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HindiCBSE Class 12 · Chapter 15

भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज: Class 12

Updated 14 October 2026 · Fact-checked

इस पाठ में बाबा साहेब आंबेडकर तर्क देते हैं कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन नहीं, श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन है, क्योंकि वह जन्म से पेशा तय करके ऊँच-नीच बनाती है और बेरोज़गारी बढ़ाती है। दूसरे अंश में वे स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित आदर्श समाज की कल्पना करते हैं, जिसका दूसरा नाम लोकतंत्र है।

What बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज is about

आरोह भाग 2 का यह गद्य पाठ दो अंशों से बना है: 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा' तथा 'मेरी कल्पना का आदर्श समाज'। दोनों डॉ. भीमराव आंबेडकर (1891-1956) के प्रसिद्ध भाषण 'एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट' (1936) के हिंदी रूपांतर 'जाति-भेद का उच्छेद' (रूपांतरकार ललई सिंह यादव) से लिए गए हैं। यह भाषण लाहौर के जाति-पाँति तोड़क मंडल के वार्षिक सम्मेलन के लिए लिखा गया था, पर इसके क्रांतिकारी विचारों पर आयोजकों की सहमति न बनने से सम्मेलन ही स्थगित हो गया; बाद में आंबेडकर ने इसे पुस्तिका के रूप में छपवाया।

आंबेडकर भारतीय संविधान के निर्माता, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री और समाज-सुधारक थे; बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले उनके प्रेरक थे। यह पाठ भावुक अपील नहीं, तर्क पर आधारित वैचारिक निबंध है, इसलिए उत्तरों में उनके तर्कों का क्रम सबसे ज़रूरी है।

बोर्ड परीक्षा (खंड ग) में इस पाठ से पठित गद्यांश पर पाँच MCQ, लगभग 60 शब्दों के 3 अंक वाले और लगभग 40 शब्दों के 2 अंक वाले प्रश्न आ सकते हैं। जाति-प्रथा श्रम विभाजन क्यों नहीं, बेरोज़गारी से संबंध, दासता की व्यापक परिभाषा, समता के तर्क और आदर्श समाज के तीन तत्त्व सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

Weightage: यह पाठ खंड ग: आरोह भाग 2 एवं वितान भाग 2 का भाग है, जिसके 40 अंक हैं (कुल 80 में से), आरोह भाग 2 और वितान भाग 2 के सभी पाठों के साथ।Source: CBSE हिंदी (आधार) 302 पाठ्यक्रम 2026-27 और प्रतिदर्श प्रश्नपत्र 2026-27

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज: summary

In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.

श्रम विभाजन और जाति-प्रथा: लेखक कहते हैं कि आज भी जातिवाद के समर्थक कम नहीं हैं। उनका एक तर्क है कि सभ्य समाज कार्य-कुशलता के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है और जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन का ही रूप है। आंबेडकर इस तर्क का खंडन करते हैं। पहली बात, जाति-प्रथा केवल काम का नहीं, काम करने वालों (श्रमिकों) का विभाजन करती है, और ऊपर से इन वर्गों को ऊँचा-नीचा भी ठहराती है, जो संसार के किसी दूसरे समाज में नहीं होता। दूसरी बात, यह विभाजन मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं; व्यक्ति के प्रशिक्षण या क्षमता को देखे बिना, माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार जन्म से पहले ही उसका पेशा तय कर दिया जाता है।

तीसरी बात, जाति-प्रथा व्यक्ति को जीवन भर एक ही पेशे से बाँध देती है। उद्योगों की तकनीक बदलने पर पेशा बदलना पड़ सकता है, पर पैतृक पेशा छोड़ने की अनुमति न होने से व्यक्ति भूखों मरने को विवश होता है। इसलिए जाति-प्रथा भारत में बेरोज़गारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण है। चौथी बात, जब लोग थोपे गए काम को अरुचि और विवशता से करते हैं, तो वे टालू और कम काम करते हैं; न दिल लगता है, न दिमाग, तो कुशलता कैसे आए? अतः आर्थिक दृष्टि से भी जाति-प्रथा हानिकारक है।

