ISC Class 11 हिंदी आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत: भावार्थ और हल सहित प्रश्न
Updated 15 October 2026 · Fact-checked
इस कविता में पंत बताते हैं कि बचपन में उन्होंने पैसे के पेड़ उगाने के लालच में ज़मीन में पैसे बोए, पर कुछ नहीं उगा। वर्षों बाद आँगन में यों ही बोए सेम के बीजों से इतनी फलियाँ हुईं कि पूरा मोहल्ला खा सका। तब समझ आया कि धरती माता उदार है: जैसा बोएँगे, वैसा पाएँगे।
What आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत is about
आह! धरती कितना देती है (कुछ संकलनों में 'यह धरती कितना देती है') छायावाद के चार स्तंभों में से एक, 'प्रकृति के सुकुमार कवि' सुमित्रानंदन पंत (1900-1977) की कविता है। ISC 2028 की पाठ्य-पुस्तक-सूची के अनुसार यह काव्य मंजरी (Evergreen Publications) के कक्षा XI भाग की चौथी कविता है। पंत को 'चिदंबरा' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था; उनकी बाद की कविताओं में प्रकृति-प्रेम के साथ मानवतावादी और समाजवादी विचार भी प्रमुख हैं।
कविता एक आत्मकथात्मक प्रसंग से शुरू होती है। बचपन में कवि ने छिपकर ज़मीन में पैसे बोए थे, यह सोचकर कि पैसों के पेड़ उगेंगे और वह 'मोटा सेठ' बनेगा; पर एक भी अंकुर नहीं फूटा। लगभग आधी शताब्दी बाद, वर्षा के दिनों में उसने आँगन के कोने में यों ही सेम के कुछ बीज दबा दिए। कुछ दिनों में वहाँ नन्हे पौधे उग आए, बेलें फैलीं और इतनी फलियाँ लगीं कि घर, पड़ोस, मित्र, अतिथि और मँगते, सबने भर-भरकर खाईं। तब कवि समझता है कि धरती 'रत्न प्रसविनी' है, पर उसमें स्वार्थ और लोभ के नहीं, समता, क्षमता और ममता के बीज बोने चाहिए।
परीक्षा में काव्य मंजरी से पद्यांश-आधारित प्रश्न (1, 2, 2, 5 अंक) और 10 अंकों के दीर्घ प्रश्न आते हैं। पाठ के बारे में। यह कविता कॉपीराइट में है; इस पृष्ठ पर इसका भाव कविता कोश पर उपलब्ध दो पाठों से लिया गया है और उद्धरण छोटी पंक्तियों तक सीमित हैं। काव्य मंजरी में वर्तनी और कुछ पंक्तियों में अंतर हो सकता है।
Weightage: CISCE अध्यायवार अंक प्रकाशित नहीं करता। बोर्ड प्रश्न-पत्र में काव्य मंजरी से तीन प्रश्न (एक पद्यांश-आधारित, दो दीर्घ, 10-10 अंक) आते हैं। कक्षा XI का प्रश्न-पत्र विद्यालय बनाता है।Source: CISCE का ISC 2028 परिशिष्ट I (हिंदी 805, काव्य मंजरी, कक्षा XI)
आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत: explanation
In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.
