तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र Class 10: सारांश और विश्लेषण
Updated 14 October 2026 · Fact-checked
'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' प्रहलाद अग्रवाल का गद्य पाठ है, जो स्पर्श भाग 2 में है। इसमें कवि-गीतकार शैलेंद्र की एकमात्र फ़िल्म 'तीसरी कसम', उसकी कलात्मकता, असफलता और शैलेंद्र के आदर्शवादी व्यक्तित्व का वर्णन है। बोर्ड इस पाठ से पठित गद्यांश पर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न और 25-30 शब्दों के दो अंकीय प्रश्न पूछता है।
What प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र is about
'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' NCERT की पुस्तक स्पर्श भाग 2 के गद्य खंड का पाठ है। इसके लेखक प्रहलाद अग्रवाल हैं, जिन्हें किशोर वय से ही हिंदी फ़िल्मों और फ़िल्मकारों के बारे में जानने और लिखने का शौक रहा। यह पाठ बताता है कि कवि शैलेंद्र ने फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पर 'तीसरी कसम' जैसी सार्थक फ़िल्म बनाई, जो महान होते हुए भी व्यावसायिक रूप से नहीं चली।
बोर्ड परीक्षा में यह पाठ खंड ग (गद्य खंड) में आता है। प्रश्न 9 में इस पाठ का गद्यांश देकर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न पूछे जा सकते हैं, जिनमें कथन-कारण प्रश्न भी होता है। प्रश्न 10 में 25-30 शब्दों वाले दो-दो अंक के प्रश्न आते हैं, जिनमें विषयवस्तु, बोध और अभिव्यक्ति की जाँच होती है।
In real board papers: Course A, not asked in any of the 21 board papers we hold (2023 to 2026); Course B, asked in 5 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.6 marks per paper. See the questions
प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र: summary
In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.
'संगम' की बड़ी सफलता के बाद राजकपूर ने एक साथ चार फ़िल्मों की घोषणा की। 1965 में उन्होंने 'मेरा नाम जोकर' शुरू की, जिसके एक भाग को बनाने में छह साल लग गए। इसी बीच 1966 में कवि शैलेंद्र की फ़िल्म 'तीसरी कसम' आई, जिसमें राजकपूर ने अपने जीवन की सबसे अच्छी भूमिका निभाई।
यह शैलेंद्र की पहली और अंतिम फ़िल्म थी। इसे राष्ट्रपति स्वर्णपदक, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार और मास्को फ़िल्म फेस्टिवल में पुरस्कार मिला। लेखक इसे पर्दे पर लिखी कविता मानते हैं।
जब शैलेंद्र कहानी सुनाने राजकपूर के पास गए, तो राजकपूर ने गंभीर होकर एडवांस पारिश्रमिक माँगा। शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया। तब राजकपूर ने हँसकर केवल एक रुपया माँगा। राजकपूर ने सच्चे मित्र की तरह उन्हें फ़िल्म की असफलता के खतरों से सावधान भी किया, पर शैलेंद्र को धन और यश से अधिक आत्म-संतुष्टि चाहिए थी।
बड़े सितारों, शंकर-जयकिशन के संगीत और पहले से लोकप्रिय गीतों के बावजूद फ़िल्म को वितरक बड़ी मुश्किल से मिले। इसकी करुणा मुनाफ़ा गिनने वालों की समझ से बाहर थी। फ़िल्म का प्रचार नहीं हुआ और वह कब आई, कब गई, पता ही नहीं चला।
शैलेंद्र बीस साल फ़िल्म जगत में रहे, फिर भी उन्होंने अपनी आदमियत नहीं खोई। 'श्री 420' के गीत में 'दसों दिशाओं' शब्द पर जयकिशन ने आपत्ति की, पर शैलेंद्र नहीं बदले। उनका मानना था कि कलाकार को दर्शकों पर उथलापन नहीं थोपना चाहिए, बल्कि उनकी रुचि सुधारनी चाहिए। उनके गीत भावपूर्ण थे, कठिन नहीं।
लेखक के अनुसार 'तीसरी कसम' ने साहित्य के साथ पूरा न्याय किया। राजकपूर हीरामन बन गए और वहीदा रहमान हीराबाई। फ़िल्म में लोकगीत, गाड़ीवान और बच्चों की मस्ती तथा अभावों में जीते लोगों की खुशियाँ हैं। लेखक कहते हैं कि हमारी फ़िल्मों में लोक-तत्त्व नहीं होता और दुख को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है, जबकि यह फ़िल्म दुख को सहज, जीवन-सापेक्ष रूप में दिखाती है।
लेखक शैलेंद्र को गीतकार नहीं, कवि मानते हैं, क्योंकि उनके गीतों में करुणा के साथ जूझने का संदेश भी है। राजकपूर, जो उस समय एशिया के सबसे बड़े शोमैन थे, इस फ़िल्म में अभिनय नहीं करते, बल्कि हीरामन में ढल जाते हैं। अंत में बताया गया है कि फ़िल्म की पटकथा स्वयं रेणु ने लिखी थी, इसलिए कहानी की हर बारीकी फ़िल्म में उतर आई।
Themes and message
कला बनाम व्यापार
पाठ दिखाता है कि फ़िल्म जगत में सार्थक फ़िल्म बनाना जोखिम का काम है। 'तीसरी कसम' में बड़े सितारे, लोकप्रिय संगीत और गीत सब थे, फिर भी उसे खरीदने वाला नहीं मिला। कारण यह था कि वितरक केवल मुनाफ़ा देखते थे और फ़िल्म की करुणा को धन के तराज़ू पर नहीं तौला जा सकता था। इससे पता चलता है कि व्यावसायिक दुनिया अक्सर सच्ची कला की कद्र नहीं कर पाती। पाठ यह प्रश्न भी उठाता है कि सफलता को केवल कमाई से नापना कितना सही है।
