आओ, मिलकर बचाएँ (निर्मला पुतुल): Class 11 भावार्थ और प्रश्न
Updated 15 October 2026 · Fact-checked
'आओ, मिलकर बचाएँ' निर्मला पुतुल की कविता है, जिसका संथाली से हिंदी रूपांतर अशोक सिंह ने किया है। कवयित्री संथाल परगना की बस्तियों को शहरी प्रभाव और हड़िया (नशे) से बचाने, अपनी माटी, भाषा, जुझारूपन, जंगल, नदियाँ, पहाड़ और गीत बचाने का आह्वान करती हैं। अंत में कहती हैं कि बचाने को अब भी बहुत कुछ बचा है।
What निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ is about
निर्मला पुतुल झारखंड के दुमका के एक आदिवासी (संथाल) परिवार से हैं। उनकी कविताएँ आदिवासी समाज के दोनों पक्ष बेबाकी से सामने रखती हैं: सादगी, भोलापन, प्रकृति से जुड़ाव और कठोर परिश्रम, साथ ही अशिक्षा, कुरीतियाँ और शराब की ओर बढ़ता झुकाव। आओ, मिलकर बचाएँ कविता का संथाली से हिंदी रूपांतर अशोक सिंह ने किया है।
कविता का मूल स्वर है कि प्रकृति के विनाश और विस्थापन के कारण आज आदिवासी समाज संकट में है। बड़े संदर्भ में यह उन सब चीज़ों को बचाने की बात करती है, जो स्वस्थ सामाजिक और प्राकृतिक परिवेश के लिए ज़रूरी हैं।
कविता में क्या-क्या बचाना है:
- बस्तियों को शहरी आबो-हवा और हड़िया (नशे) में डूबने से
- पहचान: माटी का रंग, भाषा का झारखंडीपन
- स्वभाव: जीवन की गर्माहट, मन का हरापन, भोलापन, अक्खड़पन, जुझारूपन, भीतर की आग
- प्रकृति: जंगल की हवा, नदियों की निर्मलता, पहाड़ों का मौन, मिट्टी का सोंधापन, फसलें
- जीवन के छोटे सुख: आँगन, गीत, हँसी, एकांत, मैदान, घास, शांति
- विश्वास, उम्मीद और सपने
कक्षा 11 की वार्षिक परीक्षा में काव्य खंड से पठित काव्यांश पर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न, लगभग 40 शब्दों के (2 अंक) और लगभग 60 शब्दों के (3 अंक) प्रश्न आते हैं।
Weightage: खंड ग (आरोह भाग 1 एवं वितान भाग 1) के 80 में से 40 अंक हैं; काव्य खंड से पठित काव्यांश पर पाँच बहुविकल्पी प्रश्न (1×5), तीन में से दो प्रश्न लगभग 60 शब्दों में (3×2) और तीन में से दो प्रश्न लगभग 40 शब्दों में (2×2) आते हैं।Source: CBSE हिंदी (आधार) 302 पाठ्यक्रम 2026-27, कक्षा 11 परीक्षा हेतु पाठ्यक्रम विनिर्देशन
निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ: explanation
In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.