बचपन की भूल। कवि याद करता है कि बचपन में उसने छिपकर ज़मीन में पैसे बोए थे। उसने सोचा था कि पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रुपयों की मधुर फसलें खनकेंगी और वह 'मोटा सेठ' बन जाएगा। पर बंजर धरती में एक भी अंकुर नहीं फूटा; मिट्टी ने एक भी पैसा नहीं उगला। बालक दिनों तक हताश होकर राह देखता रहा। अब कवि मानता है कि वह अबोध था और उसने गलत बीज बोए थे: 'ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था'।
सेम के बीज। लगभग आधी शताब्दी बीत गई। एक वर्षा-ऋतु में, कौतूहल से, उसने आँगन के कोने की गीली मिट्टी में सेम के कुछ बीज दबा दिए और फिर इस छोटी-सी बात को भूल गया। एक संध्या आँगन में टहलते हुए उसने देखा कि कोने में कई नन्हे पौधे 'छोटे-छोटे छाता ताने' खड़े हैं, मानो जीवन की विजय-पताकाएँ हों या अंडे तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चे जो उड़ने को उत्सुक हों। धीरे-धीरे बेलें फैल गईं, हरियाली छा गई और अनगिनत फलियाँ लगीं।
धरती की उदारता। फलियाँ इतनी हुईं कि सुबह-शाम घर-घर पकीं; पड़ोसियों, बंधु-बांधवों, मित्रों, अतिथियों और मँगतों ने भी जी भरकर खाईं। कवि विस्मित होकर कहता है: 'यह धरती कितना देती है!' धरती माता अपने प्यारे पुत्रों को कितना देती है; बचपन में स्वार्थ और लोभ से पैसे बोकर वह इसका महत्त्व नहीं समझ पाया था।
संदेश। अब कवि समझता है कि वसुधा 'रत्न प्रसविनी' है। इसमें सच्ची समता, जन की क्षमता और मानव-ममता के दाने बोने चाहिए, ताकि धरती मानवता की सुनहली फसलें उगल सके और जीवन श्रम से हँस उठे। कविता का अंतिम सूत्र है: हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
Themes and message
लोभ बनाम परिश्रम और उदारता
बचपन में लोभ से बोए पैसे कुछ नहीं देते; सहज भाव से बोए सेम के बीज सबको तृप्त कर देते हैं। कविता स्वार्थ और तृष्णा के स्थान पर श्रम और साझेदारी का मूल्य बताती है।
From the text: 'ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था!'
धरती माता की उदारता
धरती कुछ बीजों के बदले अनगिनत फलियाँ देती है; वह 'रत्न प्रसविनी' है और अपने पुत्रों को बिना भेदभाव के देती है।
From the text: 'यह धरती कितना देती है!'
समता और मानवता
कवि धरती में समता, क्षमता और ममता के बीज बोने की बात करता है: समाज में बराबरी, लोगों की शक्ति का उपयोग और मानवीय प्रेम। यह पंत के मानवतावादी-समाजवादी दृष्टिकोण का संकेत है।
From the text: 'इसमें सच्ची समता के दाने बोने है;'।
कर्म और फल
जैसा कर्म, वैसा फल: कविता का अंतिम निष्कर्ष लोक-सत्य को नए अनुभव से सिद्ध करता है।
From the text: हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
The speaker and the people in the poem
कवि (वक्ता)
बचपन का लोभी बालक, अब अनुभवी व्यक्ति
- बचपन में भोला और लोभी
- बड़े होकर विनम्र और चिंतनशील
- प्रकृति-प्रेमी
- मानवतावादी
पैसे बोकर 'मोटा सेठ' बनने का सपना; बाद में सेम के पौधों पर हर्ष-विमूढ़ होना; अंत में समता और ममता के बीज बोने का संदेश।
Poetic devices
| Device | Example | Effect |
|---|---|---|
| आत्मकथात्मक शैली | 'मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे'। | पाठक कवि के अनुभव में सहभागी बनता है। |
| उत्प्रेक्षा और रूपक | नन्हे पौधे 'छाता ताने' खड़े; उन्हें जीवन की विजय-पताकाएँ या अंडे तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चे कहा गया। | पौधों की नवीनता और उल्लास का सजीव चित्र। |
| मानवीकरण | पौधों की 'पलटन' नन्हे पैर पटककर बढ़ती है; 'धरती माता'। | प्रकृति को जीवंत और आत्मीय बनाता है। |
| पुनरावृत्ति | 'इसमें... के दाने बोने है' तीन बार (समता, क्षमता, ममता)। | संदेश पर बल और लय। |
| मुक्त छंद, खड़ी बोली | पूरी कविता। | सहज, कथात्मक प्रवाह। |
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
कवि: कविता की पहली पंक्ति।
बचपन के लोभ और भोलेपन का प्रसंग।
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था!