From the text: फ़िल्म को बमुश्किल वितरक मिले; लेखक लिखते हैं कि इसकी संवेदना "दो से चार बनाने का गणित" जानने वाले की समझ से परे थी।
आदर्शवाद और आत्म-संतुष्टि
शैलेंद्र धन और यश के पीछे नहीं भागे। राजकपूर ने उन्हें असफलता के खतरे बताए, फिर भी उन्होंने फ़िल्म बनाई, क्योंकि उन्हें आत्म-संतुष्टि चाहिए थी। बीस साल फ़िल्म जगत में रहकर भी उन्होंने अपनी आदमियत नहीं खोई। यह विषय बताता है कि सच्चा कलाकार अपने मन की सच्चाई के लिए नुकसान भी सह लेता है। लेखक इसे शैलेंद्र की सबसे बड़ी विशेषता मानते हैं।
From the text: "वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था"; वे "यश और धन-लिप्सा से कोसों दूर थे"।
कलाकार का कर्तव्य: रुचि का परिष्कार
जयकिशन चाहते थे कि 'दस दिशाएँ' की जगह आसान 'चार दिशाएँ' हो, पर शैलेंद्र नहीं माने। उनका विचार था कि दर्शकों की पसंद के नाम पर उन्हें हल्की चीज़ें नहीं परोसनी चाहिए। कलाकार को दर्शकों की रुचि ऊँची करनी चाहिए। साथ ही शैलेंद्र ने झूठा दिखावा नहीं अपनाया; उनके गीत सरल थे पर गहरे थे। इससे पता चलता है कि अच्छी कला सरल और गहरी, दोनों हो सकती है।
From the text: "वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे"; "उनके गीत भाव-प्रवण थे—दुरूह नहीं।"
लोक-जीवन और सहज करुणा
लेखक के अनुसार हिंदी फ़िल्मों की सबसे बड़ी कमज़ोरी लोक-तत्त्व का अभाव है। वे जीवन से दूर होती हैं और दुख को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाकर दर्शकों की भावनाओं का शोषण करती हैं। 'तीसरी कसम' इससे अलग थी। उसमें गाड़ीवानों के गीत, बच्चों का हुजूम और अभावों में जीते लोगों के सपने थे। यह फ़िल्म दुख को भी सहज और जीवन से जुड़े रूप में दिखाती है।
From the text: "हमारी फ़िल्मों की सबसे बड़ी कमज़ोरी होती है, लोक-तत्त्व का अभाव।"
व्यथा से आगे बढ़ने का संदेश
लेखक शैलेंद्र को गीतकार नहीं, कवि कहते हैं। उनके गीतों में केवल करुणा नहीं, संघर्ष करने का संकेत और मंज़िल तक पहुँचने की राह भी है। उनके अनुसार दुख मनुष्य को हराता नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह सकारात्मक दृष्टि उनके जीवन में भी थी और गीतों में भी। इससे पता चलता है कि उनकी कला उनके व्यक्तित्व का ही प्रतिबिंब थी।
From the text: "व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।"
Characters
शैलेंद्र
पाठ के केंद्र में; कवि-गीतकार और 'तीसरी कसम' के निर्माता
- आदर्शवादी और भावुक कवि
- धन और यश से दूर, आत्म-संतुष्टि के इच्छुक
- अपने सिद्धांतों पर दृढ़
- सरल पर गहरे गीत लिखने वाले
- व्यावसायिक सूझबूझ से रहित
राजकपूर की चेतावनी के बाद भी फ़िल्म बनाई; 'दसों दिशाओं' को बदलने से मना किया; लेखक के अनुसार वे "फ़िल्म-निर्माता बनने के लिए सर्वथा अयोग्य थे"; उनके गीत "भाव-प्रवण थे—दुरूह नहीं"।
राजकपूर
शैलेंद्र के मित्र और 'तीसरी कसम' के नायक, जिन्होंने हीरामन की भूमिका निभाई
- सच्चे और विनोदी मित्र
- महान अभिनेता, आँखों से बात करने वाले कलाकार
- आत्मविश्वासी फ़िल्मकार
- पात्र में पूरी तरह डूब जाने वाले
केवल एक रुपया पारिश्रमिक लिया और मित्र की तरह असफलता के खतरे बताए; 'संगम' के बाद चार फ़िल्मों की घोषणा की; 'तीसरी कसम' में वे "खुद हीरामन में ढल गया है"।
हीरामन (फ़िल्म का पात्र)
'तीसरी कसम' का नायक, जिसे राजकपूर ने निभाया
- खालिस देहाती, भोला गाड़ीवान
- दिल की ज़ुबान समझने वाला
- प्रेम को ही सब कुछ मानने वाला
- छोटी-सी उपेक्षा से आहत होने वाला
लेखक उसे ऐसा गाड़ीवान बताते हैं "जो सिर्फ़ दिल की ज़ुबान समझता है, दिमाग की नहीं"; वह नौटंकी की बाई हीराबाई में अपनापन खोज लेता है।
जयकिशन
संगीतकार, जिन्होंने 'श्री 420' के गीत की पंक्ति पर आपत्ति की
- दर्शकों की समझ को लेकर व्यावहारिक
- आसान शब्दों के पक्षधर
- लोकप्रिय संगीतकार
उनका विचार था कि दर्शक 'चार दिशाएँ' समझ सकते हैं, 'दस दिशाएँ' नहीं; शंकर-जयकिशन की लोकप्रियता उन दिनों "सातवें आसमान पर" थी।
How it is written
| Device | Example | Effect |
|---|---|---|
| रूपक (फ़िल्म को कविता कहना) | 'तीसरी कसम' को फ़िल्म नहीं, "सैल्यूलाइड पर लिखी कविता" कहा गया है। | फ़िल्म की भावुकता, सूक्ष्मता और कलात्मकता एक वाक्य में उभर आती है; पाठक समझता है कि यह फ़िल्म कवि-हृदय की रचना है। |
| प्रसंग या संस्मरण (घटना द्वारा चरित्र-चित्रण) | राजकपूर का पहले एडवांस पारिश्रमिक माँगना और फिर हँसकर केवल एक रुपया लेना। | बिना लंबा वर्णन किए दोनों मित्रों का स्वभाव और उनकी गहरी दोस्ती जीवंत हो जाती है। |
| उपमा और बिंब | शैलेंद्र के गीतों को "शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराई" लिए हुए बताया गया है। | गीतों की सरलता (प्रवाह) और भावों की गहराई दोनों एक साथ स्पष्ट होती हैं। |