कवयित्री सबको मिलकर अपनी बस्तियों को बचाने का आह्वान करती हैं। वे चाहती हैं कि बस्तियाँ 'नंगी' न हों, यानी उनकी प्राकृतिक हरियाली और सांस्कृतिक पहचान न छिने; शहर की आबो-हवा (उपभोक्तावाद, दिखावा, प्रदूषण और बाहरी प्रभाव) से वे बची रहें; और पूरी बस्ती हड़िया (चावल से बनी देसी शराब) के नशे में न डूबे।
वे अपनी पहचान बचाना चाहती हैं: चेहरे पर संथाल परगना की माटी का रंग और भाषा में झारखंडीपन। ठंडी (उत्साहहीन) होती दिनचर्या में जीवन की गर्माहट, मन का हरापन, दिल का भोलापन, और साथ ही अक्खड़पन और जुझारूपन भी बचे रहें, ताकि लोग अन्याय के आगे झुकें नहीं। भीतर की आग, धनुष की डोरी, तीर का नुकीलापन और कुल्हाड़ी की धार, यानी आत्मरक्षा और संघर्ष की क्षमता भी बचनी चाहिए।
प्रकृति के प्रति कवयित्री की चिंता गहरी है: जंगल की ताज़ा हवा, नदियों की निर्मलता, पहाड़ों का मौन, गीतों की धुन, मिट्टी की सोंधी गंध और फसलों की लहलहाहट बची रहे। वे जीवन के सहज सुखों को भी बचाना चाहती हैं: नाचने के लिए खुला आँगन, गाने के लिए गीत, हँसने के लिए थोड़ी खिलखिलाहट, रोने के लिए थोड़ा एकांत, बच्चों के लिए मैदान, पशुओं के लिए हरी घास और बूढ़ों के लिए पहाड़ों की शांति।
अंत में वे कहती हैं कि इस अविश्वास-भरे समय में थोड़ा विश्वास, थोड़ी उम्मीद और थोड़े सपने बचाने हैं। निराशा के बीच भी कविता आशा के साथ समाप्त होती है: इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है, अब भी हमारे पास।
Themes and message
आदिवासी संस्कृति और पहचान की रक्षा
माटी का रंग, भाषा का झारखंडीपन, गीत और नाच, ये सब संथाल समाज की पहचान हैं, जिन्हें शहरी प्रभाव मिटा रहा है।
From the text: 'भाषा में झारखंडीपन'
प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण
जंगल, नदियाँ, पहाड़ और मिट्टी आदिवासी जीवन का आधार हैं; उनका विनाश समाज का विनाश है।
From the text: 'जंगल की ताज़ा हवा / नदियों की निर्मलता / पहाड़ों का मौन'
समाज की कमियों की बेबाक स्वीकृति
कवयित्री केवल बाहरी खतरों की नहीं, भीतर की बुराई (हड़िया का नशा) की भी बात करती हैं।
From the text: 'बचाएँ डूबने से / पूरी की पूरी बस्ती को / हड़िया में'
संघर्षशीलता और स्वाभिमान
भोलेपन के साथ अक्खड़पन, जुझारूपन और भीतर की आग भी ज़रूरी है, ताकि शोषण का विरोध हो सके।
From the text: 'अक्खड़पन, जुझारूपन भी / भीतर की आग'
सामूहिकता और आशा
'आओ, मिलकर' सबको साथ लेने का आह्वान है; और कविता का अंत निराशा नहीं, उम्मीद पर होता है।
From the text: 'कि इस दौर में भी बचाने को / बहुत कुछ बचा है,'
The speaker and the people in the poem
कवयित्री (वक्ता)
संथाल समाज की सदस्य, जो अपने समुदाय को संबोधित करती हैं।
- अपनी संस्कृति और प्रकृति से गहरा प्रेम
- आत्मालोचना का साहस: अपने समाज की बुराई भी स्वीकारती हैं
- संघर्षशील और स्वाभिमानी
- आशावादी और सामूहिकता में विश्वास रखने वाली
हड़िया में डूबने से बचाने की बात भी करती हैं और अंत में कहती हैं कि बचाने को बहुत कुछ बचा है।
संथाल समाज (संबोधित समुदाय)
वह समुदाय, जिसे मिलकर बचाने का आह्वान है।
- सादगी, भोलापन और प्रकृति से जुड़ाव
- परिश्रमी और जुझारू
- नशे, शहरी प्रभाव और विस्थापन के संकट में
माटी का रंग, धनुष-तीर-कुल्हाड़ी, खुला आँगन और गीत उसके जीवन के अंग हैं।
Poetic devices
| Device | Example | Effect |
|---|---|---|
| सूची-शैली (गणना) और बिंबों की शृंखला | जंगल की ताज़ा हवा, नदियों की निर्मलता, पहाड़ों का मौन, गीतों की धुन... | बचाने योग्य चीज़ों की लंबी सूची से संकट की व्यापकता उभरती है। |
