ISC Class 12 हिंदी दासी (जयशंकर प्रसाद): सार, पात्र और हल सहित प्रश्न
Updated 14 October 2026 · Fact-checked
'दासी' जयशंकर प्रसाद की ऐतिहासिक कहानी है, जो सुल्तान मसऊद के समय गजनी, काशी और पंजाब में घटती है। बलराज अपनी वाग्दत्ता इरावती को खोजता है, जो लूट में पकड़ी जाकर दासी बनी। तुर्क दासी फिरोज़ा दोनों को मिलाती है और अंत में स्वयं अपनी प्रसन्नता की 'समाधि' की आजीवन दासी बन जाती है।
What दासी – जयशंकर प्रसाद is about
दासी छायावाद के प्रमुख कवि, नाटककार और कथाकार जयशंकर प्रसाद की कहानी है, जो ISC हिंदी (805) की पाठ्यपुस्तक गद्य संकलन के Class XII भाग में पहला पाठ है। यह कहानी प्रसाद के संग्रह 'आँधी' में है और सार्वजनिक क्षेत्र (public domain) में है; इस पृष्ठ के उद्धरण भारतकोश के पाठ से लिए गए हैं और 'आँधी' (1955) के विकिस्रोत पर उपलब्ध छापे से मिलाए गए हैं। गद्य संकलन के छापे में वर्तनी (जैसे फ़ीरोज़ा/फिरोज़ा) कुछ भिन्न हो सकती है।
खंड ख में गद्य संकलन से तीन प्रश्न आते हैं: एक गद्यांश-आधारित (1, 2, 2 और 5 अंक) और दो 10-10 अंकों के दीर्घ प्रश्न। यह कहानी 2026 तक भी गद्य संकलन में थी, पर 2024 और 2025 में इस पर प्रश्न नहीं आया; 2027 से यह Class XII के भाग में है। ध्यान दें: 2025 का गद्यांश प्रश्न ('बुंदेला शरणागत के साथ घात नहीं करता') इस कहानी का नहीं, 'शरणागत' (वृंदावनलाल वर्मा) का था, जो अब Class XI में है।
गद्य संकलन के अन्य पाठों पर परीक्षकों की टिप्पणियाँ यहाँ भी लागू होंगी: रचनाकार का नाम भूलना, प्रश्न का कोई भाग छोड़ना और समीक्षा की जगह सार लिखना।
Weightage: गद्य संकलन से खंड ख में तीन प्रश्न (हर एक 10 अंक) आते हैं; परीक्षार्थी चार पुस्तकों में से तीन चुनकर कुल चार प्रश्न करते हैं। यह कहानी 2027 से Class XII भाग में है।Source: CISCE ISC 2027 भारतीय भाषाएँ पाठ्यक्रम तथा 2024-25 के बोर्ड प्रश्न-पत्र
दासी – जयशंकर प्रसाद: summary
In our own words, in the order of the text. Read the NCERT text itself too: the board quotes from it.
पृष्ठभूमि। कहानी महमूद गजनवी के बाद सुल्तान मसऊद के शासन-काल की है। सिल्जूकों से हार के बाद सुल्तान ने तुर्क और हिंदू दोनों सैनिकों को नौकरी से अलग कर दिया था। पंजाब अहमद नियाल्तगीन के शासन में था।
गजनी नदी का किनारा। हिंदू सैनिक बलराज अपमान से दुखी होकर छुरे से आत्महत्या करने जा रहा है। तुर्क दासी फिरोज़ा, जो अल्हड़ और हँसमुख है, उसकी कलाई पकड़ लेती है: 'सुख जीने में है बलराज!' बलराज बताता है कि वह अपनी प्रेमिका से अमीर बनकर लौटने का वादा करके आया था। फिरोज़ा उसे पाँच दिरम देकर हिंदुस्तान लौटने को कहती है। राजा तिलक, जो सुल्तान का विश्वासपात्र हिंदू कर्मचारी है, यह सुनकर बलराज को थैली देकर लाहौर जाने वाले दल के साथ भेज देता है। फिर वह फिरोज़ा को भी, बिना दाम लिए, अहमद के पास जाने देता है और बताता है कि उसकी एक छोटी बहन इरावती हिंदुस्तान में है, जिसकी उसने कभी खोज नहीं की।