कवि: बचपन की भूल पर आत्म-स्वीकृति।
गलत बीज: स्वार्थ और लालसा।
यह धरती कितना देती है!
कवि: सेम की फलियों के बँटने के बाद।
धरती की उदारता पर विस्मय; कविता का केंद्रीय भाव।
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ।
कवि: अंतिम अंश।
अनुभव से मिला ज्ञान।
आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत in real life
Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
जल्दी अमीर बनने का लालच
मान लीजिए कोई ऑनलाइन योजना वादा करती है कि थोड़े पैसे लगाकर महीने भर में दुगुने हो जाएँगे।
कविता का कौन-सा प्रसंग यहाँ याद आता है?
Try it first, then show the solutionSolution
- बालक ने भी पैसे बोकर पेड़ उगाने का सपना देखा।
- लोभ का बीज कुछ नहीं देता।
- सच्चा फल श्रम और धैर्य से मिलता है।
Answer: जैसे बोए गए पैसे नहीं उगे, वैसे ही लालच भरी योजनाएँ प्रायः धोखा देती हैं; कविता धैर्य और श्रम का मूल्य सिखाती है।
Memory hook: पैसे नहीं उगते, सेम उगती है।
बाँटने का आनंद
कल्पना कीजिए कि आपकी छत के गमलों में खूब टमाटर लगे हैं।
कवि क्या करता?
Try it first, then show the solutionSolution
- कवि की फलियाँ पूरे मोहल्ले ने खाईं।
- धरती का दान बाँटने से बढ़ता है।
Answer: कवि की तरह फसल पड़ोसियों और ज़रूरतमंदों में बाँटना धरती की उदारता को आगे बढ़ाना है।
Memory hook: धरती देती है, हम बाँटें।
समाज में सही बीज
मान लीजिए आपके विद्यालय में कुछ विद्यार्थी दूसरों की सहायता करने वाला एक 'पढ़ाई साथी' कार्यक्रम शुरू करते हैं।
यह कविता के किस संदेश से जुड़ता है?
Try it first, then show the solutionSolution
- समता: सबको बराबर अवसर।
- क्षमता: हर विद्यार्थी की शक्ति का उपयोग।
- ममता: सहयोग और प्रेम।
Answer: ऐसे प्रयास समता, क्षमता और ममता के बीज हैं; कविता कहती है कि इन्हीं से मानवता की सुनहली फसल उगती है।
Memory hook: जैसा बोओ, वैसा पाओ।
Topics in this chapter
How the school exam asks आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत
The question patterns to expect, and the method that works for each.
| Question type | How it is asked | Method |
|---|---|---|
| पद्यांश: कवि और प्रसंग (1 अंक), भावार्थ (2 + 2 अंक) | किसी अंश को उद्धृत करके: कवि और कविता का नाम; बचपन में कवि ने क्या बोया और क्यों; 'गलत बीज' से क्या अभिप्राय है। | प्रसंग, फिर पंक्ति का सरल भाव; प्रतीक (पैसा = लोभ, सेम = श्रम/प्रकृति) स्पष्ट करें। |
| पद्यांश: संदेश या प्रासंगिकता (5 अंक) | इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं से कवि का क्या आशय है? आज के समाज में यह संदेश कितना प्रासंगिक है? | समता, क्षमता, ममता की व्याख्या; आज के उदाहरण। |
| दीर्घ प्रश्न (10 अंक) | कविता का मूल भाव; शीर्षक की सार्थकता; बचपन और प्रौढ़ अनुभव की तुलना; पंत का प्रकृति-चित्रण। | दोनों प्रसंगों की तुलना, भाषा-शिल्प और संदेश, उद्धरण सहित। |
Tricks to remember आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
पैसा, सेम, सबको
पैसा बोया (कुछ नहीं), सेम बोई (बहुत), सबको बाँटी (उदारता)।
Use it when: कविता का क्रम।
स-क्ष-म
समता, क्षमता, ममता: तीन सही बीज।
Use it when: संदेश वाले प्रश्न।
आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत: exam-level solved questions
Ordered from exam level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.