| विरोधाभासी बिंब | 'ठंडी होती दिनचर्या में / जीवन की गर्माहट' | ठंडक और गर्माहट के विरोध से उत्साहहीन होते जीवन में ऊर्जा की ज़रूरत। |
| प्रतीक | धनुष की डोरी, तीर का नुकीलापन, कुल्हाड़ी की धार | आत्मरक्षा, स्वाभिमान और संघर्ष की क्षमता के प्रतीक। |
| ऐंद्रिय बिंब | मिट्टी का सोंधापन (गंध), गीतों की धुन (ध्वनि), पहाड़ों का मौन | आदिवासी परिवेश जीवंत हो उठता है। |
| आंचलिक शब्द | हड़िया, सन्थाल परगना, झारखंडीपन, माटी | स्थानीय रंग और प्रामाणिकता। |
| आह्वान शैली और मुक्त छंद | 'आओ, मिलकर बचाएँ' (आरंभ और अंत में) | सामूहिक संकल्प का स्वर; कविता एक पुकार बन जाती है। |
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
अपनी बस्तियों को नंगी होने से
कवयित्री: कविता की शुरुआत।
प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपदा छिन जाने का खतरा।
भाषा में झारखंडीपन
कवयित्री: अपनी पहचान बचाने की बात।
क्षेत्रीय भाषा-संस्कृति की विशिष्टता।
ठंडी होती दिनचर्या में जीवन की गर्माहट
कवयित्री: स्वभाव की ऊर्जा बचाने की बात।
उत्साह और जीवंतता का महत्त्व; विरोधाभासी बिंब।
और इस अविश्वास-भरे दौर में
कवयित्री: विश्वास, उम्मीद और सपने बचाने से पहले।
आज के समय की पहचान: अविश्वास।
बहुत कुछ बचा है,
कवयित्री: कविता का अंत।
आशावादी समापन।
निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ in real life
Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
अपनी भाषा और पहचान
मान लीजिए आपके छोटे भाई-बहन घर में अपनी मातृभाषा बोलने में झिझकते हैं और केवल अंग्रेज़ी या शहरी लहजे में बात करना पसंद करते हैं।
'भाषा में झारखंडीपन' वाली पंक्ति से आप उन्हें क्या समझाएँगे? (लगभग 40 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- कवयित्री भाषा की क्षेत्रीय विशिष्टता को पहचान मानती हैं।
- दूसरी भाषाएँ सीखना अच्छा, पर अपनी भाषा छोड़ना पहचान खोना।
Answer: मैं समझाऊँगा कि जैसे कवयित्री भाषा के झारखंडीपन को बचाना चाहती हैं, वैसे ही हमारी मातृभाषा हमारी पहचान है। अंग्रेज़ी सीखें, पर घर की भाषा पर गर्व करें।
Memory hook: नई भाषा सीखो, अपनी मत भूलो।
नशे से समाज की रक्षा
कल्पना कीजिए कि आपके इलाके में कुछ युवा नशे की लत में पड़ रहे हैं और लोग इसे 'उनका निजी मामला' कहकर टाल देते हैं।
'पूरी की पूरी बस्ती को हड़िया में डूबने से बचाने' की बात इस स्थिति पर कैसे लागू होती है?
Try it first, then show the solutionSolution
- कवयित्री नशे को पूरी बस्ती का संकट मानती हैं।
- सामूहिक प्रयास: जागरूकता, खेल, परामर्श।
Answer: कवयित्री के अनुसार नशा पूरी बस्ती को डुबो सकता है, इसलिए यह निजी नहीं, सामूहिक समस्या है; मिलकर जागरूकता, खेल-गतिविधियाँ और परामर्श की व्यवस्था करनी चाहिए।
Memory hook: एक का नशा, सबका संकट।
छोटी आशाएँ
यदि बाढ़ के बाद किसी गाँव के लोग सब कुछ खोकर भी एक-दूसरे के घर साफ़ करने में जुट जाएँ, तो इसे कविता की किस पंक्ति से जोड़ेंगे?
कविता के अंत से तुलना कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- 'इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है'।
- विश्वास, उम्मीद और साथ ही असली संपत्ति।
Answer: कविता के अंतिम अंश से; सब कुछ खोकर भी उनके पास 'थोड़ा-सा विश्वास, थोड़ी-सी उम्मीद' और एक-दूसरे का साथ बचा है।
Memory hook: सब छिने, उम्मीद बचे।
Topics in this chapter
How the school exam asks निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ
The question patterns to expect, and the method that works for each.