मेरी कल्पना का आदर्श समाज: आलोचना के बाद आंबेडकर रचनात्मक पक्ष रखते हैं। उनका आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित होगा। भ्रातृता का अर्थ है समाज में इतनी गतिशीलता कि हर अच्छा परिवर्तन सब तक पहुँचे, सबके हितों में सबकी भागीदारी हो और लोगों के बीच बिना रोक-टोक संपर्क हो, जैसे दूध और पानी मिल जाते हैं। इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है, जो शासन-पद्धति से अधिक मिल-जुलकर जीने की रीति है।

स्वतंत्रता में घूमने-फिरने, जीवन, शारीरिक सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार के साथ अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता भी शामिल होनी चाहिए। जिसे यह स्वतंत्रता नहीं, वह 'दासता' में है, क्योंकि दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं, दूसरों द्वारा तय किए गए कर्तव्यों को निभाने की विवशता भी है।

समता पर आपत्ति हो सकती है कि सब मनुष्य बराबर नहीं होते। आंबेडकर मानते हैं कि मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर है: शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार (माता-पिता की देखभाल, शिक्षा आदि) और अपने प्रयत्न। पहली दो बातें व्यक्ति के वश में नहीं, इसलिए उनके आधार पर असमान व्यवहार अन्याय है; केवल प्रयत्न के आधार पर अंतर उचित है। समाज को अधिकतम लाभ तभी मिलेगा जब सबको आरंभ से समान अवसर मिलें। राजनीतिज्ञ के लिए भी सबके साथ समान व्यवहार ही एकमात्र व्यावहारिक कसौटी है, क्योंकि वह करोड़ों लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में नहीं बाँट सकता।

Themes and message

जाति-प्रथा: श्रम नहीं, श्रमिक-विभाजन

श्रम विभाजन सभ्य समाज की ज़रूरत है, पर जाति-प्रथा जन्म के आधार पर लोगों को बाँटती है और ऊँच-नीच का भेद जोड़ती है। इसमें रुचि, योग्यता और प्रशिक्षण का कोई स्थान नहीं।

From the text: "जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है।"

आर्थिक हानि: बेरोज़गारी और अकुशलता

पेशा बदलने की अनुमति न होने से तकनीक बदलने पर लोग बेरोज़गार होते हैं; और अरुचि से किया गया काम कुशलता नहीं ला सकता।

From the text: जाति-प्रथा को लेखक बेरोज़गारी का 'प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण' कहते हैं।

आदर्श समाज: स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता

आंबेडकर का आदर्श समाज इन तीन मूल्यों पर टिका है; भाईचारे का वास्तविक रूप दूध-पानी जैसा मेल है और यही लोकतंत्र है।

From the text: "मेरा आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा।"

समान अवसर और न्याय

जन्म और पारिवारिक सुविधाओं से मिली असमानता के आधार पर भेदभाव अन्याय है; समाज का भला तभी है जब सबको आरंभ से समान अवसर मिलें।

From the text: लेखक के अनुसार 'समता' शाब्दिक अर्थ में असंभव होते हुए भी एक नियामक सिद्धांत है।

Characters

डॉ. भीमराव आंबेडकर (वक्ता/लेखक)

भाषण के वक्ता; जाति-प्रथा के आलोचक और आदर्श समाज के चिंतक।

  • तार्किक: हर बात को तर्क और उदाहरण से सिद्ध करते हैं
  • मानवतावादी: सबके लिए समान अवसर और सम्मान चाहते हैं
  • लोकतांत्रिक: लोकतंत्र को जीवन-पद्धति मानते हैं
  • साहसी और क्रांतिकारी विचारक

जातिवाद के पोषकों का तर्क पहले रखते हैं, फिर एक-एक कर उसका खंडन करते हैं; श्रोताओं के संभावित प्रश्न का पहले से उत्तर देते हैं।

जातिवाद के पोषक

वे लोग जिनके तर्कों का लेखक खंडन करते हैं।

  • जाति-प्रथा को श्रम विभाजन बताकर सही ठहराने वाले
  • स्वतंत्रता के कुछ रूप मानने, पर व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता न देने वाले

लेखक कहते हैं कि वे जीवन, सुरक्षा और संपत्ति की स्वतंत्रता तो मान लेंगे, पर व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता देने को जल्दी तैयार नहीं होंगे।

How it is written

DeviceExampleEffect
तर्क-प्रधान, विवेचनात्मक शैलीविरोधी तर्क ('जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन है') रखकर बिंदुवार खंडनपाठक को भावना नहीं, विवेक से सहमत कराता है।
प्रश्न शैली"भ्रातृता अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?"भाषण में श्रोताओं को सीधे सोचने पर विवश करती है।
उपमा"दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है"भाईचारे को ऐसे मेल के रूप में दिखाती है जिसमें भेद मिट जाए।
तत्सम-प्रधान, पारिभाषिक शब्दावली'पूर्वनिर्धारण', 'सामाजिक उत्तराधिकार', 'नियामक सिद्धांत', 'व्यवहार्य'वैचारिक निबंध की गंभीरता और स्पष्टता।

Key quotations

Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.

  • जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है।

    आंबेडकर: जातिवाद के पोषकों के तर्क का खंडन करते हुए

    पाठ का पहला और मुख्य तर्क: जाति-प्रथा काम का नहीं, मनुष्यों का विभाजन है।

  • जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

    आंबेडकर: पेशा बदलने की अनुमति न होने के परिणाम पर

    जाति-प्रथा का आर्थिक दुष्परिणाम।

  • मेरा आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा।

    आंबेडकर: 'मेरी कल्पना का आदर्श समाज' का आरंभ

    आदर्श समाज के तीन आधार-स्तंभ।

  • दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है

    आंबेडकर: भ्रातृता की व्याख्या

    भाईचारा ऐसा मेल है जिसमें अलगाव न बचे; इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र।

  • ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता।

    आंबेडकर: व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता की चर्चा

    दासता की व्यापक परिभाषा: दूसरों के तय किए कर्तव्य निभाने की विवशता भी दासता है।

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज in real life

Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.

पेशा चुनने की स्वतंत्रता

मान लीजिए एक लड़का कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहता है, पर उसका परिवार और समाज ज़ोर देता है कि उसे अपना पारंपरिक पुश्तैनी काम ही करना होगा।

आंबेडकर के विचारों के आधार पर इस स्थिति का विश्लेषण कीजिए।

Try it first, then show the solutionSolution
  1. जाति-प्रथा रुचि और क्षमता देखे बिना जन्म से पेशा तय करती है।
  2. आंबेडकर के अनुसार व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता न देना उसे दासता में जकड़ना है, और अरुचि से किया काम कुशलता नहीं लाता।

Answer: यह वही दोष है जिसकी आंबेडकर आलोचना करते हैं। लड़के को अपनी रुचि का पेशा चुनने देना चाहिए; इसी से वह कुशल बनेगा और समाज को भी उसकी पूरी क्षमता का लाभ मिलेगा।

Memory hook: रुचि से चुना काम = कुशलता।

तकनीकी बदलाव और बेरोज़गारी

कल्पना कीजिए कि मशीनें आने से हाथ से कपड़ा बुनने का काम घट गया है, पर किसी समुदाय को सामाजिक दबाव के कारण दूसरा काम अपनाने नहीं दिया जाता।

पाठ के आधार पर बताइए कि इसका परिणाम क्या होगा।

Try it first, then show the solutionSolution
  1. आंबेडकर कहते हैं कि उद्योगों की तकनीक बदलने पर पेशा बदलना पड़ता है।
  2. पेशा बदलने की अनुमति न हो तो भूखों मरने के सिवा चारा नहीं; यही बेरोज़गारी है।

Answer: वह समुदाय बेरोज़गारी और भुखमरी का शिकार होगा। इसीलिए आंबेडकर जाति-प्रथा को बेरोज़गारी का प्रत्यक्ष कारण मानते हैं; पेशा बदलने की स्वतंत्रता ही इसका उपाय है।

Memory hook: तकनीक बदली, पेशा नहीं बदला = भूख।

समान अवसर

मान लीजिए एक प्रतियोगी परीक्षा में एक छात्र महँगी कोचिंग और सुविधाओं वाले परिवार से है और दूसरा ऐसे गाँव से जहाँ बिजली भी ठीक से नहीं आती।

आंबेडकर के 'समता' के तर्क के आधार पर बताइए कि दोनों के साथ न्याय कैसे होगा।

Try it first, then show the solutionSolution
  1. क्षमता तीन बातों पर निर्भर: वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार, अपने प्रयत्न।
  2. पहली दो बातें छात्र के वश में नहीं; इसलिए समाज को आरंभ से समान अवसर देने चाहिए।

Answer: केवल अंकों से तुलना सुविधा-संपन्न के पक्ष में निर्णय होगा। न्याय तब है जब गाँव के छात्र को भी आरंभ से अच्छी शिक्षा, संसाधन और अवसर मिलें; उसके बाद प्रयत्न के आधार पर अंतर उचित है।

Memory hook: दौड़ बराबर रेखा से शुरू हो।

Topics in this chapter

How the board asks बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

The question patterns to expect, and the method that works for each.

