक।
Mistake: कर्ता की गलती: कौन किसे देख रहा है
'अवलोक रहा है बार-बार' में कुछ विद्यार्थी लिखते हैं कि ताल पर्वत को देख रहा है।
Wrong working
ताल अपनी हज़ार आँखों से पर्वत को बार-बार देख रहा है।
Right working
मेखलाकार पर्वत अपने सहस्र दृग-सुमन (फूल रूपी आँखें) फाड़कर नीचे ताल में अपना महाकार देख रहा है।
Do this: याद रखें: देखने वाला पर्वत, दर्पण ताल, आँखें पर्वत पर खिले फूल।
Usually costs: MCQ में 1 अंक; 2 अंक के उत्तर में प्रायः पूरा उत्तर गलत माना जा सकता है।
Mistake: पूरी कविता का सार लिख देना
किसी एक पंक्ति का आशय पूछने पर विद्यार्थी पूरी कविता की कहानी दोहरा देते हैं और पूछी गई बात छूट जाती है।
Wrong working
कवि पर्वत, ताल, झरने, पेड़, बादल, शाल और इंद्र का वर्णन करता है... (तरुवरों की चिंता का कारण नहीं बताया)
Right working
तरुवर ऊँचा उठने की कामना से नभ को एकटक देख रहे हैं और शायद लक्ष्य तक न पहुँच पाने की चिंता में डूबे हैं।
Do this: पहले वाक्य में सीधे पूछी गई बात का उत्तर दें, फिर एक पंक्ति का प्रमाण।
Usually costs: 2 अंक में से 1 अंक या अधिक।
Mistake: शब्द-सीमा से बहुत लंबा उत्तर
25-30 शब्दों की जगह 60-70 शब्द लिखने से समय नष्ट होता है और मुख्य बिंदु दब जाते हैं।
Wrong working
तीन-चार वाक्यों में भूमिका, कवि परिचय और पूरी कविता का वर्णन करके अंत में एक पंक्ति का उत्तर।
Right working
दो वाक्य: पहला वाक्य उत्तर का मुख्य बिंदु, दूसरा वाक्य कविता से प्रमाण या कारण।
Do this: 2 अंक = 2 उत्तर-बिंदु = लगभग 2 वाक्य।
Usually costs: सीधे अंक भले न कटें, पर बिंदु अस्पष्ट होने से 1 अंक और समय दोनों जाते हैं।
सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस: previous year questions
- Course A: Asked in 1 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.3 marks per paper; 1 questions in all, counting OR alternatives. In 0 of 4 sample papers.
- Course B: Asked in 5 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 1.3 marks per paper; 5 questions in all, counting OR alternatives. In 1 of 4 sample papers.
Counted from the real papers on our previous year papers page, not estimated. Average marks are over every board paper we hold, with an OR pair counted once. Chapter tags are ours.
Solved board questions from सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस
Real questions from recent papers. Try each one first, then open our step-by-step solution with marks per step.
2026 Course B, set 4/2/1, Q8 · 6 marks · Very short answer
निर्धारित कविताओं के आधार पर निम्नलिखित चार प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर लगभग 25 – 30 शब्दों में लिखिए : 3×2=6
- (i)2 marks
'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता में कवि ने प्रकृति को मानवीय क्रियाकलाप करते हुए दिखाया है, प्रकृति के किन्हीं दो क्रियाकलापों का उल्लेख कीजिए।
- (ii)2 marks
'आत्मत्राण' कविता का कवि विपत्ति में ईश्वर से सहायता नहीं बल्कि विपत्ति का सामना करने की शक्ति माँग रहा है, इससे कवि के स्वभाव की किस विशेषता का पता चलता है ?
- (iii)2 marks
ईश्वर की सर्वव्यापकता का उल्लेख करने के लिए कबीर ने 'साखी' में क्या उदाहरण दिया है ? इसके माध्यम से कवि ने क्या स्पष्ट किया है ?