काशी का मंदिर। बलराज विश्वनाथ मंदिर में अपनी वाग्दत्ता इरावती से मिलता है। इरावती बताती है कि मुलतान की लूट में म्लेच्छों ने उसे पकड़ लिया, कन्नौज के चौराहे पर घोड़ों के साथ बेचा और काशी के एक महाजन (धनदत्त) ने उसे पाँच सौ दिरम में दासी बना लिया। उसने लिखकर स्वीकार किया है कि कभी नहीं भागेगी, इसलिए वह बलराज के साथ नहीं जा सकती। बलराज इसे पाखंड कहता है, पर इरावती चली जाती है।
बनारस का बाज़ार। हताश बलराज को रास्ते में नियाल्तगीन और फिरोज़ा मिलते हैं। बाज़ार में एक दुकानदार के अपमानजनक शब्दों से झगड़ा होता है, तुर्क लूट-मार करने लगते हैं। एक जौहरी को बचाने के लिए इरावती 'इसे छोड़ दो, न मारो' कहती हुई तलवार के सामने आ जाती है; बलराज नियाल्तगीन की कलाई पकड़ लेता है। फिरोज़ा इरावती को साथ ले लेती है।
चंद्रभागा (चनाब) का तट। इरावती फिरोज़ा से कहती है कि वह बिकी हुई दासी है। वह बलराज पर आरोप लगाती है कि जो पहले अमीर बनना चाहता है, फिर प्रेम का दान करना चाहता है, वह हृदय माँगे तो यह धृष्टता है। बलराज यह सुनकर चला जाता है।
अहमद का महल। एक रात अहमद इरावती से दुर्व्यवहार करना चाहता है; फिरोज़ा आ जाती है, अहमद को फटकारती है और इरावती को लेकर महल छोड़ देती है।
अंत। बलराज जाटों का सरदार बनकर उन्हें पराधीनता से मुक्ति का संदेश दे चुका है। जंगल में वह फिरोज़ा और इरावती से मिलता है। अहमद की सेना से युद्ध होता है; बलराज का भाला अहमद की छाती में उतर जाता है। उसी समय गजनी की सेना के साथ तिलक पहुँचते हैं। घायल बलराज का सिर इरावती की गोद में है; तिलक अपनी बहन को पहचानकर क्षमा माँगते हैं। बलराज जाटों का सरदार है और इरावती रानी, पर वहीं फिरोज़ा की प्रसन्नता की समाधि बन गई और वह वहाँ झाड़ू देती, फूल चढ़ाती और दीप जलाती रही: 'उस समाधि की वह आजीवन दासी बनी रही।'
Themes and message
दासता और मनुष्य की स्वतंत्रता
इरावती 'पाँच सौ दिरम' पर बिकी दासी है, फिरोज़ा भी युद्ध में पकड़ी गई दासी है। बलराज का प्रश्न कि क्या पशुओं के समान मनुष्य भी बिक सकते हैं, कहानी का केंद्रीय नैतिक प्रश्न है।
From the text: 'पशुओं के समान मनुष्य भी बिक सकते हैं?'
त्याग और निःस्वार्थ प्रेम
फिरोज़ा बलराज को मरने से बचाती है, अपने इनाम के दिरम देती है, इरावती और बलराज को मिलाती है और अंत में अपने प्रेम की समाधि की दासी बन जाती है।
From the text: 'उस समाधि की वह आजीवन दासी बनी रही।'
स्वाभिमान और सत्य-निष्ठा
इरावती अपना दिया वचन नहीं तोड़ती और बलराज के प्रेम को भी परखती है। फिरोज़ा अहमद के अपमान को सहन नहीं करती।
From the text: 'पर उसे अपनी आँखों से तो नहीं गिरना चाहिए।'
जन्मभूमि और आत्म-बोध
तिलक आकांक्षा में डूबकर अपनी जन्मभूमि और बहन को भूल गया था; बलराज अंत में जाटों को पराधीनता से मुक्ति का संदेश देता है।
From the text: 'मैं हिन्दू हूँ, फिरोज़ा!'
जीवन के प्रति आस्था
फिरोज़ा का जीवन-दर्शन: आत्महत्या बचपना है, सुख जीने में है, रोने में समय क्यों बिताया जाए।
From the text: 'सुख जीने में है बलराज!'