Example 1: पद्यांश (i): कवि का बचपन का सपना · 1 mark · Very short answerExam level
'मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे' पंक्ति के कवि और कविता का नाम लिखिए। कवि ने बचपन में पैसे क्यों बोए थे?
Try it first, then show the solutionSolution
- कवि: सुमित्रानंदन पंत; कविता: आह! धरती कितना देती है।
- कारण: पैसों के पेड़ उगाकर 'मोटा सेठ' बनने का सपना।
Answer: कवि सुमित्रानंदन पंत, कविता 'आह! धरती कितना देती है'; उन्होंने सोचा था कि पैसों के पेड़ उगेंगे और वे 'मोटा सेठ' बन जाएँगे।
Example 2: पद्यांश (ii) और (iii): गलत बीज और सेम के पौधे · 4 marks · Short answerHarder exam level
(ii) 'मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे' से कवि का क्या आशय है? (iii) सेम के नन्हे पौधों के लिए कवि ने कौन-सी उपमाएँ दी हैं?
Try it first, then show the solutionSolution
- (ii) गलत बीज: लोभ, तृष्णा, स्वार्थ (पैसे); अबोधता।
- (iii) छाता ताने, विजय-पताकाएँ, हथेलियाँ, अंडे तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चे; पलटन।
Answer: (ii) कवि कहता है कि बचपन में वह नासमझ था; उसने धरती में पैसे के रूप में लोभ और तृष्णा के बीज बोए थे, जो कभी फलते नहीं। 'ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था' से स्पष्ट है कि उसका उद्देश्य स्वार्थ था, श्रम या सेवा नहीं।
(iii) कवि को आँगन के कोने में उगे सेम के नन्हे पौधे छोटे-छोटे छाते ताने खड़े दिखते हैं; वह उन्हें जीवन की विजय-पताकाएँ, खुली नन्ही हथेलियाँ और अंडे तोड़कर निकले, उड़ने को उत्सुक चिड़ियों के बच्चे कहता है, और उनकी पंक्ति को बौने पौधों की 'पलटन'।
Example 3: पद्यांश (iv): समता, क्षमता और ममता (5 अंक) · 5 marks · Long answerHOTS / competency
'इसमें सच्ची समता के दाने बोने है;' और आगे की पंक्तियों में कवि किन बीजों को बोने की बात करता है? आज के समाज में यह संदेश कितना प्रासंगिक है?
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- तीन बीज: समता (बराबरी), जन की क्षमता (लोगों की शक्ति और श्रम), मानव-ममता (प्रेम)।
- परिणाम: मानवता की सुनहली फसलें।
- आज की प्रासंगिकता: असमानता, स्वार्थ, बेरोज़गारी, संवेदनहीनता।
Answer: कवि कहता है कि धरती में अब सच्ची समता, जन की क्षमता और मानव-ममता के दाने बोने हैं। समता का अर्थ है समाज में सबको बराबर अवसर और सम्मान; जन की क्षमता का अर्थ है लोगों की शक्ति और श्रम का सही उपयोग; मानव-ममता का अर्थ है सबके प्रति प्रेम और सहानुभूति। ऐसे बीजों से धरती मानवता की सुनहली फसलें देगी और जीवन श्रम से हँस उठेगा।
आज यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। समाज में अमीर-गरीब की खाई, अवसरों की असमानता और स्वार्थ बढ़ रहा है। यदि हम शिक्षा, रोज़गार और सम्मान में समता लाएँ, लोगों की क्षमता को काम दें और एक-दूसरे के प्रति करुणा रखें, तो समाज वैसे ही फलेगा-फूलेगा जैसे कवि के आँगन की सेम। हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे आज भी उतना ही सत्य है।