- (iv)2 marks
'कर चले हम फ़िदा' कविता के संदर्भ में सैनिक जीवन की कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए।
Try it first, then show our solutionSolution
- 2 marks
(i) पर्वतों का पुष्प-रूपी नेत्रों से ताल में अपना प्रतिबिंब निहारना; वृक्षों का आकाश को अपलक निहारना; झरनों का पर्वतों के यश का गान करना। (कोई दो)
- 2 marks
(ii) कवि स्वाभिमानी, आत्मविश्वासी और ईश्वर पर अटूट विश्वास रखने वाला है। वह भाग्यवादी नहीं, संघर्षशील है।
- 2 marks
(iii) कबीर ने हिरन की नाभि में कस्तूरी का उदाहरण दिया, जो वन में उसे खोजता फिरता है। इससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर कण-कण में और स्वयं हमारे भीतर है, पर अज्ञानवश हम उसे नहीं पहचानते।
- 2 marks
(iv) सैनिकों को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में स्वास्थ्य की चुनौतियाँ झेलनी पड़ती हैं, हर क्षण मृत्यु का सामना करना पड़ता है और बलिदान के बाद देश-रक्षा की चिंता रहती है। (कोई दो)
Answer: किन्हीं तीन उपभागों के उत्तर ऊपर दिए गए हैं
Where the marks are
- (i) दो क्रियाकलाप (2 अंक)
- (ii) स्वभाव की विशेषताएँ (2 अंक)
- (iii) उदाहरण और स्पष्टीकरण (1+1 अंक)
- (iv) दो कठिनाइयाँ (2 अंक)
2025 Course B, set 4/1/1, Q9 · 5 marks · MCQCompetency-based
निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त विकल्पों का चयन कीजिए : 5×1=5
पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,
पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।
मेखलाकार पर्वत अपार
अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार-बार
नीचे जल में निज महाकार,
– जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण-सा फैला है विशाल !
- (i)1 mark
'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' पंक्ति का अभिप्राय है :
- (A)प्रकृति अपनी वेशभूषा बार-बार बदल रही है
- (B)पर्वतों पर बादल बार-बार रूप बदल रहे हैं
- (C)प्रकृति का रूप सौंदर्य पल-पल नए रूप धारण कर रहा है
- (D)बादल बार-बार प्रकृति को नया रूप प्रदान कर रहे हैं
- (ii)1 mark
पर्वतों की आँखें किसे कहा गया है ?
- (A)दर्पण को
- (B)ताल को
- (C)पुष्पों को
- (D)मेखला को
- (iii)1 mark
ताल की समानता दर्पण से किस आधार पर की गई है ?
- (A)रूपाकार
- (B)चमक
- (C)पारदर्शिता
- (D)स्वच्छता
- (iv)1 mark
पर्वत ताल में क्या देख रहा है ?
- (A)आकाश का प्रतिबिंब
- (B)रंग-बिरंगे पुष्प
- (C)अपना विशाल आकार
- (D)बादलों का सौंदर्य
- (v)1 mark
प्रस्तुत काव्यांश में कवि ने किसका वर्णन किया है ?
- (A)वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश की अलौकिक सुषमा
- (B)वर्षा ऋतु में रंग-बिरंगे पुष्पों की सुंदरता
- (C)पर्वतीय प्रदेशों में पाई जाने वाली वनस्पति
- (D)पर्वतों की तलहटी में पलने वाले तालाब
Try it first, then show our solutionSolution
- 1 mark
(i) 'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' का अर्थ है कि प्रकृति का रूप-सौंदर्य हर क्षण नए रूप धारण कर रहा है। उत्तर: (C)।
- 1 mark
(ii) कवि ने पर्वत के 'सहस्र दृग-सुमन' कहे हैं, यानी पुष्पों को पर्वत की आँखें माना है। उत्तर: (C)।
- 1 mark
(iii) ताल दर्पण-सा स्वच्छ और निर्मल है, जिसमें पर्वत का प्रतिबिंब दिखता है। यहाँ उत्तर-योजना के अनुसार समानता का आधार पारदर्शिता है। उत्तर: (C)।
- 1 mark
(iv) पर्वत ताल के जल में अपना विशाल आकार (महाकार) देख रहा है। उत्तर: (C)।
- 1 mark
(v) काव्यांश में वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश की अलौकिक शोभा का वर्णन है। उत्तर: (A)।
Answer: (i) C; (ii) C; (iii) C; (iv) C; (v) A
Where the marks are
- (i) C (1 अंक)
- (ii) C (1 अंक)
- (iii) C (1 अंक)
- (iv) C (1 अंक)
- (v) A (1 अंक)
Every सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस question, by year
Practice questions on सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 2 marks · Short answerBoard level
कवि ने झरनों का वर्णन किन विशेषताओं के साथ किया है? लिखिए।
Hint
झरनों के रंग-रूप और उनकी ध्वनि, दोनों पर ध्यान दीजिए।
Answer
उत्तर-बिंदु: झाग भरे; मोती की लड़ियों-से सुंदर; झर-झर करते हुए गिरि का गौरव गाते हैं।
आदर्श उत्तर: कवि ने झरनों को झाग भरा और मोती की लड़ियों-सा सुंदर बताया है। वे झर-झर करते हुए मानो पर्वत के गौरव का गान कर रहे हैं।
Q2 · 2 marks · Short answerBoard level
ताल को पर्वत के 'चरणों में पला' क्यों कहा गया है?