| Question type | How it is asked | Method |
|---|---|---|
| पठित काव्यांश (प्रश्न 6, 1×5) | बस्ती और पहचान, स्वभाव और संघर्ष-क्षमता, प्रकृति, या विश्वास-उम्मीद वाले अंश पर प्रतीक, शब्दार्थ और भाव के पाँच बहुविकल्पी प्रश्न। | हर बिंब को उसकी श्रेणी (पहचान, स्वभाव, प्रकृति, जीवन के सुख, आशा) से जोड़ें। |
| लगभग 40 शब्द (प्रश्न 8, 2 अंक) | हड़िया का संकेत, धनुष-तीर-कुल्हाड़ी के प्रतीक, 'मन का हरापन', 'पहाड़ों का मौन'। | प्रतीक का अर्थ + आदिवासी जीवन से उसका संबंध। |
| लगभग 60 शब्द (प्रश्न 7, 3 अंक) | कविता का मूल स्वर, आदिवासी समाज के दोनों पक्ष, आज के विकास और विस्थापन से कविता का संबंध। | तीन बिंदु; पंक्तियों का प्रमाण। |
Tricks to remember निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
पाँच श्रेणियाँ: 'प-स्व-प्र-सु-आ'
पहचान (माटी, भाषा) → स्वभाव (गर्माहट, भोलापन, जुझारूपन, आग, धनुष-तीर-कुल्हाड़ी) → प्रकृति (जंगल, नदी, पहाड़, मिट्टी, फसल) → सुख (आँगन, गीत, हँसी, एकांत, मैदान, घास, शांति) → आशा (विश्वास, उम्मीद, सपने)।
Use it when: कविता की सूची क्रम से याद रखने के लिए।
किसके लिए क्या
बच्चे → मैदान; पशु → हरी घास; बूढ़े → पहाड़ों की शांति।
Use it when: बहुविकल्पी प्रश्न।
कवयित्री-परिचय
निर्मला पुतुल: 1972, दुमका (झारखंड), संथाली; रूपांतर अशोक सिंह; 'नगाड़े की तरह बजते शब्द'।
Use it when: अति लघु प्रश्न।
निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ: extract-based questions
Read the extract, answer every part on paper, then open the answers.
Extract 1: काव्यांश 1: बस्ती, माटी और भाषा
अपनी बस्तियों को
नंगी होने से
शहर की आबो-हवा से बचाएँ उसे
बचाएँ डूबने से
पूरी की पूरी बस्ती को
हड़िया में
(1) · 1 mark · MCQ
'बस्तियों को नंगी होने से' बचाने का आशय है:
(क) कपड़े बाँटना
(ख) बस्तियों की हरियाली, प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक पहचान को नष्ट होने से बचाना
(ग) नए घर बनाना
(घ) बस्तियों में बिजली लाना(2) · 1 mark · MCQ
'हड़िया' क्या है, और 'बस्ती को हड़िया में डूबने से बचाएँ' किस बुराई की ओर संकेत करता है?
(क) एक नदी; बाढ़
(ख) चावल से बनी देसी शराब; नशे की बढ़ती आदत
(ग) एक बर्तन; गरीबी
(घ) एक गीत; मनोरंजन(3) · 1 mark · MCQ
काव्यांश के अनुसार कवयित्री बस्ती को किन दो प्रकार के खतरों से बचाना चाहती हैं?
(क) बाढ़ और सूखे से
(ख) बाहर से आते शहरी प्रभाव और भीतर फैलती नशे की आदत से
(ग) महामारी और भूकंप से
(घ) युद्ध और अकाल से(4) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: आगे कवयित्री चेहरे पर अपनी माटी का रंग, भाषा में झारखंडीपन और दिनचर्या में जीवन की गर्माहट बचाने की बात करती हैं।) 'ठंडी होती दिनचर्या में / जीवन की गर्माहट' में 'ठंडी' और 'गर्माहट' का एक साथ प्रयोग किस युक्ति का उदाहरण है?
(क) यमक
(ख) विरोधी शब्दों का संयोजन (विरोधाभासी बिंब)
(ग) श्लेष
(घ) पुनरुक्ति प्रकाश(5) · 1 mark · Assertion-reason
कथन (A): कवयित्री केवल बाहरी खतरों की बात करती हैं, अपने समाज की कमियों की नहीं। कारण (R): वे हड़िया में डूबने से बस्ती को बचाने की बात करती हैं।
(क) A और R दोनों सही हैं, R, A की सही व्याख्या है
(ख) A और R दोनों सही हैं, पर R, A की व्याख्या नहीं है
(ग) A गलत, R सही
(घ) A सही, R गलत
Show the answersAnswers
- (ख) बस्तियों की हरियाली, प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक पहचान को नष्ट होने से बचाना
- (ख) चावल से बनी देसी शराब; नशे की बढ़ती आदत
- (ख) बाहर से आते शहरी प्रभाव और भीतर फैलती नशे की आदत से
- (ख) विरोधी शब्दों का संयोजन (विरोधाभासी बिंब): उत्साहहीन होते जीवन में ऊर्जा बचाने की चाह
- (ग) A गलत, R सही (हड़िया का उल्लेख दिखाता है कि वे अपने समाज की भीतरी बुराई भी स्वीकारती हैं)
Extract 2: काव्यांश 2: विश्वास, उम्मीद और सपने
बच्चों के लिए मैदान
पशुओं के लिए हरी-हरी घास
बूढ़ों के लिए पहाड़ों की शान्ति
और इस अविश्वास-भरे दौर में
थोड़ा-सा विश्वास
(1) · 1 mark · MCQ
कवयित्री बूढ़ों के लिए क्या बचाना चाहती हैं?