Characters
फिरोज़ा
तुर्क दासी; कहानी की वास्तविक नायिका, जिसके त्याग से शीर्षक सार्थक होता है।
- अल्हड़, चंचल और हँसमुख; जीवन से प्रेम करने वाली।
- करुणामयी और परोपकारी: बलराज को बचाती है, इरावती को मिलाती है।
- स्वाभिमानी: अहमद को फटकारकर महल छोड़ देती है।
- प्रेम में एकनिष्ठ और त्यागी: अंत में अपनी प्रसन्नता की 'समाधि' की आजीवन सेवा।
'अल्हड़पन, चञ्चलता और हँसी से बनी हुई वह तुर्क बाला'
इरावती
बलराज की वाग्दत्ता और तिलक की बहन; लूट में पकड़ी जाकर बिकी दासी।
- सहनशील और दृढ़: कोड़े खाकर भी विरोध करती रही।
- वचन की पक्की: दासी बनने की शर्तें नहीं तोड़ती।
- स्वाभिमानी और विचारशील: बलराज के प्रेम की कमियाँ पहचानती है।
- करुणामयी: बाज़ार के झगड़े में जौहरी को बचाने के लिए तलवार के सामने आ जाती है।
'मैं क्रीत दासी हूँ।'
बलराज
हिंदू सैनिक, इरावती का प्रेमी; अंत में जाटों का सरदार।
- भावुक और निराश: अपमान में आत्महत्या करने चला था।
- प्रेमी पर महत्वाकांक्षी: पहले अमीर बनकर विवाह करना चाहता था।
- वीर और बलिष्ठ: नियाल्तगीन की कलाई पकड़ता है, अहमद से युद्ध करता है।
- अंत में देशप्रेमी नेता: जाटों को पराधीनता से मुक्ति का संदेश।
'घायल बलराज का भीषण भाला अहमद की छाती में पार हो रहा था।'
राजा तिलक
सुल्तान का विश्वासपात्र हिंदू कर्मचारी; इरावती का भाई।
- बुद्धिमान और व्यावहारिक: कट्टर दरबार में प्रतिष्ठा बनाए रखी।
- आकांक्षा के नशे में अपनी जन्मभूमि और बहन को भूला हुआ।
- भीतर से संवेदनशील: बलराज और फिरोज़ा की सहायता करता है।
- आत्मग्लानि से भरा: 'मैं चिर-निर्वासित, विस्मृत अपराधी!'
'मैंने आकांक्षा का नशा पी लिया है।'
अहमद नियाल्तगीन
पंजाब का सेनानी; फिरोज़ा जिसे चाहती है।
- महत्वाकांक्षी: पंजाब का स्वतंत्र शासक बनना चाहता है।
- विलासी और अविश्वसनीय: इरावती से दुर्व्यवहार का प्रयास।
- युद्ध में बलराज के हाथों मारा जाता है।
'अहमद की आँखों में पशुता नाच उठी।'
How it is written
| Device | Example | Effect |
|---|---|---|
| ऐतिहासिक कहानी | सुल्तान मसऊद, अहमद नियाल्तगीन, गजनी, काशी, पंजाब | इतिहास की पृष्ठभूमि पर कल्पित पात्रों के माध्यम से मानवीय भावनाओं की कथा। |
| काव्यात्मक, तत्सम-प्रधान भाषा | 'वसन्त की चाँदनी रात अपनी मतवाली उज्ज्वलता में… लडख़ड़ा रही है' | प्रसाद की छायावादी कवि-दृष्टि गद्य में भी दिखती है; चित्रात्मक वातावरण। |
| प्रतीक | फिरोज़ा का गीत: 'मैं जलती हुई दीपशिखा हूँ'; अंत में समाधि पर दीप जलाना | फिरोज़ा के आत्म-बलिदानी प्रेम का पूर्व-संकेत और समापन। |
| संवाद-शैली और नाटकीयता | बाज़ार का झगड़ा, अहमद के महल का दृश्य, युद्ध का अंत | प्रसाद के नाटककार रूप की छाप; कथा में गति और तनाव। |
| विरोधाभासी उक्तियाँ | 'बरफ से ढकी हुई चोटियों के नीचे भी ज्वालामुखी होता है।' | पात्रों (तिलक) के भीतर छिपी पीड़ा को उजागर करना। |
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
सुख जीने में है बलराज!
फिरोज़ा: गजनी नदी के किनारे, बलराज को आत्महत्या से रोकते हुए।
फिरोज़ा का जीवन-दर्शन।
मैंने आकांक्षा का नशा पी लिया है।
राजा तिलक: बलराज से, उसकी बातें सुनने के बाद।
तिलक की आत्म-स्वीकृति: महत्वाकांक्षा ने उसे जन्मभूमि से दूर किया।
बरफ से ढकी हुई चोटियों के नीचे भी ज्वालामुखी होता है।
फिरोज़ा: तिलक की पीड़ा जानकर।
बाहर से शांत व्यक्ति के भीतर की आग।
पशुओं के समान मनुष्य भी बिक सकते हैं?
बलराज: काशी के मंदिर में इरावती की दासता की शर्तें सुनकर।
दास-प्रथा पर कहानी का नैतिक प्रश्न।
मनुष्य दूसरों की दृष्टि में कभी पूर्ण नहीं हो सकता!
इरावती: चनाब तट पर फिरोज़ा से बातचीत।
आत्मसम्मान: दूसरों से अधिक अपनी दृष्टि में सही होना ज़रूरी।
उस समाधि की वह आजीवन दासी बनी रही।
लेखक: कहानी का अंतिम वाक्य, फिरोज़ा के बारे में।
शीर्षक का गहरा अर्थ: प्रेम और त्याग की दासता।
दासी – जयशंकर प्रसाद in real life
Each concept, met in an everyday situation. Read the situation, answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
जीवन का मूल्य
मान लीजिए आपका कोई मित्र परीक्षा में असफल होकर कहता है कि अब जीने का कोई अर्थ नहीं।
फिरोज़ा बलराज से जो कहती है, उससे आप मित्र को क्या समझाएँगे?