Hint
ताल कहाँ फैला है और पर्वत को कवि किस रूप में देख रहा है?
Answer
उत्तर-बिंदु: ताल पर्वत के नीचे फैला है; पर्वत का मानवीकरण किया गया है; इसलिए नीचे फैले ताल को उसके चरणों में पला कहा।
आदर्श उत्तर: ताल पर्वत के ठीक नीचे, उसकी तलहटी में फैला है। कवि ने पर्वत का मानवीकरण किया है, इसलिए उसके नीचे फैले ताल को उसके चरणों में पला हुआ कहा है।
Q3 · 2 marks · Short answerHarder board level
कविता के अंतिम अंश से मानवीकरण अलंकार के दो उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
Hint
कौन डर रहा है और कौन पंख फड़का रहा है?
Answer
उत्तर-बिंदु: 'धँस गए धरा में सभय शाल'—शाल का डरना; 'उड़ गया... भूधर / फड़का अपार पारद के पर'—पर्वत का पंख फड़काकर उड़ना।
आदर्श उत्तर: 'धँस गए धरा में सभय शाल' में शाल के पेड़ मनुष्य की तरह डरकर धरती में धँसते दिखाए गए हैं। 'उड़ गया... भूधर' में पर्वत पंख फड़काकर उड़ता दिखाया गया है।
Q4 · 2 marks · Short answerHarder board level
'पाठ प्रवेश' में निराला ने पंत जी के किस कौशल की प्रशंसा की है? इस कविता से दो उपमाएँ देकर पुष्टि कीजिए।
Hint
'सा' और 'से' वाले शब्द खोजिए।
Answer
उत्तर-बिंदु: विषय को अनेक उपमाओं से सँवारकर मधुर और कोमल बनाना; ताल 'दर्पण-सा'; झरने 'मोती की लड़ियों-से'।
आदर्श उत्तर: निराला के अनुसार पंत अपने विषय को अनेक उपमाओं से सँवारकर मधुर और कोमल बना देते हैं। कविता में ताल 'दर्पण-सा' और झरने 'मोती की लड़ियों-से' कहे गए हैं।
Q5 · 2 marks · Short answerHarder board level
'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' की पुष्टि कविता के अंतिम अंश की घटनाओं से कीजिए।
Hint
'अचानक' शब्द के बाद एक-एक करके क्या-क्या बदलता है?
Answer
उत्तर-बिंदु: भूधर का उड़ता-सा लगना; निर्झरों का रव-शेष रहना; अंबर का भू पर टूट पड़ना; ताल से धुआँ उठना।
आदर्श उत्तर: अचानक पर्वत उड़ता-सा लगता है, झरनों की केवल आवाज़ रह जाती है, अंबर धरती पर टूट पड़ता है, ताल से धुआँ उठता है। दृश्य पल भर में बदल जाता है।
Q6 · 2 marks · Short answerHarder board level
'रव-शेष रह गए हैं निर्झर!' पंक्ति में दृश्य और ध्वनि का कैसा संबंध दिखाया गया है?