Question typeHow it is askedMethod
पठित गद्यांश पर बहुविकल्पी प्रश्न (1×5)श्रम विभाजन, पेशे का पूर्वनिर्धारण, दासता, भाईचारा-लोकतंत्र या समता वाले अंश पर अर्थ, तर्क और कथन-कारण।पहचानें कि अंश किस तर्क का है; पारिभाषिक शब्द (श्रमिक-विभाजन, पूर्व लेख, सामाजिक उत्तराधिकार, नियामक सिद्धांत) का अर्थ तैयार रखें।
तर्क लिखिए (3 अंक)जाति-प्रथा को श्रम विभाजन न मानने के तर्क; समता को व्यवहार्य सिद्धांत मानने के तर्क।तीन बिंदु, हर बिंदु एक तर्क; लेखक का निष्कर्ष अंत में।
परिभाषा / आशय (2 अंक)दासता की व्यापक परिभाषा; लोकतंत्र का अर्थ; जाति-प्रथा और बेरोज़गारी।लेखक की परिभाषा अपने शब्दों में + एक उदाहरण।
आज के संदर्भ में (3 अंक)क्या जाति-प्रथा आज भी बेरोज़गारी का कारण है? 'भ्रातृता' शब्द में स्त्रियाँ शामिल हैं या नहीं?पाठ का तर्क + आज की स्थिति (संविधान, आरक्षण, शहरीकरण, फिर भी बचे भेदभाव) + संतुलित निष्कर्ष।

Tricks to remember बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.

  • जाति-प्रथा के चार दोष: 'श्र-रु-बं-अ'

    श्रमिक-विभाजन और ऊँच-नीच; रुचि की अनदेखी (जन्म से पेशा); बंधन (जीवन भर एक पेशा, बेरोज़गारी); अरुचि से अकुशलता (आर्थिक हानि)।

    Use it when: 'जाति-प्रथा श्रम विभाजन क्यों नहीं' वाले 3 अंक के प्रश्न में।

  • आदर्श समाज: 'स्व-स-भ्रा' = लोकतंत्र

    स्वतंत्रता (व्यवसाय चुनना भी), समता (समान अवसर), भ्रातृता (दूध-पानी)।

    Use it when: आदर्श समाज वाले प्रश्न में।

  • क्षमता के तीन आधार: 'वंश-विरासत-मेहनत'

    शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार, अपने प्रयत्न; केवल तीसरे पर अंतर उचित।

    Use it when: समता वाले प्रश्न में।

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज: extract-based questions

Read the extract, answer every part on paper, then open the answers.

Extract 1: गद्यांश 1: पेशे का पूर्वनिर्धारण

कुशल व्यक्ति या सक्षम-श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना, दूसरे ही दृष्टिकोण जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, पहले से ही अर्थात गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।

  1. (1) · 1 mark · MCQ

    लेखक के अनुसार सक्षम-श्रमिक-समाज बनाने के लिए क्या आवश्यक है?
    (क) सबको एक ही पेशा देना
    (ख) व्यक्तियों की क्षमता इतनी विकसित करना कि वे अपना पेशा स्वयं चुन सकें
    (ग) माता-पिता का पेशा अपनाना
    (घ) अधिक मज़दूरी देना

  2. (2) · 1 mark · MCQ

    जाति-प्रथा में मनुष्य का पेशा किस आधार पर तय होता है?
    (क) उसकी रुचि से
    (ख) उसके प्रशिक्षण से
    (ग) माता-पिता के सामाजिक स्तर से
    (घ) उसकी परीक्षा के अंकों से

  3. (3) · 1 mark · MCQ

    'गर्भधारण के समय से ही' पेशा तय करने का अर्थ है:
    (क) जन्म से पहले ही, व्यक्ति की योग्यता जाने बिना पेशा निश्चित कर देना
    (ख) डॉक्टर द्वारा पेशा बताना
    (ग) बचपन में प्रशिक्षण देना
    (घ) पेशा बदलने की छूट देना