(क) मैदान
(ख) हरी घास
(ग) पहाड़ों की शांति
(घ) खुला आँगन(2) · 1 mark · MCQ
'अविश्वास-भरे दौर' से कवयित्री का संकेत है:
(क) धार्मिक समय
(ख) ऐसा समय, जिसमें लोगों का एक-दूसरे पर और भविष्य पर भरोसा टूट रहा है
(ग) चुनाव का समय
(घ) त्योहारों का मौसम(3) · 1 mark · MCQ
'थोड़ा-सा विश्वास / थोड़ी-सी उम्मीद / थोड़े-से सपने' में 'थोड़ा' शब्द की आवृत्ति से क्या प्रभाव पड़ता है?
(क) माँग बड़ी और असंभव लगती है
(ख) माँग विनम्र और यथार्थवादी लगती है; थोड़ा भी बचे तो जीवन चल सकता है
(ग) कविता हास्यपूर्ण हो जाती है
(घ) कोई प्रभाव नहीं(4) · 1 mark · MCQ
(संदर्भ: कविता अंत में मिलकर बचाने का आह्वान करती है और कहती है कि इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है।) कविता का अंत किस स्वर में होता है?
(क) निराशा
(ख) क्रोध
(ग) आशा
(घ) व्यंग्य(5) · 1 mark · MCQ
काव्यांश में बच्चों, पशुओं और बूढ़ों का उल्लेख किस बात को दर्शाता है?
(क) कवयित्री केवल अपने परिवार की चिंता करती हैं
(ख) कवयित्री समाज के हर वर्ग और प्राणी के लिए अनुकूल परिवेश चाहती हैं
(ग) गाँव में केवल ये ही रहते हैं
(घ) शहर में मैदान नहीं होते
Show the answersAnswers
- (ग) पहाड़ों की शांति
- (ख) ऐसा समय, जिसमें लोगों का एक-दूसरे पर और भविष्य पर भरोसा टूट रहा है
- (ख) माँग विनम्र और यथार्थवादी लगती है; थोड़ा भी बचे तो जीवन चल सकता है
- (ग) आशा
- (ख) कवयित्री समाज के हर वर्ग और प्राणी के लिए अनुकूल परिवेश चाहती हैं
निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ: exam-level solved questions
Ordered from exam level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.
Example 1: धनुष, तीर और कुल्हाड़ी · 2 marks · Short answerExam level
'धनुष की डोरी / तीर का नुकीलापन / कुल्हाड़ी की धार' को बचाने की बात किस आशय से कही गई है? (लगभग 40 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- आदिवासी जीवन के पारंपरिक औज़ार और शस्त्र।
- प्रतीक: आत्मरक्षा, स्वाभिमान, संघर्ष की क्षमता।
Answer: धनुष, तीर और कुल्हाड़ी आदिवासी जीवन के पारंपरिक औज़ार और शस्त्र हैं। यहाँ ये आत्मरक्षा, स्वाभिमान और अन्याय से लड़ने की क्षमता के प्रतीक हैं; कवयित्री चाहती हैं कि समाज की यह धार कुंद न हो।
Example 2: मन का हरापन · 2 marks · Short answerHarder exam level
'मन का हरापन' और 'पहाड़ों का मौन' जैसे प्रयोगों में प्रकृति और मनुष्य का कौन-सा संबंध झलकता है? (लगभग 40 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- हरापन = ताज़गी, जीवंतता; प्रकृति का गुण मन में।
- पहाड़ों का मौन = गहरी शांति; आदिवासी मन और प्रकृति एक-दूसरे में घुले हुए।
Answer: 'मन का हरापन' मन की ताज़गी और जीवंतता है, जो हरी-भरी प्रकृति से मिलती है; 'पहाड़ों का मौन' गहरी शांति है। दोनों प्रयोग बताते हैं कि आदिवासी मन और प्रकृति अलग नहीं; प्रकृति नष्ट होगी तो मन की ताज़गी और शांति भी खो जाएगी।
Example 3: कविता का मूल स्वर · 3 marks · Short answerExam level