Hint
'रव' का अर्थ है आवाज़; क्या दिखना बंद हुआ और क्या बचा?
Answer
उत्तर-बिंदु: बादलों के कारण झरने आँखों से ओझल; उनके गिरने की आवाज़ बनी रहती है; दृश्य मिटा, ध्वनि बची।
आदर्श उत्तर: बादल छा जाने से झरने आँखों से ओझल हो गए हैं, पर उनके गिरने की आवाज़ अब भी सुनाई देती है। दृश्य मिट गया, केवल ध्वनि बची है।
Q7 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
मान लीजिए यह कविता ग्रीष्म ऋतु में लिखी जाती। तब इसके कौन-से दृश्य संभवतः नहीं होते? कारण सहित लिखिए।
Hint
कविता के अंतिम अंश के दृश्य किस चीज़ पर टिके हैं?
Answer
उत्तर-बिंदु: भूधर का उड़ना, अंबर का टूटना, ताल से धुआँ, इंद्र का जादू—ये बादलों और वर्षा से बने दृश्य हैं; ग्रीष्म में ये संभवतः न होते।
आदर्श उत्तर: तब पर्वत का उड़ता दिखना, अंबर का टूट पड़ना, ताल से धुआँ उठना और इंद्र का जादू शायद न दिखते, क्योंकि ये बादलों और वर्षा से बने दृश्य हैं।
Q8 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
मान लीजिए आपका मित्र कहता है कि यह कविता केवल प्रकृति का दृश्य-वर्णन है, इसमें कोई भाव नहीं। कविता के आधार पर आप उसे क्या उत्तर देंगे?
Hint
पर्वत, तरुवर और शाल—तीनों में कौन-से मानवीय भाव हैं?
Answer
उत्तर-बिंदु: पर्वत में आत्म-मुग्धता; तरुवरों में उच्चाकांक्षा और चिंता; शालों में भय; मानवीकरण से प्रकृति भावों से भरी।
आदर्श उत्तर: कविता केवल वर्णन नहीं है। पर्वत में आत्म-मुग्धता, वृक्षों में ऊँचा उठने की आकांक्षा और चिंता, शालों में भय दिखाकर कवि ने प्रकृति को भावों से भरा रूप दिया है।
Test your recall
Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.
1.'पावस' और 'प्रकृति-वेश' का अर्थ क्या है?Show answer
पावस = वर्षा ऋतु; प्रकृति-वेश = प्रकृति का रूप।
2.ताल में अपना महाकार कौन देख रहा है?Show answer
मेखलाकार पर्वत, अपने सहस्र दृग-सुमन (फूल रूपी आँखें) फाड़कर।
3.ताल की तुलना किससे की गई है?Show answer
दर्पण से: 'दर्पण-सा फैला है विशाल!'
4.झरने किसका गौरव गाते हैं और कैसे दिखते हैं?Show answer
गिरि (पर्वत) का गौरव गाते हैं; मोती की लड़ियों-से सुंदर और झाग भरे।
5.तरुवर किस भाव से नभ की ओर झाँक रहे हैं?Show answer
उच्चाकांक्षा (ऊँचा उठने की कामना) से; वे अनिमेष, अटल और कुछ चिंतापर हैं।
6.'पारद के पर' किसके हैं?Show answer
भूधर (पहाड़) के, जो पारे जैसे धवल-चमकीले पंख फड़काकर उड़ गया लगता है।
7.शाल के वृक्ष कैसे धरती में धँस गए?Show answer
सभय, अर्थात भय के साथ: 'धँस गए धरा में सभय शाल!'
8.कविता की अंतिम पंक्ति क्या है और 'इंद्रजाल' का अर्थ?Show answer
'था इंद्र खेलता इंद्रजाल।' इंद्रजाल = जादूगरी; इंद्र जलद-यान (बादल रूपी विमान) में घूमकर यह खेल खेल रहा था।
Quick revision checklist
The night before the exam: can you do each of these without looking?
- क्या आप बता सकते हैं कि 'मेखलाकार' और 'दृग-सुमन' का शब्दार्थ क्या है?