Example 4: दीर्घ प्रश्न: दो प्रसंगों की तुलना · 10 marks · Long answerHarder exam level
'आह! धरती कितना देती है' में बचपन में पैसे बोने और प्रौढ़ अवस्था में सेम बोने के प्रसंगों की तुलना करते हुए कविता का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- पहला प्रसंग: छिपकर, लोभ से, सेठ बनने का सपना; परिणाम शून्य, हताशा।
- दूसरा प्रसंग: कौतूहल से, सहज भाव से; परिणाम: अनगिनत फलियाँ, सबमें बँटीं।
- अंतर: उद्देश्य (स्वार्थ बनाम सहजता), बीज (पैसा बनाम सेम), फल (कुछ नहीं बनाम सबके लिए)।
- मूल भाव: धरती की उदारता; समता, क्षमता, ममता; जैसा बोओ वैसा पाओ।
Answer: कविता दो प्रसंगों के विरोध पर टिकी है, और उनकी तुलना से ही इसका मूल भाव स्पष्ट होता है।
पहला प्रसंग: बचपन। बालक ने छिपकर ज़मीन में पैसे बोए, ताकि पैसों के पेड़ उगें, रुपयों की फसलें खनकें और वह 'मोटा सेठ' बन जाए। बोने का भाव स्वार्थ और लोभ का था, और तरीका छिपाने का। परिणाम: बंजर धरती में एक भी अंकुर नहीं फूटा, सपने धूल हो गए और बालक हताश राह देखता रहा। कवि बाद में मानता है कि उसने 'ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था'।
दूसरा प्रसंग: प्रौढ़ अवस्था। लगभग आधी शताब्दी बाद, वर्षा में, उसने कौतूहलवश आँगन के कोने में सेम के बीज दबा दिए और भूल गया। यहाँ न लोभ था, न दिखावा। परिणाम: नन्हे पौधे छाते ताने उगे, बेलें फैलीं और इतनी फलियाँ लगीं कि घर, पड़ोस, मित्र, अतिथि और मँगते, सबने जी भरकर खाईं।
तुलना। एक में बीज पैसा था, उद्देश्य निजी लाभ, फल शून्य; दूसरे में बीज सच्चा था, भाव सहज, फल सबके लिए। धरती लोभ को नहीं, श्रम और सच्चे बीज को फल देती है, और वह फल बाँटने के लिए होता है।
मूल भाव। इसीलिए कवि विस्मय से कहता है, 'यह धरती कितना देती है!' और समझता है कि वसुधा 'रत्न प्रसविनी' है। अब उसमें समता, जन की क्षमता और मानव-ममता के दाने बोने हैं, ताकि मानवता की सुनहली फसलें उगें। कविता का सार अंतिम पंक्ति में है: हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
Example 5: दीर्घ प्रश्न: शीर्षक की सार्थकता · 10 marks · Long answerHOTS / competency
'आह! धरती कितना देती है' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- 'आह!' विस्मय और आत्म-बोध का उद्गार।
- धरती की उदारता: कुछ बीज, अनगिनत फलियाँ, सबमें बँटीं।
- कवि की बचपन की भूल से तुलना।
- शीर्षक कविता के केंद्रीय वाक्य से लिया गया।
Answer: शीर्षक कविता के केंद्रीय अनुभव और भाव को सटीक रूप से व्यक्त करता है।
'आह!' विस्मय, आनंद और आत्म-बोध का उद्गार है। जब कवि देखता है कि आँगन में यों ही बोए कुछ सेम के बीजों से इतनी फलियाँ हुईं कि पूरा मोहल्ला खा सका, तो वह चकित होकर कह उठता है, 'यह धरती कितना देती है!'