Try it first, then show the solutionSolution
- 'सुख जीने में है': दुनिया की सुंदरता और अवसर अभी शेष हैं।
- 'यों ही बेकार मर जाना' बचपना है।
- बलराज की तरह आगे बड़ा उद्देश्य मिल सकता है।
- किसी विश्वसनीय बड़े या परामर्शदाता से बात करना।
Answer: एक असफलता जीवन का अंत नहीं; बलराज जो आत्महत्या करने चला था, वही आगे जाटों का सरदार बना। मित्र को सहारा दें और किसी बड़े या हेल्पलाइन से बात करने को कहें।
Memory hook: सुख जीने में है।
मानव-तस्करी
कल्पना कीजिए कि आपके गाँव में कोई व्यक्ति लड़कियों को शहर में 'अच्छी नौकरी' दिलाने का वादा करके ले जाना चाहता है और कोई काग़ज़ नहीं दिखाता।
इरावती की कहानी इस स्थिति में क्या चेतावनी देती है?
Try it first, then show the solutionSolution
- इरावती को पकड़कर बेचा गया और शर्तों से बाँध दिया गया।
- आज भी झूठे वादों से लोग बंधुआ बनाए जाते हैं।
- सत्यापन, पंचायत/पुलिस को सूचना।
Answer: बिना सत्यापन किसी के साथ न भेजें; संदेह हो तो पुलिस या हेल्पलाइन को सूचना दें, ताकि कोई 'क्रीत दासी' न बने।
Memory hook: मनुष्य बिकाऊ नहीं।
जड़ों को न भूलना
मान लीजिए कोई व्यक्ति विदेश में बड़ा पद पाकर अपने गाँव और बूढ़े माता-पिता की वर्षों तक ख़बर न ले।
राजा तिलक के चरित्र से इसकी तुलना कीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- तिलक 'आकांक्षा का नशा' पीकर बहन और जन्मभूमि को भूल गया।
- बाद में आत्मग्लानि: 'विस्मृत अपराधी'।
Answer: सफलता के साथ अपनों और अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए, वरना तिलक की तरह पछतावा ही बचता है।
Memory hook: ऊँचाई पर भी जड़ें याद रहें।
Topics in this chapter
How the board asks दासी – जयशंकर प्रसाद
The question patterns to expect, and the method that works for each.
| Question type | How it is asked | Method |
|---|---|---|
| गद्यांश: पाठ और रचनाकार (1 अंक) | 'उक्त पंक्तियों से सम्बन्धित पाठ तथा रचनाकार का नाम लिखिए।' | पाठ 'दासी', रचनाकार जयशंकर प्रसाद; 'शरणागत' (वृंदावनलाल वर्मा) से न मिलाएँ। |
| गद्यांश: वक्ता, श्रोता, प्रसंग (2 + 2 अंक) | कथन किसने, किससे, कब कहा? इसका आशय क्या है? | वक्ता-श्रोता सही; प्रसंग में स्थान (गजनी, काशी, चनाब, महल) बताएँ। |
| गद्यांश: सामाजिक बुराई/मत (5 अंक) | कहानी में किस सामाजिक बुराई का संकेत है? आज उसके रूप और समाधान। | दास-प्रथा, स्त्रियों का क्रय-विक्रय; आज की मानव-तस्करी, बंधुआ मज़दूरी; दो सुझाव। |
| दीर्घ प्रश्न (10 अंक) | शीर्षक की सार्थकता; फिरोज़ा/इरावती/बलराज/तिलक का चरित्र-चित्रण। | कथन या चरित्र को घटनाओं से प्रमाणित करें; सार नहीं। |
Tricks to remember दासी – जयशंकर प्रसाद
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
पाँच स्थान, पाँच दृश्य: ग-का-ब-च-म
गजनी नदी (फिरोज़ा बलराज को बचाती), काशी मंदिर (इरावती से भेंट), बनारस बाज़ार (झगड़ा), चनाब तट (इरावती-फिरोज़ा संवाद), महल और युद्ध (अंत)।
Use it when: सार और प्रसंग के प्रश्न।
पात्र-संबंध
तिलक → इरावती का भाई; बलराज → इरावती का वाग्दत्त; फिरोज़ा → अहमद की प्रेमिका, तिलक की दासी।
Use it when: वक्ता-श्रोता प्रश्न।
दो दासियाँ
इरावती: बिकी (500 दिरम) → अंत में रानी। फिरोज़ा: बंदी → अंत में समाधि की दासी।
Use it when: शीर्षक की सार्थकता।
दासी – जयशंकर प्रसाद: board-level solved questions
Ordered from board level to HOTS. Cover the solution, write your own, then compare step by step.