'आओ, मिलकर बचाएँ' कविता का मूल स्वर क्या है? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (लगभग 60 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- प्रकृति के विनाश और विस्थापन से आदिवासी समाज संकट में।
- संस्कृति, स्वभाव, प्रकृति और जीवन के सहज सुख बचाने का आह्वान।
- सामूहिक प्रयास और आशा।
Answer: कविता का मूल स्वर यह है कि प्रकृति के विनाश, शहरीकरण और विस्थापन के कारण आदिवासी समाज संकट में है। कवयित्री सबको मिलकर अपनी माटी, भाषा, जुझारूपन, जंगल, नदियाँ, पहाड़, गीत और जीवन के सहज सुख बचाने का आह्वान करती हैं। संकट के बावजूद स्वर आशावादी है: इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है।
Example 4: आदिवासी समाज के दोनों पक्ष · 3 marks · Short answerHarder exam level
कविता में आदिवासी समाज के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पक्ष कैसे सामने आते हैं? उदाहरण सहित लिखिए। (लगभग 60 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- सकारात्मक: भोलापन, जुझारूपन, गीत-नाच, प्रकृति-प्रेम।
- नकारात्मक: हड़िया का नशा, ठंडी होती दिनचर्या, शहरी प्रभाव में बहना।
- कवयित्री की बेबाकी।
Answer: सकारात्मक पक्ष में दिल का भोलापन, अक्खड़पन और जुझारूपन, भीतर की आग, गीत और नाच के लिए खुला आँगन तथा प्रकृति से गहरा जुड़ाव है। नकारात्मक पक्ष में पूरी बस्ती का हड़िया के नशे में डूबना, उत्साहहीन होती दिनचर्या और शहरी आबो-हवा में बहना है। कवयित्री दोनों को बेबाकी से सामने रखकर समाज को आत्ममंथन का अवसर देती हैं।
Example 5: विकास बनाम विस्थापन · 3 marks · Short answerHOTS / competency
किसी आदिवासी क्षेत्र में खनन या बाँध परियोजना से रोज़गार तो आता है, पर जंगल और गाँव उजड़ते हैं। इस कविता के आधार पर बताइए कि ऐसे विकास में किन बातों को बचाना ज़रूरी है। (लगभग 60 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- कविता: जंगल, नदी, पहाड़, माटी, भाषा, आँगन, मैदान।
- विकास में: पर्यावरण-संतुलन, समुदाय की सहमति, पुनर्वास, सांस्कृतिक पहचान।
- 'मिलकर' निर्णय।
Answer: कविता के अनुसार जंगल की हवा, नदियों की निर्मलता, पहाड़, मिट्टी और फसलें ही आदिवासी जीवन का आधार हैं। इसलिए विकास में पर्यावरण-संतुलन, स्थानीय लोगों की सहमति, उचित पुनर्वास और उनकी भाषा, गीत तथा सामूहिक जीवन की रक्षा ज़रूरी है। 'आओ, मिलकर' का संदेश है कि ऐसे निर्णय समुदाय को साथ लेकर हों, उनके ऊपर थोपे न जाएँ।
Example 6: रोने के लिए एकांत · 2 marks · Short answerHOTS / competency
कवयित्री 'हँसने के लिए खिलखिलाहट' के साथ 'रोने के लिए एकांत' भी बचाना चाहती हैं। एकांत को बचाने योग्य मानने के पीछे क्या दृष्टि है? (लगभग 40 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- दुख भी जीवन का हिस्सा; उसे व्यक्त करने की जगह चाहिए।
- भीड़ और शोर वाले जीवन में निजी, शांत क्षण खो रहे हैं।
Answer: कवयित्री मानती हैं कि दुख भी जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है और उसे व्यक्त करने के लिए शांत, निजी जगह चाहिए। शहरीकरण की भीड़ और शोर में ऐसे क्षण खो रहे हैं; मन के स्वास्थ्य के लिए खुशी की तरह एकांत भी ज़रूरी है।
Where the marks are
How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.