| मुहावरे और व्यंग्य | "दो से चार बनाने का गणित", "सातवें आसमान पर", "चक्कर खा जाते हैं"। | भाषा सजीव बनती है और मुनाफ़ाखोर वितरकों पर हल्का व्यंग्य भी होता है। |
| मिश्रित भाषा और विरोधाभासी तुलना | उर्दू-अंग्रेज़ी शब्द (शिद्दत, ग्लोरीफ़ाई, एडवांस) तथा महान फ़िल्म और उसकी व्यावसायिक असफलता की तुलना। | भाषा फ़िल्मी दुनिया के माहौल जैसी लगती है और कला व व्यापार का टकराव तीखेपन से सामने आता है। |
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म नहीं, सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी।
लेखक (कथावाचक): फ़िल्म की विशेषता बताते हुए, जब लेखक कहते हैं कि इसने साहित्य की मार्मिक कृति को पर्दे पर सार्थकता से उतारा।
यह पंक्ति फ़िल्म की कलात्मकता और भावुकता का सार है; इससे पता चलता है कि लेखक इसे साधारण मनोरंजन नहीं मानते।
निकालो एक रुपया, मेरा पारिश्रमिक! पूरा एडवांस।
राजकपूर: शैलेंद्र का मुरझाया चेहरा देखकर राजकपूर ने मुसकराते हुए यह कहा।
राजकपूर की याराना मस्ती, उदारता और सच्ची दोस्ती का प्रमाण।
उसमें रची-बसी करुणा तराज़ू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी।
लेखक (कथावाचक): फ़िल्म को खरीदार न मिलने का कारण बताते हुए।
कला की भावनात्मक कीमत और व्यापारिक सोच के अंतर को दिखाती है।
वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे
लेखक, शैलेंद्र के विचार के रूप में: 'दसों दिशाओं' पर जयकिशन की आपत्ति के बाद शैलेंद्र का दृढ़ मत।
कलाकार के कर्तव्य का सिद्धांत: दर्शकों की रुचि ऊँची करना, उथलापन न परोसना।
उनके गीत भाव-प्रवण थे—दुरूह नहीं।
लेखक (कथावाचक): शैलेंद्र के गीतों की विशेषता बताते हुए, कि उन्होंने झूठा अभिजात्य नहीं अपनाया।
शैलेंद्र के गीत भावों से भरे पर समझने में सरल थे; यह उनकी लोकप्रियता का कारण भी है।
हमारी फ़िल्मों की सबसे बड़ी कमज़ोरी होती है, लोक-तत्त्व का अभाव।
लेखक (कथावाचक): हिंदी फ़िल्मों की तुलना 'तीसरी कसम' से करते हुए।
लेखक की फ़िल्म-समीक्षा का मुख्य बिंदु; 'तीसरी कसम' इसी कमी से मुक्त थी।
व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।
लेखक (कथावाचक): शैलेंद्र को गीतकार नहीं, कवि कहने का कारण बताते हुए।
शैलेंद्र के गीतों का सकारात्मक संदेश: दुख में भी जूझने और आगे बढ़ने की प्रेरणा।
शैलेंद्र ने राजकपूर जैसे स्टार को ‘हीरामन’ बना दिया था।
लेखक (कथावाचक): फ़िल्म के साहित्य के साथ शत-प्रतिशत न्याय करने की बात कहते हुए।
दिखाता है कि पात्र सितारे पर हावी रहा; यह निर्देशक शैलेंद्र और अभिनेता राजकपूर दोनों की सफलता है।
प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र in real life
Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
कलाकार का कर्तव्य: रुचि का परिष्कार
मान लीजिए आप स्कूल पत्रिका की संपादक हैं। कुछ साथी कहते हैं कि केवल चुटकुले और फ़िल्मी गपशप छापो, क्योंकि 'बच्चे यही पढ़ते हैं'।
शैलेंद्र के विचार के आधार पर बताइए कि आपको क्या करना चाहिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- पाठ: दर्शकों की रुचि की आड़ में उथलापन नहीं थोपना चाहिए।
- कर्तव्य: पाठकों की रुचि का परिष्कार।
- उपाय: रोचक पर सार्थक सामग्री, जैसे सरल भाषा में अच्छी कहानियाँ और कविताएँ।
Answer: शैलेंद्र के अनुसार रुचि की आड़ में उथलापन नहीं थोपना चाहिए। मैं पत्रिका में रोचक पर सार्थक कहानियाँ और कविताएँ छापूँगी, ताकि पाठकों की रुचि निखरे।
Memory hook: चार नहीं, दसों दिशाएँ: पाठक को ऊँचा उठाओ, नीचे मत उतरो।
आत्म-संतुष्टि बनाम धन
कल्पना कीजिए कि आपके बड़े भाई को एक अच्छी नौकरी मिली है, पर वह गाँव के बच्चों के लिए पुस्तकालय खोलने का सपना पूरा करना चाहता है, जिसमें कमाई कम है।
शैलेंद्र के जीवन से उसके निर्णय पर विचार कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- पाठ: शैलेंद्र को धन और यश से अधिक आत्म-संतुष्टि चाहिए थी।
- जोखिम: 'तीसरी कसम' आर्थिक रूप से सफल नहीं हुई।
- निष्कर्ष: सार्थक काम का संतोष बड़ा है, पर जोखिम समझकर योजना बनानी चाहिए।
Answer: शैलेंद्र ने आत्म-संतुष्टि के लिए जोखिम उठाया। भाई का सपना भी सार्थक है, पर उसे राजकपूर की सलाह की तरह जोखिम समझकर ठोस योजना के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
Memory hook: शैलेंद्र का सौदा: रुपया कम, संतोष ज़्यादा।
सच्ची मित्रता
मान लीजिए आपका मित्र स्कूल के नाटक का निर्देशन कर रहा है और आपसे मुख्य भूमिका निभाने को कहता है, जबकि आपको किसी दूसरे नाटक में अधिक प्रशंसा मिल सकती थी।
राजकपूर और शैलेंद्र की मित्रता से आप क्या सीखते हैं?