Example 1: गद्यांश (i): पाठ और रचनाकार · 1 mark · Very short answerBoard level
'मैं अब ग़ुलामी में नहीं रह सकूँगी… जो आज ग़ुलाम है; वही कल सुल्तान हो सकता है। फिर रोना किस बात का, जितनी देर हँस सकती हूँ, उस समय को रोने में क्यों बिताऊँ?' उक्त पंक्तियों से संबंधित पाठ तथा रचनाकार का नाम लिखिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- पाठ का नाम।
- रचनाकार।
Answer: पाठ: 'दासी'; रचनाकार: जयशंकर प्रसाद।
Example 2: गद्यांश (ii): वक्ता और उसकी आशा · 2 marks · Short answerHarder board level
उक्त कथन की वक्ता कौन है? वह ग़ुलामी से छुटकारे की आशा क्यों कर रही है?
Try it first, then show the solutionSolution
- वक्ता: फिरोज़ा, तुर्क दासी; श्रोता: बलराज।
- आशा: अहमद ने राजा तिलक को एक हज़ार सोने के सिक्के भेजने की बात कही थी, जिससे उसे छोड़ दिया जाए।
Answer: वक्ता फिरोज़ा है, जो युद्ध में पकड़ी गई तुर्क दासी है; वह यह बात बलराज से कहती है। उसे आशा है कि अहमद हिंदुस्तान जाते समय राजा तिलक से कह गया था कि वह एक हज़ार सोने के सिक्के भेजेगा, जिनके बदले फिरोज़ा को छोड़ दिया जाए और वह चाहे तो हिंदुस्तान भेज दी जाए।
Example 3: गद्यांश (iii): तिलक का निर्णय · 2 marks · Short answerHarder board level
अहमद की दीनारें न आने पर भी राजा तिलक फिरोज़ा को क्यों जाने देता है? उसे किस काम से भेजता है?
Try it first, then show the solutionSolution
- कारण: 'कुछ सोने के टुकड़ों के लिए मैं तुम्हारा हृदय नहीं कुचलना चाहता'; बलराज की बातों से मन विचलित।
- काम: अहमद को समझाना कि वह पंजाब के बाहर लूट-पाट न करे।
Answer: बलराज की बातें सुनकर तिलक का हृदय विचलित हो उठा था। वह कहता है कि कुछ सोने के टुकड़ों के लिए वह फिरोज़ा का हृदय नहीं कुचलना चाहता, इसलिए बिना दाम लिए उसे जाने देता है। वह उसे इस काम से भी भेजता है कि अहमद को समझाए कि वह अपनी सेना लेकर पंजाब के बाहर हिंदुस्तान में लूट-पाट न करे।
Example 4: गद्यांश (iv): दास-प्रथा और आज · 5 marks · Long answerHOTS / competency
'दासी' कहानी में समाज की किस बुराई की ओर संकेत किया गया है? आज यह बुराई किन रूपों में दिखती है? उसे दूर करने के लिए कोई दो सुझाव दीजिए।
Try it first, then show the solutionSolution
- बुराई: दास-प्रथा, मनुष्य (विशेषकर स्त्रियों) का क्रय-विक्रय; इरावती का पाँच सौ दिरम में बिकना, फिरोज़ा का युद्ध-बंदी दासी होना।
- आज के रूप: मानव-तस्करी, बंधुआ मज़दूरी, बाल-श्रम।
- सुझाव 1: क़ानून का सख़्त पालन और जागरूकता।
- सुझाव 2: शिक्षा और आर्थिक सहायता; संदिग्ध स्थिति की सूचना देना।
Answer: कहानी दास-प्रथा, अर्थात मनुष्यों के क्रय-विक्रय की ओर संकेत करती है। इरावती को मुलतान की लूट में पकड़कर कन्नौज के चौराहे पर घोड़ों के साथ बेचा गया और काशी के महाजन ने उसे पाँच सौ दिरम में दासी बना लिया। फिरोज़ा भी युद्ध में पकड़ी गई दासी है। बलराज का प्रश्न, 'पशुओं के समान मनुष्य भी बिक सकते हैं?', इस प्रथा की अमानवीयता को उजागर करता है।
आज यह बुराई मानव-तस्करी, बंधुआ मज़दूरी और बाल-श्रम के रूप में दिखती है, जहाँ गरीब और असहाय लोगों को झूठे वादों या कर्ज़ के जाल में बाँध लिया जाता है।
पहला सुझाव: बंधुआ मज़दूरी और मानव-तस्करी के विरुद्ध क़ानूनों का सख़्ती से पालन हो और गाँव-गाँव जागरूकता फैलाई जाए, ताकि लोग झूठे वादों में न फँसें।
दूसरा सुझाव: गरीब परिवारों के बच्चों, विशेषकर लड़कियों, की शिक्षा और रोज़गार की व्यवस्था हो; साथ ही नागरिक संदिग्ध घटनाओं की सूचना हेल्पलाइन या पुलिस को दें।
तभी कोई इरावती 'क्रीत दासी' बनने को विवश नहीं होगी।
Example 5: दीर्घ प्रश्न: शीर्षक की सार्थकता · 10 marks · Long answerHOTS / competency
'दासी' कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। कहानी में 'दासी' शब्द किन-किन अर्थों में सार्थक हुआ है?