  4. (4) · 1 mark · MCQ

    लेखक जाति-प्रथा के सिद्धांत को 'दूषित' क्यों कहते हैं?
    (क) क्योंकि वह पुराना है
    (ख) क्योंकि वह व्यक्ति की क्षमता और प्रशिक्षण की अनदेखी करता है
    (ग) क्योंकि वह विदेशी है
    (घ) क्योंकि उसमें मज़दूरी कम है

  5. (5) · 1 mark · Assertion-reason

    कथन (A): जाति-प्रथा पर आधारित श्रम विभाजन स्वाभाविक नहीं है।
    कारण (R): यह मनुष्य की रुचि और क्षमता पर आधारित नहीं है।
    (क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
    (ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
    (ग) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
    (घ) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।

Show the answersAnswers
  1. (ख) व्यक्तियों की क्षमता इतनी विकसित करना कि वे अपना पेशा स्वयं चुन सकें
  2. (ग) माता-पिता के सामाजिक स्तर से
  3. (क) जन्म से पहले ही, व्यक्ति की योग्यता जाने बिना पेशा निश्चित कर देना
  4. (ख) क्योंकि वह व्यक्ति की क्षमता और प्रशिक्षण की अनदेखी करता है
  5. (क) दोनों सही हैं और कारण, कथन की सही व्याख्या करता है।

Extract 2: गद्यांश 2: भाईचारा और लोकतंत्र

सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। तात्पर्य यह कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो।

  1. (1) · 1 mark · MCQ

    लेखक भाईचारे की तुलना किससे करते हैं?
    (क) तेल-पानी से
    (ख) दूध-पानी के मिश्रण से
    (ग) आग-पानी से
    (घ) नदी-सागर से

  2. (2) · 1 mark · MCQ

    लेखक के अनुसार लोकतंत्र मूलतः क्या है?
    (क) केवल चुनाव की व्यवस्था
    (ख) सामूहिक जीवनचर्या की रीति और सम्मिलित अनुभवों का आदान-प्रदान
    (ग) राजा का शासन
    (घ) सेना का नियंत्रण

  3. (3) · 1 mark · MCQ

    'अबाध संपर्क' का अर्थ है:
    (क) सीमित मेल-जोल
    (ख) बिना रोक-टोक मेल-जोल
    (ग) केवल पत्र-व्यवहार
    (घ) संपर्क का अभाव

  4. (4) · 1 mark · MCQ

    लोकतंत्र के लिए साथियों के प्रति कौन-सा भाव आवश्यक बताया गया है?
    (क) ईर्ष्या
    (ख) प्रतिस्पर्धा
    (ग) श्रद्धा व सम्मान
    (घ) भय

  5. (5) · 1 mark · Assertion-reason

    कथन (A): लेखक के अनुसार भाईचारे का दूसरा नाम लोकतंत्र है।
    कारण (R): लोकतंत्र केवल शासन की पद्धति है।
    (क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
    (ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
    (ग) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
    (घ) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।

Show the answersAnswers
  1. (ख) दूध-पानी के मिश्रण से
  2. (ख) सामूहिक जीवनचर्या की रीति और सम्मिलित अनुभवों का आदान-प्रदान
  3. (ख) बिना रोक-टोक मेल-जोल
  4. (ग) श्रद्धा व सम्मान
  5. (ग) कथन सही है, पर कारण गलत है; लेखक कहते हैं कि लोकतंत्र केवल शासन की पद्धति नहीं, जीवन जीने की रीति है।

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज: board-level solved questions

Ordered from board level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.

Example 1: जाति-प्रथा श्रम विभाजन नहीं · 3 marks · Short answerBoard level

जाति-प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं? (लगभग 60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. श्रमिक-विभाजन और ऊँच-नीच।
  2. रुचि नहीं, जन्म।
  3. आजीवन बंधन।

Answer: आंबेडकर के अनुसार जाति-प्रथा काम का नहीं, काम करने वालों का अस्वाभाविक विभाजन करती है और उन्हें ऊँच-नीच भी ठहराती है। यह व्यक्ति की रुचि, प्रशिक्षण और क्षमता को देखे बिना माता-पिता के सामाजिक स्तर से जन्म से पहले ही पेशा तय कर देती है, और फिर जीवन भर उसी पेशे से बाँध देती है। इसलिए यह स्वाभाविक श्रम विभाजन नहीं है।