Try it first, then show the solutionSolution
- पाठ: राजकपूर ने बिना पारिश्रमिक ('एक रुपया') काम किया।
- साथ ही: एक सच्चे मित्र की तरह असफलता के खतरों से आगाह भी किया।
- सीख: मित्र का साथ देना और ईमानदार सलाह देना।
Answer: राजकपूर ने शैलेंद्र का साथ बिना लाभ के दिया और खतरों से आगाह भी किया। मैं भी मित्र के नाटक में पूरे मन से काम करूँगा और ईमानदार सलाह दूँगा।
Memory hook: एक रुपया पारिश्रमिक, पूरा एडवांस: दोस्ती का हिसाब दिल से होता है।
Topics in this chapter
- शैलेंद्र का चरित्र-चित्रणComing soon
- तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र प्रश्न-उत्तरComing soon
- तीसरी कसम फ़िल्म और राजकपूर का अभिनयComing soon
- शैलेंद्र के गीतों की विशेषताएँ और संदेशComing soon
- तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र के आशयComing soon
How the board asks प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
The question patterns to expect, and the method that works for each.
| Question type | How it is asked | Method |
|---|---|---|
| पठित गद्यांश पर बहुविकल्पी प्रश्न (1×5) | पाठ का 120-150 शब्दों का अंश देकर पाँच प्रश्न: तथ्य, कारण, किसी पंक्ति का आशय, मुहावरे का अर्थ, और शैलेंद्र या राजकपूर के स्वभाव पर निष्कर्ष। | पहले पूरा गद्यांश ध्यान से पढ़ें। हर विकल्प को गद्यांश की पंक्ति से मिलाएँ। 'सर्वाधिक उपयुक्त' विकल्प वही है जो गद्यांश के भाव से पूरा मेल खाए, केवल आंशिक रूप से नहीं। |
| कथन-कारण प्रश्न | कथन (A) और कारण (R) देकर चार मानक विकल्प, जैसे शैलेंद्र के गीतों के संदेश या फ़िल्म की असफलता के कारण पर। | पहले कथन को पाठ से जाँचें, फिर कारण को। दोनों सही हों तो देखें कि कारण सचमुच कथन को समझाता है या नहीं। पाठ में न लिखे कारण को सही न मानें। |
| विचारों के संयोजन वाला प्रश्न | (i), (ii), (iii), (iv) में कुछ विशेषताएँ देकर पूछा जाता है कि कौन-सी सही हैं, जैसे शैलेंद्र के गीतों की विशेषताएँ। | हर कथन को अलग-अलग पाठ से जाँचें। ऐसे कथन पर ध्यान दें जो पाठ के उलटे अर्थ में लिखा हो, जैसे 'दुःख का वीभत्स रूप' शैलेंद्र के गीतों की विशेषता नहीं है। |
| 25-30 शब्दों के लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक) | कारण या व्याख्या माँगी जाती है, जैसे फ़िल्म को खरीदार क्यों नहीं मिले, राजकपूर का अभिनय कैसा था, कलाकार का कर्तव्य क्या है। | दो स्पष्ट उत्तर-बिंदु लिखें, पाठ के तथ्य के साथ। भूमिका न बाँधें। 25-30 शब्दों से अधिक न लिखें। |
| आशय स्पष्ट कीजिए | पाठ की कोई पंक्ति देकर उसका भाव पूछा जाता है, जैसे 'दो से चार बनाने का गणित' या 'करुणा तराज़ू पर तौली नहीं जा सकती'। | पहले संदर्भ बताएँ (किस बात पर कहा गया), फिर अपने शब्दों में अर्थ लिखें। मुहावरे का सीधा अर्थ और पाठ में उसका संकेत, दोनों दें। |
| मूल्यपरक या विश्लेषणात्मक प्रश्न (HOTS) | शैलेंद्र के निर्णय का मूल्यांकन, आज की फ़िल्मों से तुलना, या 'मान लीजिए' वाली स्थिति में शैलेंद्र के सिद्धांत को लागू करना। | अपनी राय दें, पर उसे पाठ के तथ्य से जोड़ें। एक बिंदु पाठ से और एक बिंदु अपने निष्कर्ष या जीवन से लिखें। |
Tricks to remember प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
पाठ के पड़ाव: 'संगम-जोकर-एक रुपया-वितरक-दस दिशाएँ-हीरामन-रेणु'
(1) संगम की सफलता, चार फ़िल्मों की घोषणा; (2) 'मेरा नाम जोकर' में छह वर्ष; (3) राजकपूर का एक रुपया पारिश्रमिक; (4) वितरक नहीं मिले; (5) 'दसों दिशाओं' पर शैलेंद्र की दृढ़ता; (6) राजकपूर हीरामन में ढले; (7) पटकथा रेणु ने लिखी।
Use it when: गद्यांश का प्रसंग और प्रश्न का संदर्भ जल्दी पहचानें।
पात्र और लोग
हीरामन = राजकपूर, हीराबाई = वहीदा रहमान, संगीत = शंकर-जयकिशन, गायक = मुकेश, कहानी और पटकथा = फणीश्वरनाथ रेणु, निर्माता और गीतकार = शैलेंद्र, लेखक = प्रहलाद अग्रवाल।
Use it when: बहुविकल्पी और एक-पंक्ति के प्रश्न।
प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र: extract-based questions
Read the extract, answer every part on paper, then open the answers.
Extract 1: खरीदार नहीं मिले
यह एक दुखद सत्य है कि इसे प्रदर्शित करने के लिए बमुश्किल वितरक मिले। बावजूद इसके कि ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे नामज़द सितारे थे, शंकर-जयकिशन का संगीत था, जिनकी लोकप्रियता उन दिनों सातवें आसमान पर थी
(1) · 1 mark · MCQ
गद्यांश में किस 'दुखद सत्य' की बात की गई है?
(क) फ़िल्म अधूरी रह गई
(ख) महान फ़िल्म होने पर भी इसे प्रदर्शित करने के लिए बमुश्किल वितरक मिले
(ग) फ़िल्म के गीत लोकप्रिय नहीं हुए
(घ) फ़िल्म में बड़े सितारे नहीं थे(2) · 1 mark · MCQ
'सातवें आसमान पर होना' मुहावरे का अर्थ है—
(क) बहुत ऊँचाई पर रहना
(ख) बहुत अधिक लोकप्रिय या प्रसन्न होना
(ग) आकाश में उड़ना
(घ) घमंड करना(3) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: लेखक आगे कहते हैं कि इस फ़िल्म की संवेदना 'दो से चार बनाने का गणित जानने वाले' की समझ से परे थी।) 'दो से चार बनाने का गणित जानने वाले' से लेखक का संकेत किनकी ओर है?
(क) गणित के अध्यापकों की ओर
(ख) केवल मुनाफ़ा कमाने की सोच रखने वाले व्यापारियों की ओर
(ग) दर्शकों की ओर
(घ) गीतकारों की ओर(4) · 1 mark · Assertion-reason
(संदर्भ: लेखक आगे बताते हैं कि फ़िल्म के गीत प्रदर्शन से पहले ही लोकप्रिय हो चुके थे, फिर भी उसे खरीदने वाला कोई नहीं था।) कथन (A): बड़े सितारों और लोकप्रिय संगीत के बावजूद 'तीसरी कसम' को खरीदार नहीं मिले।
कारण (R): फ़िल्म की संवेदना और करुणा मुनाफ़े का हिसाब लगाने वालों की समझ से परे थी।
(क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है
(ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, पर कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता
(ग) कथन (A) सही है, पर कारण (R) गलत है
(घ) कथन (A) गलत है, पर कारण (R) सही है(5) · 1 mark · MCQ
गद्यांश में फ़िल्म का संगीत किसने दिया था?