Try it first, then show the solutionSolution
- शीर्षक का सामान्य अर्थ: ख़रीदी गई सेविका।
- इरावती: क्रीत दासी, वचन से बँधी; 'मैं हूँ दासी'।
- फिरोज़ा: युद्ध-बंदी तुर्क दासी, जो दूसरों को मुक्त कराती है।
- गहरा अर्थ: फिरोज़ा प्रेम और त्याग की दासी; 'समाधि की आजीवन दासी'।
- निष्कर्ष: बाहरी दासता बनाम आंतरिक समर्पण; शीर्षक सार्थक।
Answer: 'दासी' शीर्षक कहानी के केंद्र में है और कई स्तरों पर सार्थक है।
इरावती: क्रीत दासी। इरावती मुलतान की लूट में पकड़ी गई, घोड़ों के साथ बेची गई और काशी के महाजन ने उसे पाँच सौ दिरम में ख़रीद लिया। वह कहती है, 'मैं क्रीत दासी हूँ', और अपने दिए वचन के कारण बलराज के साथ भागने से इनकार करती है। चनाब तट पर वह स्वयं को 'कुछ धातु के टुकड़ों पर बिकी हुई' दासी कहती है। यहाँ दासी शब्द सामाजिक अन्याय का प्रतीक है।
फिरोज़ा: दासी, पर दूसरों की मुक्तिदाता। फिरोज़ा युद्ध में पकड़ी गई तुर्क दासी है। फिर भी वह बलराज को आत्महत्या से बचाती है, उसे अपने दिरम देती है, इरावती को तलवार से बचाकर साथ लाती है और अहमद के दुर्व्यवहार से उसकी रक्षा करती है। दासी होकर भी वह सबसे स्वतंत्र मन वाली पात्र है।
गहरा अर्थ: प्रेम की दासता। अंत में बलराज सरदार और इरावती रानी बन जाती है, पर वहीं फिरोज़ा की प्रसन्नता की समाधि बन गई और वह वहाँ झाड़ू देती, फूल चढ़ाती और दीप जलाती रही: 'उस समाधि की वह आजीवन दासी बनी रही।' यह दासता किसी ने थोपी नहीं; यह उसके प्रेम और त्याग का स्वैच्छिक समर्पण है। उसका गीत 'मैं जलती हुई दीपशिखा हूँ' इसी अंत का पूर्व-संकेत था।
निष्कर्ष। शीर्षक बाहरी दासता (इरावती) और आंतरिक समर्पण (फिरोज़ा) दोनों को समेटता है। जिस दासी ने सबको मुक्त कराया, वह स्वयं प्रेम की दासी बनी रही; यही विडंबना शीर्षक को पूर्णतः सार्थक बनाती है।
Where the marks are
How a typical answer is marked: the value points the examiner looks for and the marks each earns.
गद्यांश-आधारित प्रश्न (10 अंक), गद्य संकलन के 2025 वाले प्रश्न 4 के ढाँचे पर। (10 marks)
| Step | Marks |
|---|---|
| (i) पाठ और रचनाकार का नाम | 1 |
| (ii) वक्ता/श्रोता और प्रसंग, हर भाग सहित | 2 |
| (iii) कथन का आशय या पात्र का निर्णय, कारण सहित | 2 |
| (iv) सामाजिक बुराई और दो सुझाव, उदाहरण सहित | 5 |
Where students lose marks in दासी – जयशंकर प्रसाद
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: 'दासी' को 'शरणागत' से मिलाना
2025 में गद्य संकलन का गद्यांश ('बुंदेला शरणागत…') 'शरणागत' (वृंदावनलाल वर्मा) से था; दोनों ऐतिहासिक कहानियाँ हैं, इसलिए पाठ और रचनाकार मिल जाने का डर रहता है। 2025 में परीक्षकों ने रचनाकार का नाम भूलने पर भी टिप्पणी की।
Wrong working
पाठ: दासी; रचनाकार: वृंदावनलाल वर्मा
Right working
पाठ: दासी; रचनाकार: जयशंकर प्रसाद
Do this: हर पाठ के मुख्य पात्रों से पहचानें: फिरोज़ा-इरावती-बलराज = 'दासी'।
Usually costs: 1 अंक और आगे के उत्तर की दिशा।
Mistake: पात्रों के संबंध उलझाना
तिलक इरावती का भाई है, बलराज उसका वाग्दत्त प्रेमी; फिरोज़ा अहमद को चाहती है। इन्हें उलटने से पूरा उत्तर गलत हो जाता है।
Do this: पात्र-संबंध का छोटा चार्ट बनाकर याद करें।
Usually costs: 2-4 अंक।
Mistake: शीर्षक की सार्थकता में केवल इरावती की दासता लिखना
कहानी का अंतिम वाक्य फिरोज़ा के 'आजीवन दासी' बनने का है; उसे छोड़ने से शीर्षक का गहरा अर्थ छूट जाता है।
Do this: दोनों दासियाँ और 'प्रेम की दासता' वाला अर्थ लिखें।
Usually costs: 3-4 अंक।
Mistake: प्रश्न के 'दो सुझाव' वाले भाग में एक सुझाव
2025 के गद्यांश प्रश्न पर परीक्षकों की सलाह: प्रश्न का हर भाग क्रम से लिखें।
Do this: 'पहला सुझाव', 'दूसरा सुझाव' अलग अनुच्छेदों में।
Usually costs: 1-2 अंक।
Practice questions on दासी – जयशंकर प्रसाद
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 2 marks · Short answerBoard level
बलराज गजनी नदी के किनारे आत्महत्या क्यों करना चाहता था?