शीर्षक धरती की उदारता को सामने रखता है: वह थोड़े के बदले बहुत देती है, और बिना भेदभाव के अपने सब पुत्रों को देती है। इसके विपरीत बचपन में लोभ से बोए पैसे कुछ नहीं दे सके; यह विरोध शीर्षक के विस्मय को और गहरा करता है।
शीर्षक में कवि का आत्म-बोध भी छिपा है: जो धरती का महत्त्व बचपन में नहीं समझ पाया, वह अब समझता है कि वसुधा 'रत्न प्रसविनी' है और उसमें समता, क्षमता और ममता के बीज बोने चाहिए।
इस प्रकार शीर्षक कविता के मूल वाक्य, उसके भाव (विस्मय) और संदेश (उदारता और सही बीज), तीनों को एक साथ प्रकट करता है।
Where the marks are
How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.
दीर्घ प्रश्न (10 अंक)। CISCE अंक-विभाजन प्रकाशित नहीं करता; यह विभाजन ISC हिंदी की अंक-योजनाओं के आधार पर केवल संकेतात्मक है। (10 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| भूमिका: कवि, कविता और प्रश्न का केंद्र | 1 |
| दोनों प्रसंगों या प्रश्न के सभी अंशों का विवेचन | 4 |
| पंक्तियों के उद्धरण और उनका भाव | 3 |
| निष्कर्ष, अपना मत और भाषा | 2 |
Where students lose marks in आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: पैसे और सेम को केवल शाब्दिक अर्थ में लेना
विद्यार्थी कहानी की तरह घटना लिख देते हैं, प्रतीक नहीं समझाते।
Do this: पैसा = लोभ/स्वार्थ; सेम = सच्चा, सहज बीज/श्रम; फलियाँ = साझा समृद्धि।
Usually costs: भावार्थ के अंक।
Mistake: अंतिम संदेश (समता, क्षमता, ममता) छोड़ देना
विद्यार्थी फलियों तक लिखकर रुक जाते हैं।
Do this: मूल भाव वाले प्रश्न में अंतिम अंश अवश्य समझाएँ।
Usually costs: दीर्घ प्रश्न के अंक।
Mistake: उत्तर को कविता के सार तक सीमित रखना
ISC परीक्षक बार-बार सार लिखने और प्रश्न से न जोड़ने पर अंक काटते हैं।
Do this: प्रश्न के कथन से हर अनुच्छेद जोड़ें।
Usually costs: विश्लेषण के अंक।
Mistake: पंक्तियाँ गलत उद्धृत करना
कविता के कई पाठ प्रचलित हैं।
Do this: अपनी पाठ्य-पुस्तक की चार-पाँच छोटी पंक्तियाँ शुद्ध याद करें।
Usually costs: उद्धरण की विश्वसनीयता।
Practice questions on आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 1 mark · MCQExam level
कवि ने आँगन में कौन-से बीज बोए थे? (a) गेहूँ (b) सेम (c) मटर (d) लौकी
Hint
फलियों वाली बेल।
Answer
(b) सेम।
Q2 · 2 marks · Short answerExam level
बचपन में पैसे बोने के बाद बालक की क्या दशा हुई?
Hint
अंकुर, सपने, हताशा।
Answer
धरती में एक भी अंकुर नहीं फूटा, उसके सपने धूल हो गए, और वह हताश होकर दिनों तक राह देखता रहा।
Q3 · 5 marks · Long answerHarder exam level
सेम की फलियाँ किन-किन लोगों ने खाईं? इससे धरती के किस गुण का पता चलता है?