Example 2: बेरोज़गारी का कारण · 2 marks · Short answerHarder board level

जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोज़गारी और भुखमरी का कारण कैसे बनती रही है? (लगभग 40 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. तकनीक बदलने पर पेशा बदलना ज़रूरी।
  2. पैतृक पेशा छोड़ने की अनुमति नहीं।

Answer: उद्योगों की तकनीक बदलने पर कई पुराने पेशे बेकार हो जाते हैं और लोगों को नया काम अपनाना पड़ता है। जाति-प्रथा पैतृक पेशे के अलावा कोई काम चुनने की अनुमति नहीं देती, भले ही व्यक्ति उसमें निपुण हो; इसलिए वह बेरोज़गार होकर भूखों मरने को विवश होता है।

Example 3: समता क्यों · 3 marks · Short answerHarder board level

शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता होने पर भी आंबेडकर 'समता' को व्यवहार्य सिद्धांत क्यों मानते हैं? (लगभग 60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. पहली दो बातें व्यक्ति के वश में नहीं।
  2. उन पर भेदभाव सुविधा-संपन्नों का पक्ष।
  3. समाज और राजनीतिज्ञ के लिए व्यावहारिक कसौटी।

Answer: वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार (परिवार, शिक्षा, संपत्ति) व्यक्ति के अपने वश में नहीं, इसलिए इनके आधार पर असमान व्यवहार केवल सुविधा-संपन्नों को लाभ देगा, जो अन्याय है। समाज को अपने सदस्यों से अधिकतम लाभ तभी मिलेगा जब सबको आरंभ से समान अवसर मिलें। राजनीतिज्ञ भी करोड़ों लोगों को श्रेणियों में नहीं बाँट सकता, इसलिए समान व्यवहार ही व्यावहारिक सिद्धांत है।

Example 4: तथ्य पहचानिए · 1 mark · MCQBoard level

यह पाठ आंबेडकर के किस भाषण के हिंदी रूपांतर से लिया गया है?
(क) हू आर द शूद्राज़
(ख) एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट
(ग) बुद्धा एंड हिज़ धम्मा
(घ) द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी

Try it first, then show the solutionSolution
  1. 1936 का भाषण, हिंदी रूपांतर 'जाति-भेद का उच्छेद'।

Answer: (ख) एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट

Example 5: 'भ्रातृता' और स्त्रियाँ · 3 marks · Short answerHOTS / competency

आदर्श समाज के तीन तत्त्वों में 'भ्रातृता' रखकर क्या लेखक ने स्त्रियों को भी शामिल किया है? आप इस शब्द के स्थान पर कौन-सा शब्द उचित समझेंगे? (लगभग 60 शब्द)

Try it first, then show the solutionSolution
  1. लेखक का आशय सबके भाईचारे से।
  2. शब्द पुरुषवाचक लगता है।
  3. विकल्प: बंधुता।

Answer: आंबेडकर का आशय पूरे समाज के मेल-जोल से है, क्योंकि वे सबके हितों में सबकी भागीदारी चाहते हैं; वे स्त्रियों के अधिकारों के लिए भी जीवन भर लड़े। फिर भी 'भ्रातृता' (भाई) शब्द पुरुषवाचक लगता है। इसकी जगह 'बंधुता' या 'सौहार्द' अधिक उचित होगा, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों समान रूप से शामिल हैं; संविधान की प्रस्तावना भी 'बंधुता' शब्द का प्रयोग करती है।

Where the marks are

How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.

जाति-प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं? (लगभग 60 शब्द) (3 marks)

StepMarks
यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन है और ऊँच-नीच भी बनाता है1
रुचि और क्षमता की जगह जन्म (माता-पिता के स्तर) से पेशा तय1
जीवन भर एक पेशे का बंधन: बेरोज़गारी और अरुचि से अकुशलता1

लेखक के मत से 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है? (लगभग 40 शब्द) (2 marks)

StepMarks
केवल कानूनी पराधीनता नहीं1
दूसरों के तय व्यवहार/कर्तव्य निभाने की विवशता; जैसे इच्छा के विरुद्ध पेशा1

Where students lose marks in बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

The slips examiners see most often, and what to write instead.