कविता का मूल स्वर (लगभग 60 शब्द, 3 अंक) (3 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| संकट: प्रकृति का विनाश, विस्थापन, शहरी प्रभाव, नशा | 1 |
| बचाने का आह्वान (पहचान, स्वभाव, प्रकृति) और आशावादी अंत | 1.5 |
| भाषा और शब्द-सीमा | 0.5 |
धनुष, तीर, कुल्हाड़ी बचाने का आशय (लगभग 40 शब्द, 2 अंक) (2 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| पारंपरिक औज़ार-शस्त्र होने का उल्लेख | 1 |
| प्रतीकार्थ: आत्मरक्षा, स्वाभिमान, संघर्ष | 1 |
Where students lose marks in निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: 'हड़िया' का अर्थ मिट्टी का बर्तन लिखना
यहाँ हड़िया चावल से बनी देसी शराब है; पंक्ति नशे की बुराई की ओर संकेत करती है।
Do this: प्रसंग से अर्थ तय करें: 'बस्ती को हड़िया में डूबने से'।
Usually costs: 1 अंक
Mistake: धनुष, तीर, कुल्हाड़ी को हिंसा का समर्थन समझना
ये आत्मरक्षा, स्वाभिमान और संघर्ष-क्षमता के प्रतीक हैं।
Do this: प्रतीकार्थ लिखें।
Usually costs: 1 अंक
Mistake: कविता को निराशावादी बताना
अंत आशा पर है: 'बहुत कुछ बचा है'।
Do this: संकट और आशा, दोनों का उल्लेख करें।
Usually costs: 1 अंक
Mistake: कवयित्री को मूल रूप से हिंदी की कवयित्री बताना
कविता संथाली में है; हिंदी रूपांतर अशोक सिंह का है।
Do this: 'संथाली कविता का हिंदी रूपांतर' लिखें।
Usually costs: आधा अंक
Practice questions on निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 1 mark · MCQExam level
'आओ, मिलकर बचाएँ' का संथाली से हिंदी रूपांतर किसने किया है?
(क) केदारनाथ सिंह
(ख) अशोक सिंह
(ग) हरिभाऊ उपाध्याय
(घ) विलास गितेHint
कवयित्री-परिचय की अंतिम पंक्ति।
Answer
(ख) अशोक सिंह
Q2 · 1 mark · Very short answerExam level
'आबो-हवा' और 'सोंधापन' शब्दों के अर्थ लिखिए।
Hint
जलवायु; मिट्टी की गंध।
Answer
आबो-हवा = जलवायु (यहाँ वातावरण/प्रभाव); सोंधापन = सुगंध, विशेषकर भीगी मिट्टी की गंध।
Q3 · 2 marks · Short answerHarder exam level
कवयित्री 'भीतर की आग' को क्यों बचाना चाहती हैं? (लगभग 40 शब्द)
Hint
उत्साह, आक्रोश, संघर्ष की ऊर्जा।
Answer
'भीतर की आग' उत्साह, स्वाभिमान और अन्याय के प्रति आक्रोश की ऊर्जा है। यदि यह बुझ गई, तो समाज शोषण और विस्थापन को चुपचाप सह लेगा; इसलिए संघर्ष की यह आग बचाना ज़रूरी है।
Q4 · 1 mark · MCQHarder exam level
कथन (A): कवयित्री बच्चों के लिए मैदान और पशुओं के लिए घास बचाना चाहती हैं। कारण (R): खुले मैदान और चरागाह शहरीकरण और अतिक्रमण से तेज़ी से घट रहे हैं।
(क) A और R दोनों सही, R व्याख्या करता है
(ख) A और R दोनों सही, R व्याख्या नहीं करता
(ग) A सही, R गलत
(घ) A गलत, R सहीHint
बचाने की ज़रूरत तभी है जब खतरा हो।
Answer
(क) A और R दोनों सही, R व्याख्या करता है
Q5 · 3 marks · Short answerHOTS / competency
मान लीजिए किसी आदिवासी गाँव की ज़मीन रासायनिक खाद, खनन और प्रदूषण से बंजर होने लगे और 'मिट्टी का सोंधापन' तथा 'फसलों की लहलहाहट' खो जाए। कविता के आधार पर बताइए कि इसका गाँव के जीवन, संस्कृति और लोगों के मन पर क्या असर पड़ेगा। (लगभग 60 शब्द)
Hint
आजीविका, पलायन, गीत-नाच, मन का हरापन।
Answer