Hint
नौकरी से निकाला जाना; 'हिन्दू बेगाने'; ख़ाली हाथ।
Answer
सिल्जूकों से हार के बाद सुल्तान मसऊद ने हिंदू और तुर्क सैनिकों को नौकरी से अलग कर दिया था। बलराज को लगता था कि तुर्क तो सुल्तान के अपने हैं, हिंदू बेगाने; यह अपमान उसे मरने से बढ़कर लगता था। साथ ही वह अपनी प्रेमिका से अमीर बनकर लौटने का वादा पूरा नहीं कर पाया था।
Q2 · 5 marks · Long answerHOTS / competency
इरावती ने बलराज के प्रेम को 'धृष्टता' क्यों कहा? क्या आप उससे सहमत हैं?
Hint
पहले अमीर बनना, फिर प्रेम का दान; दुःख में साथ न देना।
Answer
इरावती कहती है कि जो उसे दुःख सहने के लिए छोड़ जाए, केवल अपने अभिमान और आकांक्षा की तुष्टि के लिए; जो उसकी परिस्थिति में साथी न बने और पहले अमीर बनना चाहे, फिर प्रेम का दान करे, वह हृदय माँगे तो यह धृष्टता है। बलराज सचमुच लूट से अमीर बनकर ब्याह करने गया था, और उसी बीच इरावती लूटी और बेची गई। मेरे विचार में इरावती का आरोप काफ़ी हद तक उचित है, क्योंकि सच्चा प्रेम परिस्थिति में साथ खड़ा होता है; पर बलराज ने बाद में उसी को खोजने के लिए भटकने और अंत में जाटों के लिए लड़ने से अपना प्रायश्चित भी किया।
Q3 · 1 mark · MCQBoard level
फिरोज़ा अहमद का महल क्यों छोड़ देती है?
(क) तिलक के बुलाने पर
(ख) अहमद द्वारा इरावती से दुर्व्यवहार का प्रयास देखकर
(ग) बलराज से मिलने के लिए
(घ) सुल्तान के आदेश परHint
रावी के किनारे महल का दृश्य।
Answer
(ख) अहमद द्वारा इरावती से दुर्व्यवहार का प्रयास देखकर।
Q4 · 2 marks · Short answerHarder board level
'मैं हिन्दू हूँ, फिरोज़ा!' कहते हुए राजा तिलक की आत्मग्लानि का कारण स्पष्ट कीजिए।
Hint
आकांक्षा; हिंदुस्तान के शोषण की तरकीबें; बहन इरावती।
Answer
तिलक अपनी आकांक्षा और उन्नति में डूबकर अपनी जन्मभूमि और उसके दुःख-दर्द को भूल गया था। सुल्तान महमूद की लूटों की गिनती करना और हिंदुस्तान के शोषण की नई तरकीबें बताना ही उसका काम था। उसने अपनी छोटी बहन इरावती की खोज-ख़बर भी नहीं ली। इसलिए वह स्वयं को 'चिर-निर्वासित, विस्मृत अपराधी' कहता है।
Q5 · 10 marks · Long answerHarder board level
'दासी' कहानी के आधार पर फिरोज़ा का चरित्र-चित्रण कीजिए।
Hint
अल्हड़पन, जीवन-प्रेम, परोपकार, स्वाभिमान, एकनिष्ठ प्रेम; हर गुण घटना सहित।
Answer
अपेक्षित बिंदु: अल्हड़, चंचल, हँसमुख तुर्क बाला; जीवन-प्रेम ('सुख जीने में है बलराज!'); परोपकार (बलराज को बचाना, पाँच दिरम देना, इरावती को खोजने का संकल्प); व्यावहारिक बुद्धि (बाज़ार के झगड़े में सबको निकालना); स्वाभिमान (अहमद को फटकारना, 'मैं बिकी हूँ, अहमद!'); एकनिष्ठ प्रेम और त्याग (समाधि की आजीवन दासी); निष्कर्ष: दासी होकर भी कहानी की सबसे उदार और स्वतंत्र आत्मा।
Q6 · 5 marks · Long answerHOTS / competency
कहानी में बलराज एक निराश सैनिक से जाटों का सरदार कैसे बनता है? इस परिवर्तन से क्या संदेश मिलता है?