Hint
घर, पड़ोस, बंधु-बांधव, मित्र, अतिथि, मँगते।
Answer
अपेक्षित बिंदु: फलियाँ सुबह-शाम घर-घर पकीं; पड़ोस के, जाने-अनजाने लोग, बंधु-बांधव, मित्र, अतिथि और मँगते, सबने खाईं; पूरे मोहल्ले ने दिन-रात खाईं; इससे धरती की असीम उदारता और बिना भेदभाव के देने का गुण प्रकट होता है; फल बाँटने में आनंद है।
Q4 · 2 marks · Short answerHarder exam level
कविता में प्रयुक्त किन्हीं दो अलंकारों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
Hint
मानवीकरण, उत्प्रेक्षा, पुनरुक्ति।
Answer
मानवीकरण: 'धरती माता' और पौधों की 'पलटन' का नन्हे पैर पटककर बढ़ना; उत्प्रेक्षा/उपमा: पौधे मानो जीवन की विजय-पताकाएँ या अंडे तोड़कर निकले चिड़ियों के बच्चे हों।
Q5 · 5 marks · Long answerHarder exam level
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे पंक्ति के आधार पर कविता का संदेश लिखिए।
Hint
कर्म-फल; लोभ बनाम श्रम; समता-ममता।
Answer
अपेक्षित: लोभ के बीज (पैसे) व्यर्थ गए; सच्चे बीज (सेम) से भरपूर फल; समाज में भी जैसे कर्म और मूल्य बोएँगे, वैसा फल मिलेगा; समता, क्षमता, ममता बोने से मानवता की फसल; निष्कर्ष।
Q6 · 10 marks · Long answerHOTS / competency
पंत की इस कविता में प्रकृति-प्रेम और मानवतावाद का मेल किस प्रकार हुआ है? सोदाहरण लिखिए।
Hint
पौधों का सजीव चित्रण; धरती माता; समता-ममता का संदेश।
Answer
अपेक्षित बिंदु: ऋतुओं का वर्णन, वर्षा, नन्हे पौधों का कोमल-सजीव चित्रण (छाते, पताकाएँ, चिड़ियों के बच्चे) में प्रकृति-प्रेम; धरती को माता और 'रत्न प्रसविनी' कहना; फलियाँ सबमें बाँटने का आनंद; अंत में समता, क्षमता, ममता के बीज बोने का संदेश, जो मानवतावाद है; छायावादी कोमलता और प्रगतिशील विचार का मेल; निष्कर्ष।
Test your recall
Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.
1.बचपन में कवि क्या बनना चाहता था?Show answer
'मोटा सेठ'।
2.कवि ने सेम के बीज कब और कहाँ बोए?Show answer
लगभग आधी शताब्दी बाद, वर्षा-ऋतु में, आँगन के कोने की गीली मिट्टी में।
3.कवि धरती को क्या कहता है?Show answer
'रत्न प्रसविनी' और 'धरती माता'।
4.कविता की अंतिम पंक्ति क्या है?Show answer
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
Quick revision checklist
The night before the exam: can you do each of these without looking?
- क्या आप दोनों प्रसंगों की तुलना कर सकते हैं?
- क्या आप सेम के पौधों के लिए दी गई तीन उपमाएँ बता सकते हैं?
- क्या आप समता, क्षमता और ममता का अर्थ समझा सकते हैं?
- क्या आप शीर्षक की सार्थकता लिख सकते हैं?
आह! धरती कितना देती है – सुमित्रानंदन पंत: frequently asked questions
कविता का शीर्षक कहीं 'यह धरती कितना देती है' और कहीं 'आह! धरती कितना देती है' क्यों है?
विभिन्न संकलनों में शीर्षक अलग रूप में छपा है; ISC की पाठ्य-पुस्तक-सूची में 'Aah Dharati Kitna Deti Hai' है।
सुमित्रानंदन पंत को 'प्रकृति का सुकुमार कवि' क्यों कहते हैं?
उनकी कविताओं में प्रकृति का अत्यंत कोमल, सजीव और सुंदर चित्रण है; इस कविता में भी नन्हे पौधों का वर्णन इसी कोमलता का उदाहरण है।
क्या यह पृष्ठ कविता का पूरा पाठ देता है?
नहीं। कविता कॉपीराइट में है, इसलिए यहाँ केवल भावार्थ और छोटी पंक्तियाँ हैं; पूरा पाठ काव्य मंजरी से पढ़ें।
Based on: CISCE ISC 2028 Appendix I: List of Prescribed Textbooks (Hindi 805, Kavya Manjari, Class XI); Kavita Kosh: यह धरती कितना देती है / सुमित्रानंदन पंत; Kavita Kosh: आ: धरती कितना देती है / सुमित्रानंदन पंत (second text)