- क्या आप कविता के दृश्य क्रम से बोल सकते हैं: पर्वत-ताल, झरने, तरुवर, भूधर का उड़ना, अंबर टूटना, शाल, धुआँ, इंद्रजाल?
- क्या आप मानवीकरण के तीन उदाहरण बिना देखे दे सकते हैं (पर्वत देखता है, झरने गाते हैं, शाल डरते हैं)?
- क्या आप 'दर्पण-सा' और 'मोती की लड़ियों-से' को उपमा अलंकार के रूप में समझा सकते हैं?
- क्या आप 'रव-शेष रह गए हैं निर्झर' और 'जल गया ताल' का कल्पना वाला अर्थ 25-30 शब्दों में लिख सकते हैं?
- क्या आप बता सकते हैं कि तरुवर 'कुछ चिंतापर' क्यों दिखते हैं और इससे क्या सीख मिलती है?
- क्या आप निराला की पंत के बारे में कही बात (उपमाओं से सँवारना) याद कर सकते हैं?
- क्या आप कथन-कारण के चारों मानक विकल्प क्रम से लिख सकते हैं?
सुमित्रानंदन पंत – पर्वत प्रदेश में पावस: frequently asked questions
‘पर्वत प्रदेश में पावस’ कविता का केंद्रीय भाव क्या है?
कविता वर्षा ऋतु में पहाड़ी प्रदेश की प्रकृति के पल-पल बदलते रूप का वर्णन करती है। पर्वत, ताल, झरने और पेड़ मनुष्य की तरह भाव प्रकट करते हैं। अंत में अचानक बादल और वर्षा सब कुछ बदल देते हैं, जिसे कवि इंद्र का जादू कहता है।
‘मेखलाकार’ और ‘सहस्र दृग-सुमन’ का क्या अर्थ है?
NCERT के शब्दार्थ के अनुसार ‘मेखलाकार’ का अर्थ है करधनी के आकार की पहाड़ की ढाल। ‘सहस्र’ का अर्थ हज़ार और ‘दृग-सुमन’ का अर्थ पुष्प रूपी आँखें है। कवि ने पर्वत पर खिले हज़ारों फूलों को उसकी आँखें माना है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।
कवि ने ताल की तुलना दर्पण से क्यों की है?
ताल स्वच्छ, शांत और विशाल है। उसके जल में पर्वत का प्रतिबिंब वैसे ही दिखता है जैसे दर्पण में चेहरा दिखता है। इसलिए कवि ने ‘दर्पण-सा फैला है विशाल!’ कहा है, जो उपमा अलंकार है।
‘उड़ गया, अचानक लो, भूधर’ का आशय क्या है?
भूधर का अर्थ पहाड़ है। अचानक घने, चमकीले बादलों ने पर्वत को ढक लिया, जिससे वह दिखना बंद हो गया। कवि को लगा मानो पर्वत पारे जैसे चमकीले पंख फड़फड़ाकर उड़ गया हो। NCERT में अगली पंक्ति के ‘पारद’ शब्द के लिए पाठांतर ‘वारिद’ (बादल) भी दिया गया है।
शाल के पेड़ धरती में क्यों धँस गए और ताल क्यों जल गया?
यह कवि की कल्पना है। तेज़ वर्षा और बादलों के कारण शाल के पेड़ दिखने बंद हो गए, मानो डरकर धरती में धँस गए हों। ताल से उठता धुआँ जैसा कोहरा देखकर कवि को लगा मानो ताल में आग लग गई हो।
सुमित्रानंदन पंत के बारे में NCERT क्या बताती है?
पंत जी का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कौसानी-अलमोड़ा में हुआ और वे छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने गए। उनकी आरंभिक कविताओं में प्रकृति प्रेम और रहस्यवाद झलकता है। वे हिंदी के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता हुए और 1961 में पद्मभूषण से सम्मानित हुए। उनका निधन 28 दिसंबर 1977 को हुआ।
Based on: CBSE हिंदी पाठ्यक्रम-ब (085), कक्षा 10, 2026-27; NCERT स्पर्श भाग 2 (Reprint 2026-27), पर्वत प्रदेश में पावस