Hint
आत्महत्या का प्रयास → भटकाव → जाटों को पराधीनता से मुक्ति का संदेश → अहमद से युद्ध।
Answer
आरंभ में बलराज अपमान और गरीबी से निराश होकर आत्महत्या करना चाहता था। फिरोज़ा और तिलक की सहायता से वह हिंदुस्तान लौटा, इरावती से मिला पर उसकी कड़वी बातों से टूटकर चला गया। बहुत दिन भटकने के बाद लौटकर उसने चनाब-तट के जाटों को पराधीनता से मुक्त होने का संदेश दिया और वे सुल्तान-सरकार के लिए अबाध्य हो गए। अंत में उसने अहमद की सेना से युद्ध कर इरावती और फिरोज़ा की रक्षा की। संदेश: व्यक्तिगत निराशा से उबरकर बड़े उद्देश्य के लिए जीना ही जीवन को सार्थक बनाता है; फिरोज़ा की यह बात सच हुई कि 'बेकार न मरो'।
Test your recall
Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.
1.'दासी' कहानी के लेखक कौन हैं?Show answer
जयशंकर प्रसाद।
2.इरावती कितने दिरम में बिकी और किसने उसे ख़रीदा?Show answer
पाँच सौ दिरम में; काशी के एक महाजन (धनदत्त) ने।
3.राजा तिलक का इरावती से क्या संबंध है?Show answer
तिलक इरावती का भाई है।
4.अहमद नियाल्तगीन की मृत्यु कैसे होती है?Show answer
जाटों से युद्ध में बलराज का भाला उसकी छाती में पार हो जाता है।
5.कहानी के अंत में फिरोज़ा क्या करती है?Show answer
वहीं उसकी प्रसन्नता की समाधि बन गई; वह वहाँ झाड़ू देती, फूल चढ़ाती और दीप जलाती रही और उस समाधि की आजीवन दासी बनी रही।
Quick revision checklist
The night before the exam: can you do each of these without looking?
- क्या आप पाँचों दृश्यों का क्रम और स्थान बता सकते हैं?
- क्या आप फिरोज़ा, इरावती, बलराज और तिलक के तीन-तीन गुण लिख सकते हैं?
- क्या आप 'दासी' शब्द के दो अर्थ कहानी से स्पष्ट कर सकते हैं?
- क्या आप बलराज के प्रश्न 'पशुओं के समान मनुष्य भी बिक सकते हैं?' का संदर्भ बता सकते हैं?
- क्या आप इस कहानी को 'शरणागत' से अलग पहचान सकते हैं?
दासी – जयशंकर प्रसाद: frequently asked questions
'दासी' कहानी का केंद्रीय भाव क्या है?
दास-प्रथा की अमानवीयता के बीच मनुष्य का स्वाभिमान, निःस्वार्थ प्रेम और त्याग; विशेषकर फिरोज़ा का चरित्र, जो दासी होकर भी दूसरों को मुक्त कराती है और अंत में प्रेम की समाधि की दासी बन जाती है।
क्या 2025 में 'दासी' पर प्रश्न आया था?
नहीं। 2025 का गद्य संकलन वाला गद्यांश 'शरणागत' (वृंदावनलाल वर्मा) का था। 'दासी' 2027 से Class XII भाग में है।
कहानी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है?
महमूद गजनवी के बाद सुल्तान मसऊद का शासन-काल; पंजाब में अहमद नियाल्तगीन का शासन; काशी पर त्रिपुरी के शासकों का अधिकार और तुर्क व्यापारियों-सैनिकों का बढ़ता प्रभाव।
Based on: CISCE ISC 2027 Appendix I: List of Prescribed Textbooks (Hindi 805: Gadya Sanklan); CISCE ISC Analysis of Pupil Performance 2025: Hindi (board paper, marking scheme, examiners' comments); Jaishankar Prasad, 'Dasi' (public-domain text), Bharatkosh; Jaishankar Prasad, Aandhi (1955), 'Dasi': proofread scan on Hindi Wikisource