  • Mistake: लिखना कि आंबेडकर श्रम विभाजन के विरोधी हैं

    वे श्रम विभाजन को सभ्य समाज की आवश्यकता मानते हैं; विरोध जन्म-आधारित श्रमिक-विभाजन और ऊँच-नीच का है।

    Do this: 'श्रम विभाजन ठीक, श्रमिक-विभाजन गलत' स्पष्ट लिखें।

    Usually costs: 1 अंक

  • Mistake: दासता को केवल गुलामी या कानूनी पराधीनता बताना

    लेखक की परिभाषा व्यापक है: दूसरों द्वारा तय व्यवहार और कर्तव्य निभाने की विवशता भी दासता है, जैसे इच्छा के विरुद्ध पेशा अपनाना।

    Do this: परिभाषा के साथ जाति-प्रथा का उदाहरण दें।

    Usually costs: 1 अंक

  • Mistake: समता का अर्थ 'सब मनुष्य बराबर होते हैं' लिखना

    आंबेडकर मानते हैं कि मनुष्य बराबर नहीं होते; फिर भी समता एक नियामक और व्यावहारिक सिद्धांत है, यानी सबके साथ समान व्यवहार और समान अवसर।

    Do this: 'बराबर होना' नहीं, 'बराबर व्यवहार और अवसर' लिखें।

    Usually costs: 1 अंक

  • Mistake: पाठ के स्रोत में गड़बड़ी

    पाठ 'एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट' (1936) के हिंदी रूपांतर 'जाति-भेद का उच्छेद' से है, जो लाहौर के जाति-पाँति तोड़क मंडल के लिए लिखा गया भाषण था और पढ़ा नहीं जा सका।

    Do this: तथ्य MCQ के लिए तीनों नाम याद रखें।

    Usually costs: MCQ में 1 अंक

Practice questions on बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.

  1. Q1 · 1 mark · MCQBoard level

    आंबेडकर के आदर्श समाज के तीन आधार कौन-से हैं?
    (क) धन, बल, बुद्धि
    (ख) स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता
    (ग) धर्म, जाति, कुल
    (घ) शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार

    Hint

    फ्रांसीसी क्रांति का नारा भी।

    Answer

    (ख) स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता

  2. Q2 · 2 marks · Short answerBoard level

    लेखक के मत से 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है? (लगभग 40 शब्द)

    Hint

    कानूनी पराधीनता से आगे।

    Answer

    आंबेडकर के अनुसार दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं है। जब कुछ लोगों को दूसरों द्वारा तय किए गए व्यवहार और कर्तव्य निभाने को विवश किया जाता है, जैसे जाति-प्रथा में इच्छा के विरुद्ध पेशा अपनाना, तो वह भी दासता है।

  3. Q3 · 2 marks · Short answerHarder board level

    अरुचि से किया गया काम कुशलता क्यों नहीं ला सकता? पाठ के आधार पर लिखिए। (लगभग 40 शब्द)

    Hint

    न दिल लगता है, न दिमाग।

    Answer

    जब व्यक्ति थोपा गया काम विवशता से करता है तो उसमें दुर्भावना पैदा होती है; वह काम टालता है और कम करता है। जहाँ न मन लगे न बुद्धि, वहाँ कुशलता नहीं आ सकती। इसलिए आर्थिक दृष्टि से भी जाति-प्रथा हानिकारक है।

  4. Q4 · 1 mark · Assertion-reasonHarder board level

    कथन (A): जातिवाद के पोषक व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता देने को जल्दी तैयार नहीं होंगे।
    कारण (R): वे जीवन, शारीरिक सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता का भी विरोध करते हैं।
    (क) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
    (ख) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, परंतु कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
    (ग) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है।
    (घ) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है।

    Hint

    वे कौन-सी स्वतंत्रताएँ मान लेंगे?

    Answer

    (ग) कथन सही है, पर कारण गलत है; वे जीवन, सुरक्षा और संपत्ति की स्वतंत्रता तो स्वीकार कर लेंगे।

  5. Q5 · 3 marks · Short answerHarder board level

    आंबेडकर लोकतंत्र को केवल शासन-पद्धति न मानकर क्या मानते हैं? उनकी यह धारणा आज के भारत के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है? (लगभग 60 शब्द)

    Hint

    सामूहिक जीवनचर्या, सम्मान।

    Answer

    आंबेडकर के लिए लोकतंत्र सामूहिक जीवन जीने की रीति और समाज के साझे अनुभवों का आदान-प्रदान है, जिसमें साथियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान हो। आज हम वोट तो देते हैं, पर जाति और धर्म के नाम पर बँटे रहते हैं। उनकी धारणा याद दिलाती है कि चुनाव से आगे, आपसी मेल-जोल और सम्मान के बिना लोकतंत्र अधूरा है।