मिट्टी और फसलें ही आदिवासी गाँव की आजीविका हैं; उनके खोने से भूख और रोज़गार के लिए शहरों की ओर पलायन बढ़ेगा। फसल के उत्सव, गीत और नाच, जो खुले आँगन में होते हैं, धीरे-धीरे छूट जाएँगे। कविता के शब्दों में 'मन का हरापन' और 'जीवन की गर्माहट' भी खो जाएगी, क्योंकि आदिवासी मन और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़े हैं।
Q6 · 2 marks · Short answerHarder exam level
कविता में सूची-शैली (एक के बाद एक चीज़ें गिनाना) का क्या प्रभाव है? (लगभग 40 शब्द)
Hint
संकट की व्यापकता; हर छोटी चीज़ का महत्त्व।
Answer
एक के बाद एक चीज़ें गिनाने से पता चलता है कि खतरा कितना व्यापक है: पहचान, स्वभाव, प्रकृति और जीवन के छोटे सुख, सब संकट में हैं। साथ ही हर छोटी चीज़ का महत्त्व उभरता है और कविता एक लंबी पुकार जैसी लगती है।
Q7 · 2 marks · Short answerHOTS / competency
कविता 'नंगी होने से' बचाने से शुरू होकर 'बहुत कुछ बचा है' पर समाप्त होती है। इस आरंभ और अंत के बीच भावों की यात्रा स्पष्ट कीजिए। (लगभग 40 शब्द)
Hint
चिंता से आशा तक।
Answer
कविता बस्तियों के उजड़ने और नशे में डूबने की चिंता से शुरू होती है, फिर पहचान, प्रकृति और जीवन के सुखों की लंबी सूची से संकट की गहराई दिखाती है, और अंत में आशा पर पहुँचती है कि अब भी बचाने को बहुत कुछ है। यह चिंता से संकल्प और आशा तक की यात्रा है।
Test your recall
Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.
1.कविता की कवयित्री कौन हैं?Show answer
निर्मला पुतुल।
2.कवयित्री का जन्म कहाँ हुआ?Show answer
दुमका (झारखंड) में, 1972 में।
3.चेहरे पर किस क्षेत्र की माटी का रंग बचाना है?Show answer
सन्थाल परगना की।
4.नाचने के लिए क्या बचाना है?Show answer
खुला आँगन।
5.पशुओं के लिए क्या बचाना है?Show answer
हरी-हरी घास।
6.'अक्खड़पन' का अर्थ क्या है?Show answer
किसी बात को लेकर रुखाई से तन जाने का भाव।
Quick revision checklist
The night before the exam: can you do each of these without looking?
- क्या आप बचाने योग्य चीज़ों को पाँच श्रेणियों में बाँटकर बता सकते हैं?
- क्या आप हड़िया और 'शहर की आबो-हवा' का संकेत समझा सकते हैं?
- क्या आप धनुष-तीर-कुल्हाड़ी और 'भीतर की आग' का प्रतीकार्थ लिख सकते हैं?
- क्या आप कविता में आदिवासी समाज के दोनों पक्ष बता सकते हैं?
- क्या आप कविता के आशावादी अंत को स्पष्ट कर सकते हैं?
निर्मला पुतुल – आओ, मिलकर बचाएँ: frequently asked questions
कविता किस समाज के बारे में है?
झारखंड के संथाल परगना के संथाल (आदिवासी) समाज के बारे में, पर बड़े संदर्भ में यह हर समाज के स्वस्थ सामाजिक-प्राकृतिक परिवेश की बात करती है।
कविता का मूल स्वर क्या है?
प्रकृति के विनाश और विस्थापन से संकट में पड़े आदिवासी समाज की संस्कृति, प्रकृति और जीवन-मूल्यों को मिलकर बचाने का आह्वान।
निर्मला पुतुल की कविताओं की विशेषता क्या है?
वे आदिवासी समाज के सकारात्मक (सादगी, परिश्रम, प्रकृति-प्रेम) और नकारात्मक (अशिक्षा, कुरीतियाँ, नशा) दोनों पक्ष बेबाकी से रखती हैं।
कविता किस भाषा में लिखी गई थी?
संथाली में; हिंदी रूपांतर अशोक सिंह ने किया है।
Based on: CBSE हिंदी (आधार) (302) पाठ्यक्रम, कक्षा 11-12, 2026-27; NCERT आरोह भाग 1 (Reprint 2026-27), पाठ 8: आओ, मिलकर बचाएँ