(क) मुकेश
(ख) शंकर-जयकिशन
(ग) शैलेंद्र
(घ) राजकपूर
Show the answersAnswers
- (ख) महान फ़िल्म होने पर भी इसे प्रदर्शित करने के लिए बमुश्किल वितरक मिले
- (ख) बहुत अधिक लोकप्रिय या प्रसन्न होना
- (ख) केवल मुनाफ़ा कमाने की सोच रखने वाले व्यापारियों की ओर
- (क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है
- (ख) शंकर-जयकिशन
Extract 2: 'दसों दिशाएँ' और कलाकार का कर्तव्य
उनका खयाल था कि दर्शक ‘चार दिशाएँ’ तो समझ सकते हैं—‘दस दिशाएँ’ नहीं। लेकिन शैलेंद्र परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हुए। उनका दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए।
(1) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: 'श्री 420' के एक गीत के अंतरे की पंक्ति—‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’—पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति की थी।) जयकिशन ने किस बात पर आपत्ति की?
(क) गीत के संगीत पर
(ख) 'दसों दिशाओं' शब्द पर, क्योंकि उनके अनुसार दर्शक केवल चार दिशाएँ समझते हैं
(ग) गीत की लंबाई पर
(घ) गायक के चुनाव पर(2) · 1 mark · MCQ
'मंतव्य' शब्द का अर्थ है—
(क) मत या विचार
(ख) मंत्र
(ग) यात्रा
(घ) संदेह(3) · 1 mark · MCQ
शैलेंद्र ने पंक्ति बदलने से क्यों मना किया?
(क) उन्हें जयकिशन पसंद नहीं थे
(ख) वे मानते थे कि दर्शकों की रुचि के नाम पर उथलापन नहीं थोपना चाहिए
(ग) गीत रिकॉर्ड हो चुका था
(घ) राजकपूर ने मना किया था(4) · 1 mark · MCQ
'उथलापन' का विलोम शब्द है—
(क) गहराई
(ख) ऊँचाई
(ग) चौड़ाई
(घ) लंबाई(5) · 1 mark · MCQ
इस प्रसंग से शैलेंद्र के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषता प्रकट होती है?
(क) समझौतावादी स्वभाव
(ख) कला के प्रति ईमानदारी और दृढ़ता
(ग) व्यापारिक चतुराई
(घ) जल्दबाज़ी
Show the answersAnswers
- (ख) 'दसों दिशाओं' शब्द पर, क्योंकि उनके अनुसार दर्शक केवल चार दिशाएँ समझते हैं
- (क) मत या विचार
- (ख) वे मानते थे कि दर्शकों की रुचि के नाम पर उथलापन नहीं थोपना चाहिए
- (क) गहराई
- (ख) कला के प्रति ईमानदारी और दृढ़ता
प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र: board-level solved questions
Ordered from board level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.
Example 1: 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' · 2 marks · Short answerBoard level
'तीसरी कसम' फ़िल्म को 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' क्यों कहा गया है?
Try it first, then show the solutionSolution
- सैल्यूलाइड: फ़िल्म की रील।
- कारण: कवि शैलेंद्र की संवेदनशीलता; रेणु की मार्मिक कहानी को पूरी सार्थकता से उतारा।
- प्रभाव: कविता जैसी कोमलता, करुणा और भाव।
Answer: कवि शैलेंद्र ने रेणु की मार्मिक कहानी को कविता जैसी संवेदनशीलता से फ़िल्म की रील पर उतारा। उसमें करुणा और कोमल भाव थे; इसलिए यह सैल्यूलाइड पर लिखी कविता है।
Example 2: राजकपूर का 'एक रुपया' पारिश्रमिक · 2 marks · Short answerHarder board level
राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया और फिर राजकपूर ने क्या कहा?
Try it first, then show the solutionSolution
- पहली बात: 'मेरा पारिश्रमिक एडवांस देना होगा'।
- प्रतिक्रिया: शैलेंद्र को दोस्ती से ऐसी उम्मीद नहीं थी; चेहरा मुरझाया।
- फिर: 'निकालो एक रुपया, मेरा पारिश्रमिक! पूरा एडवांस'; याराना मस्ती।
Answer: राजकपूर ने गंभीरता से पारिश्रमिक एडवांस माँगा तो शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया। फिर राजकपूर ने मुसकराकर कहा, 'निकालो एक रुपया, मेरा पारिश्रमिक! पूरा एडवांस।'
Example 3: शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य · 2 marks · Short answerHarder board level
शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है?
Try it first, then show the solutionSolution
- दर्शकों की रुचि की आड़ में उथलापन न थोपना।
- उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करना।
- उदाहरण: 'दसों दिशाओं' वाली पंक्ति नहीं बदली।
Answer: शैलेंद्र के अनुसार कलाकार को दर्शकों की रुचि के नाम पर उथलापन नहीं थोपना चाहिए, बल्कि उनकी रुचि का परिष्कार करना चाहिए। इसीलिए उन्होंने 'दसों दिशाओं' वाली पंक्ति नहीं बदली।
Example 4: त्रासद स्थितियों का ग्लोरीफ़िकेशन · 2 marks · Short answerHarder board level
फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरीफ़ाई क्यों कर दिया जाता है? 'तीसरी कसम' इससे अलग कैसे है?
Try it first, then show the solutionSolution
- कारण: दर्शकों का भावनात्मक शोषण कर फ़िल्म चलाना।
- तरीका: दुख का वीभत्स, बढ़ा-चढ़ाकर रूप।
- 'तीसरी कसम': दुख को सहज, जीवन-सापेक्ष रूप में दिखाया।
Answer: निर्माता दर्शकों का भावनात्मक शोषण करके फ़िल्म चलाने के लिए दुख को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं। 'तीसरी कसम' ने दुख को भी सहज और जीवन के अनुरूप रूप में प्रस्तुत किया।
Example 5: राजकपूर का हीरामन बन जाना · 2 marks · Short answerHOTS / competency
'तीसरी कसम' में राजकपूर अभिनय नहीं करता, हीरामन में ढल गया है। इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- राजकपूर: एशिया के सबसे बड़े शोमैन, किंवदंती व्यक्तित्व।
- फ़िल्म में: सरल देहाती गाड़ीवान, जो दिल की ज़ुबान समझता है।
- आशय: स्टार की छवि पूरी तरह पात्र की आत्मा में विलीन।
Answer: एशिया के सबसे बड़े शोमैन होकर भी राजकपूर ने अपनी स्टार छवि छोड़ दी। वे देहाती गाड़ीवान हीरामन की आत्मा में ऐसे उतरे कि अभिनय नहीं, जीवन लगने लगा।
Example 6: असफलता के डर के बावजूद फ़िल्म बनाना · 2 marks · Short answerHOTS / competency
राजकपूर द्वारा असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फ़िल्म क्यों बनाई? आज के युवाओं के लिए इसमें क्या सीख है?
Try it first, then show the solutionSolution
- शैलेंद्र: आदर्शवादी भावुक कवि; धन और यश से अधिक आत्म-संतुष्टि की अभिलाषा।
- निर्णय: लाभ नहीं, कला के प्रति निष्ठा।
- सीख: मन का सार्थक काम जोखिम के बावजूद करना।
Answer: शैलेंद्र आदर्शवादी भावुक कवि थे, जिन्हें धन और यश से अधिक आत्म-संतुष्टि चाहिए थी। युवाओं के लिए सीख है कि सार्थक काम केवल लाभ-हानि देखकर नहीं छोड़ना चाहिए।
Where the marks are
How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.
'तीसरी कसम' फ़िल्म को खरीदार क्यों नहीं मिल रहे थे? (25-30 शब्द) (2 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| विरोधाभास: बड़े सितारे और लोकप्रिय संगीत होने पर भी | 1 |
| कारण: फ़िल्म की संवेदना और करुणा मुनाफ़े का हिसाब लगाने वालों की समझ से परे थी | 1 |
पठित गद्यांश (तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र) पर आधारित पाँच बहुविकल्पी प्रश्न, जिनमें एक कथन-कारण प्रश्न शामिल है (5 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| तथ्य (व्यक्ति, फ़िल्म, पुरस्कार) | 1 |
| मुहावरे या शब्द का अर्थ | 1 |
| कथन का आशय | 1 |
| कथन-कारण | 1 |
| व्यक्तित्व की विशेषता | 1 |
Where students lose marks in प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: 'तीसरी कसम' का निर्माता राजकपूर को लिख देना
फ़िल्म कवि शैलेंद्र ने बनाई थी; राजकपूर अभिनेता थे।
Wrong working
राजकपूर ने 'तीसरी कसम' का निर्माण किया।
Right working
शैलेंद्र ने 'तीसरी कसम' का निर्माण किया; राजकपूर ने उसमें हीरामन का अभिनय किया।
Do this: निर्माता, अभिनेता, संगीतकार, लेखक की सूची याद रखें।
Usually costs: 1 अंक
Mistake: 'दो से चार बनाना' को गणित का अर्थ देना
यह मुहावरा मुनाफ़ा कमाने की व्यापारिक सोच के लिए है।
Do this: मुहावरे का लाक्षणिक अर्थ लिखें।
Usually costs: 1 अंक
Mistake: जयकिशन की आपत्ति को शैलेंद्र की आपत्ति लिख देना
आपत्ति संगीतकार जयकिशन की थी; शैलेंद्र ने पंक्ति बदलने से मना किया।
Do this: किसने क्या कहा, यह स्पष्ट रखें।
Usually costs: 1 अंक
Mistake: 'सैल्यूलाइड' का अर्थ न जानना
सैल्यूलाइड फ़िल्म की रील है; बिना इसके 'कविता' वाला उत्तर अधूरा रहता है।
Do this: उत्तर में पहले शब्द का अर्थ, फिर कारण लिखें।
Usually costs: आधा से 1 अंक
प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र: previous year questions
- Course A: Not asked in any of the 21 board papers we hold (2023 to 2026).
- Course B: Asked in 5 of the 21 board papers we hold (2023 to 2026), on average 0.6 marks per paper; 5 questions in all, counting OR alternatives. In 1 of 4 sample papers.
Counted from the real papers on our previous year papers page, not estimated. Average marks are over every board paper we hold, with an OR pair counted once. Chapter tags are ours.
Solved board questions from प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
Real questions from recent papers. Try each one first, then open our step-by-step solution with marks per step.
2024 Course B, set 4/2/1, Q10 · 2 marks · MCQ
गद्य खंड पर आधारित निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर देने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए :
- (i)1 mark
'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए कि फिल्मों में त्रासद स्थितियों की भी प्रशंसा (ग्लोरीफाई) क्यों की जाती है ?
- (A)अधिक से अधिक धन कमाने हेतु
- (B)दर्शकों का मनोरंजन करने हेतु
- (C)अधिकाधिक लोकप्रियता पाने हेतु
- (D)दर्शकों का भावात्मक शोषण करने हेतु
- (ii)1 mark
'बड़े भाई साहब' पाठ के कथानायक के आँसू बहाने का कारण है –
- (A)आगे की कक्षा की कठिन पढ़ाई का डर
- (B)बड़े भाई साहब की डाँट-फटकार
- (C)अम्मा-बाबा की याद आना
- (D)अध्यापकों की डाँट-फटकार
Try it first, then show our solutionSolution
- 1 mark
(i) पाठ के अनुसार त्रासद स्थितियों का महिमामंडन दर्शकों का भावनात्मक शोषण करने के लिए किया जाता है। उत्तर: (D)।
- 1 mark
(ii) कथानायक बड़े भाई साहब की डाँट-फटकार से आँसू बहाता है। उत्तर: (B)।
Answer: (i) D; (ii) B
Where the marks are
- (i) सही विकल्प (1 अंक)
- (ii) सही विकल्प (1 अंक)
2023 Course B, set 4/4/1, Q9 · 5 marks · Reading comprehensionCompetency-based
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर के लिए सर्वाधिक उचित विकल्प चुनकर लिखिए :
राज कपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र की हैसियत से शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह भी किया। पर वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी, जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी। 'तीसरी कसम' कितनी ही महान् फ़िल्म क्यों न रही हो, लेकिन यह एक दुःखद सत्य है कि इसे प्रदर्शित करने के लिए बमुश्किल वितरक मिले। बावजूद इसके कि 'तीसरी कसम' में राज कपूर और वहीदा रहमान जैसे नामजद सितारे थे, शंकर-जयकिशन का संगीत था, जिसकी लोकप्रियता उन दिनों सातवें आसमान पर थी और इसके गीत भी फ़िल्म के प्रदर्शन के पूर्व ही बेहद लोकप्रिय हो चुके थे, लेकिन इस फ़िल्म को खरीदने वाला कोई नहीं था। दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने का गणित जानने वाले की समझ से परे थी। उसमें रची-बसी करुणा तराज़ू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी।
- (i)1 mark
राज कपूर ने शैलेंद्र को किस बात से आगाह किया था ?
- (a)फ़िल्म का किसी को समझ न आने वाली बात से।
- (b)फ़िल्म से कोई आर्थिक लाभ न मिलने वाली बात से।
- (c)फ़िल्म निर्माण में होने वाली परेशानियों से ।
- (d)फ़िल्म की संभावित असफलता के खतरों से ।
- (ii)1 mark
शैलेंद्र को किस प्रकार का व्यक्ति माना जा सकता है ?
- (a)कुशल फ़िल्म निर्माता
- (b)प्रसिद्ध गीतकार
- (c)आदर्शवादी भावुक कवि
- (d)आत्म-संतुष्ट व्यक्ति
- (iii)1 mark
'तीसरी कसम' फ़िल्म का दुःखद सत्य क्या था ?
- (a)फ़िल्म के लिए खरीददार का न मिलना।
- (b)लोगों का फ़िल्म को न समझ पाना।
- (c)फ़िल्म का रूपहले पर्दे पर न पहुँच पाना।
- (d)फ़िल्म को प्रसिद्धि न मिल पाना।
- (iv)1 mark
गद्यांश में आई पंक्ति – 'दो से चार बनाने का गणित' – का अर्थ है :
- (a)अधिक से अधिक धन कमाना।
- (b)संख्याओं को जोड़ने का हिसाब।
- (c)अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना।
- (d)संख्याओं को गुणा करने का हिसाब।
- (v)1 mark
"उसमें रची-बसी करुणा तराज़ू पर तौली जा सकने वाली चीज़ नहीं थी।" - पंक्ति का आशय है :
- (a)यह करुणा अनुभूति का विषय थी, नाप-तोल का नहीं।
- (b)यह करुणा बुद्धि का विषय थी, नाप-तोल का नहीं।
- (c)यह करुणा हृदय का विषय थी, नाप-तोल का नहीं।
- (d)यह करुणा भावना का विषय थी, नाप-तोल का नहीं।
Try it first, then show our solutionSolution
- 1 mark
(i) राज कपूर ने फ़िल्म की संभावित असफलता के खतरों से आगाह किया। (d)
- 1 mark
(ii) शैलेंद्र आदर्शवादी भावुक कवि थे। (c)
- 1 mark
(iii) दुखद सत्य यह कि फ़िल्म के लिए खरीददार/वितरक नहीं मिले। (a)
- 1 mark
(iv) 'दो से चार बनाना' = अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना। (c)
- 1 mark
(v) करुणा अनुभूति का विषय थी, नाप-तोल का नहीं। (a)
Answer: (i) d; (ii) c; (iii) a; (iv) c; (v) a
Where the marks are
- (i) (d) (1 अंक)
- (ii) (c) (1 अंक)
- (iii) (a) (1 अंक)
- (iv) (c) (1 अंक)
- (v) (a) (1 अंक)
Every प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र question, by year
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Practice questions on प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 2 marks · Short answerBoard level
'तीसरी कसम' फ़िल्म को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
Hint
राष्ट्रपति, बंगाल और मास्को।
Answer
उत्तर-बिंदु: राष्ट्रपति स्वर्णपदक; बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म; मास्को फ़िल्म फेस्टिवल में पुरस्कार।
आदर्श उत्तर: 'तीसरी कसम' को राष्ट्रपति स्वर्णपदक मिला। बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुना और मास्को फ़िल्म फेस्टिवल में भी यह पुरस्कृत हुई।
Q2 · 2 marks · Short answerBoard level
'तीसरी कसम' के नायक-नायिका कौन थे और उन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया?
Hint
गाड़ीवान और नौटंकी की बाई।
Answer
उत्तर-बिंदु: राजकपूर: हीरामन (गाड़ीवान); वहीदा रहमान: हीराबाई (नौटंकी की बाई)।
आदर्श उत्तर: फ़िल्म के नायक राजकपूर थे, जिन्होंने गाड़ीवान हीरामन का अभिनय किया। नायिका वहीदा रहमान थीं, जिन्होंने नौटंकी कलाकार हीराबाई की भूमिका निभाई और अपनी आँखों से भाव प्रकट किए।
Q3 · 2 marks · Short answerHarder board level
'शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं' — इस कथन से आप क्या समझते हैं?
Hint
गीतकार और अभिनेता का संबंध।
Answer
उत्तर-बिंदु: राजकपूर जो भाव अभिनय से दिखाना चाहते, शैलेंद्र उन्हें गीतों में शब्द देते; दोनों की गहरी समझ और मित्रता।
आदर्श उत्तर: राजकपूर जो भाव अपने अभिनय से प्रकट करना चाहते थे, शैलेंद्र उन्हें अपने गीतों के शब्दों में ढाल देते थे। यह दोनों की गहरी आपसी समझ को दिखाता है।
Q4 · 2 marks · Short answerHarder board level
लेखक ने राजकपूर को 'एशिया का सबसे बड़ा शोमैन' कहा है। 'शोमैन' से आप क्या समझते हैं?
Hint
प्रदर्शन, लोकप्रियता और आकर्षण।
Answer
उत्तर-बिंदु: शोमैन: अपनी कला और प्रस्तुति से बड़े जनसमूह को आकर्षित करने वाला लोकप्रिय कलाकार; राजकपूर का व्यक्तित्व किंवदंती बन चुका था।
आदर्श उत्तर: शोमैन वह कलाकार है जो अपनी प्रस्तुति और आकर्षण से बहुत बड़े जनसमूह का मनोरंजन करे। राजकपूर ऐसे ही लोकप्रिय कलाकार थे, जिनका व्यक्तित्व किंवदंती बन चुका था।
Q5 · 2 marks · Short answerHarder board level
शैलेंद्र के गीतों की दो विशेषताएँ लिखिए।
Hint
भाव-प्रवण, दुरूह नहीं; करुणा के साथ जूझने का संकेत।
Answer
उत्तर-बिंदु: भाव-प्रवण पर दुरूह नहीं; झूठा अभिजात्य नहीं; करुणा के साथ जूझने का संकेत; शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराई।
आदर्श उत्तर: शैलेंद्र के गीत भाव-प्रवण थे, पर दुरूह नहीं। उनमें केवल करुणा नहीं, जूझने का संकेत भी था; शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराई दोनों।
Q6 · 2 marks · Short answerHarder board level
'तीसरी कसम' ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है। लेखक ने ऐसा क्यों कहा?
Hint
पटकथा किसने लिखी?
Answer
उत्तर-बिंदु: पटकथा मूल कहानी के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने स्वयं लिखी; कहानी की हर बारीकी फ़िल्म में उतरी; पात्र स्टार पर हावी रहे।
आदर्श उत्तर: फ़िल्म की पटकथा मूल लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने स्वयं लिखी थी। कहानी का रेशा-रेशा फ़िल्म में उतर आया और पात्र बड़े सितारों पर भी हावी रहे।
Q7 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
'व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।' इस कथन का आशय एक उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
Hint
दुख से हार मानना और दुख से सीखना।
Answer
उत्तर-बिंदु: दुख हार नहीं, सीख है; शैलेंद्र के गीतों में करुणा के साथ जूझने का संकेत; उदाहरण: परीक्षा में असफल होकर दोबारा तैयारी।
आदर्श उत्तर: दुख व्यक्ति को तोड़ता नहीं, आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जैसे परीक्षा में असफल विद्यार्थी अपनी कमियाँ पहचानकर दोबारा अधिक लगन से तैयारी करता है।
Q8 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
आज की कई फ़िल्में केवल कमाई के लिए बनती हैं। 'तीसरी कसम' के उदाहरण से बताइए कि सार्थक फ़िल्म बनाना जोखिम का काम क्यों है।
Hint
वितरक, प्रचार और 'दो से चार' का गणित।
Answer
उत्तर-बिंदु: वितरक मुनाफ़ा देखते हैं; सार्थक फ़िल्म की करुणा तराज़ू पर नहीं तुलती; 'तीसरी कसम' को वितरक और प्रचार नहीं मिले; निर्माता को आर्थिक हानि का जोखिम।
आदर्श उत्तर: वितरक केवल मुनाफ़ा देखते हैं, जबकि सार्थक फ़िल्म की करुणा तौली नहीं जा सकती। 'तीसरी कसम' को न खरीदार मिले, न प्रचार; इसलिए ऐसी फ़िल्म बनाना जोखिम है।
Test your recall
Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.
1.'तीसरी कसम' किस वर्ष प्रदर्शित हुई?Show answer
सन् 1966 में।
2.शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाईं?Show answer
केवल एक, 'तीसरी कसम' (जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म)।
3.'मेरा नाम जोकर' का एक भाग बनाने में कितना समय लगा?Show answer
छह वर्ष।
4.'तीसरी कसम' की पटकथा किसने लिखी?Show answer
मूल कहानी के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने।
5.समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?Show answer
आँखों से बात करने वाला कलाकार।
Quick revision checklist
The night before the exam: can you do each of these without looking?
- क्या आप 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' का आशय 25-30 शब्दों में लिख सकते हैं?
- क्या आप बता सकते हैं कि फ़िल्म को वितरक क्यों नहीं मिले?
- क्या आप 'दसों दिशाओं' वाले प्रसंग से शैलेंद्र का दृष्टिकोण समझा सकते हैं?
- क्या आप शैलेंद्र के गीतों की तीन विशेषताएँ गिना सकते हैं?
- क्या आप बता सकते हैं कि राजकपूर हीरामन में कैसे ढल गए?
प्रहलाद अग्रवाल – तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र: frequently asked questions
'तीसरी कसम' फ़िल्म किस कहानी पर आधारित है?
यह फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कृति 'तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम' पर आधारित है। इसकी पटकथा भी स्वयं रेणु ने तैयार की थी, इसलिए कहानी की हर बारीकी फ़िल्म में उतर आई।
'तीसरी कसम' को सैल्यूलाइड पर लिखी कविता क्यों कहा गया?
क्योंकि इसमें कविता जैसी कोमल भावनाएँ, करुणा और सूक्ष्मता थी। इसने साहित्य की एक मार्मिक कृति को पूरी सार्थकता से पर्दे पर उतारा। लेखक के अनुसार ऐसी फ़िल्म सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।
महान होते हुए भी 'तीसरी कसम' क्यों नहीं चली?
इसे बड़ी मुश्किल से वितरक मिले, क्योंकि इसकी संवेदना मुनाफ़ा गिनने वालों की समझ से परे थी। इसलिए जब यह रिलीज़ हुई तो इसका प्रचार नहीं हुआ और फ़िल्म कब आई, कब गई, पता ही नहीं चला।
लेखक शैलेंद्र को गीतकार नहीं, कवि क्यों कहते हैं?
क्योंकि शैलेंद्र सिनेमा की चकाचौंध में रहकर भी धन और यश के लालच से दूर थे। उनके गीतों में करुणा के साथ जूझने और आगे बढ़ने का संदेश भी था। जो सच्चाई उनके जीवन में थी, वही उनके गीतों में थी।
राजकपूर ने 'तीसरी कसम' के लिए कितना पारिश्रमिक लिया?
राजकपूर ने पहले गंभीर होकर एडवांस पारिश्रमिक माँगा, जिससे शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया। फिर मुसकराकर उन्होंने केवल एक रुपया लिया। यह उनकी याराना मस्ती और सच्ची दोस्ती को दिखाता है।
'दस दिशाओं' वाली पंक्ति पर क्या विवाद हुआ था?
'श्री 420' के गीत की पंक्ति में 'दसों दिशाओं' पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति की, क्योंकि उनके अनुसार दर्शक 'चार दिशाएँ' ही समझते हैं। शैलेंद्र ने बदलाव नहीं किया, क्योंकि वे मानते थे कि कलाकार को दर्शकों की रुचि का परिष्कार करना चाहिए।
Based on: CBSE हिंदी पाठ्यक्रम-ब (085), कक्षा 10, 2026-27; NCERT स्पर्श भाग 2 (Reprint 2026-27), तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र