  6. Q6 · 3 marks · Short answerHOTS / competency

    क्या जाति-प्रथा आज भी बेरोज़गारी का कारण है? पाठ और आज की परिस्थितियों के आधार पर तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए। (लगभग 60 शब्द)

    Hint

    संविधान, शहर, फिर भी भेदभाव।

    Answer

    आज संविधान हर नागरिक को कोई भी पेशा चुनने का अधिकार देता है, और शिक्षा व शहरीकरण से जन्म-आधारित पेशों का बंधन काफ़ी ढीला हुआ है। फिर भी गाँवों में कई लोगों को पुश्तैनी काम छोड़ने पर सामाजिक दबाव झेलना पड़ता है और नौकरी या किराए के मकान में जाति-भेद दिखता है। इसलिए स्थिति बदली है, पर पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

Test your recall

Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.

  1. 1.जाति-प्रथा के पोषक उसे किसका रूप बताते हैं?Show answer

    श्रम विभाजन का।

  2. 2.जाति-प्रथा में पेशा कब तय हो जाता है?Show answer

    गर्भधारण के समय से ही, माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार।

  3. 3.भाईचारे के वास्तविक रूप की तुलना किससे की गई है?Show answer

    दूध-पानी के मिश्रण से।

  4. 4.मनुष्य की क्षमता किन तीन बातों पर निर्भर है?Show answer

    शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार और मनुष्य के अपने प्रयत्न।

  5. 5.'समता' शब्द किस क्रांति के नारे में विवाद का विषय रहा?Show answer

    फ्रांसीसी क्रांति।

  6. 6.यह भाषण किस संस्था के सम्मेलन के लिए तैयार किया गया था?Show answer

    जाति-पाँति तोड़क मंडल, लाहौर (1936)।

Quick revision checklist

The night before the exam: can you do each of these without looking?

  • लेखक: डॉ. भीमराव आंबेडकर (1891-1956); स्रोत: 'एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट' (1936) का हिंदी रूपांतर 'जाति-भेद का उच्छेद'।
  • पोषकों का तर्क: जाति-प्रथा = श्रम विभाजन; खंडन: यह श्रमिक-विभाजन है, ऊँच-नीच भी बनाता है।
  • दोष: रुचि नहीं, जन्म से पेशा; आजीवन बंधन; तकनीक बदलने पर बेरोज़गारी; अरुचि से अकुशलता (आर्थिक हानि)।
  • आदर्श समाज: स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता; भाईचारा = दूध-पानी; इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र (जीवन जीने की रीति)।
  • दासता: केवल कानूनी पराधीनता नहीं, दूसरों के तय कर्तव्य निभाने की विवशता भी।
  • समता: क्षमता के तीन आधार (वंश, सामाजिक उत्तराधिकार, प्रयत्न); पहले दो पर भेदभाव अन्याय; समान अवसर; राजनीतिज्ञ की व्यावहारिक कसौटी।

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज: frequently asked questions

यह पाठ किस रचना से लिया गया है?

आंबेडकर के 1936 के भाषण 'एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट' के ललई सिंह यादव द्वारा किए गए हिंदी रूपांतर 'जाति-भेद का उच्छेद' के दो प्रकरणों से।

आंबेडकर के आदर्श समाज के तीन तत्त्व क्या हैं?

स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता; लेखक के अनुसार इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है।

आंबेडकर जाति-प्रथा को श्रम विभाजन क्यों नहीं मानते?

क्योंकि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करके उन्हें ऊँच-नीच ठहराती है, रुचि की जगह जन्म से पेशा तय करती है और जीवन भर पेशा बदलने नहीं देती।

डॉ. भीमराव आंबेडकर का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

आंबेडकर (1891-1956) का जन्म महू (मध्य प्रदेश) में हुआ। वे भारतीय संविधान के निर्माता, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री और समाज-सुधारक थे। उनके प्रेरक बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले थे; 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया।

Based on: CBSE हिंदी (आधार) पाठ्यक्रम (302), कक्षा 12, 2026-27; NCERT आरोह भाग 2 (Reprint 2026-27), बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर – श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज