साखी (कबीरदास): अहंकार का नाश, मन का योग और ज्ञान का दीपक
Updated 18 October 2026 · Fact-checked
कबीर की साखी 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि' कहती है कि जब तक अहंकार था तब तक ईश्वर नहीं मिले; अहंकार मिटते ही ईश्वर मिल गए। भीतर का ज्ञान-दीपक दिखते ही अज्ञान का अँधेरा मिट गया। इसी क्रम में 'तन कौं जोगी सब करैं' साखी बाहरी दिखावे के बजाय मन के योग को सच्ची साधना बताती है।
Understand अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास)
दो साखियाँ। काव्य मंजरी में चार साखियाँ हैं। यह पृष्ठ तीसरी और चौथी साखी पर है।
साखी 3: बाह्याडंबर का विरोध। 'तन कौं जोगी सब करैं, मन कों बिरला कोइ। सब सिधि सहजै पाइए, जे मन जोगी होइ॥' CISCE की 2025 की अंक-योजना में दूसरी पंक्ति 'सब विधि सहजै पाइए' छपी है, इसलिए अपनी पुस्तक का पाठ देखें। आशय: शरीर को योगी बनाना (भगवा वस्त्र, जटा, भस्म) सब कर लेते हैं, पर मन को योगी बनाने वाला कोई विरला है। मन विकारों से मुक्त हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज मिल जाती हैं।
साखी 4: अहं का नाश। 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि। सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥' जब तक भीतर 'मैं' (अहंकार) था तब तक हरि नहीं मिले; अब हरि मिल गए तो अहंकार नहीं रहा। भीतर ज्ञान का दीपक दिखा तो अज्ञान का अंधकार मिट गया।
प्रतीक। दीपक = ज्ञान, अँधियारा = अज्ञान, 'मैं' = अहंकार, 'हरि' = ईश्वर।
संदेश। ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है; अहंकार उसके और हमारे बीच की दीवार है। कबीर दिखावे की साधना का विरोध करते हैं और आंतरिक शुद्धि पर बल देते हैं।
कला-पक्ष। दोहा छंद, रूपक और प्रतीक, विरोधाभास और सधुक्कड़ी भाषा।
Key quotations
Short lines worth knowing by heart: who says them, when, and why they matter.
तन कौं जोगी सब करैं, मन कों बिरला कोइ।
कबीर: बाह्याडंबर के विरोध वाली साखी।
दिखावे और मन की साधना का अंतर।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
कबीर: अहं-नाश वाली साखी।
अहंकार और ईश्वर साथ नहीं रह सकते।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥
कबीर: उसी साखी की दूसरी पंक्ति।
भीतर के ज्ञान-दीपक से अज्ञान का अंधकार मिटना।
अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास): key facts
- प्रतीक
- दीपक = ज्ञान
- अँधियारा = अज्ञान
- मैं = अहंकार
- हरि = ईश्वर
- चारों प्रतीक लिखें।
- दो साखियों का संदेश
- तन का योग दिखावा
- मन का योग सच्चा
- अहं मिटे तो हरि मिलें
- निष्कर्ष में।
- कला-पक्ष
- दोहा
- रूपक
- विरोधाभास
- सधुक्कड़ी भाषा
- हर बिंदु पर उदाहरण।
How to answer अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास) questions
साखी की व्याख्या में यह क्रम अपनाएँ।
- 1पंक्ति उद्धृत करें।
- 2शब्दार्थ और प्रतीक लिखें।
- 3भावार्थ सरल भाषा में लिखें।
- 4कबीर के विचार का नाम बताएँ (बाह्याडंबर का विरोध, अहं-त्याग)।
- 5कला-पक्ष की एक पंक्ति के साथ पूरा करें।
अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास) in real life
The idea, met in an everyday situation. Answer the question in your own words, then compare with the model answer. The one-line hook is what to remember.
दिखावे से अधिक भीतर की सच्चाई
मान लीजिए एक विद्यार्थी रोज़ नए कपड़े पहनकर विद्वान दिखने की कोशिश करता है, जबकि दूसरा सादे कपड़ों में चुपचाप पढ़ाई करता और अपनी कमियाँ सुधारता है।
कबीर इन दोनों में से किसे सच्चा साधक कहते?
Try it first, then show the solutionSolution
- पहला बाहरी रूप देखता है।
- दूसरा मन को साधता है।
- कबीर मन के योग को महत्त्व देते हैं।
Answer: कबीर दूसरे को, क्योंकि वह तन से नहीं, मन से साधना करता है।
Memory hook: तन नहीं, मन को साधो।
Tricks to remember अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास)
Short memory aids. Say each one aloud once, then use it on a question the same day.
मैं गया, हरि आया
अहं हटा तो ईश्वर मिला।
Use it when: चौथी साखी का सार।
दीपक अंदर
ज्ञान का दीपक भीतर जलता है।
Use it when: प्रतीक की याद।
अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास): solved examples
Ordered from board level to HOTS. Try each one before you open the solution.
Example 1: प्रतीक · 1 mark · MCQBoard level
चौथी साखी में 'दीपक' किसका प्रतीक है? (क) धन (ख) ज्ञान (ग) अहंकार (घ) भक्ति-वेश
Try it first, then show the solutionSolution
- दीपक ज्ञान का प्रतीक है।
Answer: (ख) ज्ञान।
Example 2: तन और मन · 1 mark · Very short answerBoard level
कबीर के अनुसार 'बिरला' कौन होता है?
Try it first, then show the solutionSolution
- साखी की पहली पंक्ति।
Answer: वह जो मन को योगी बनाता है।
Example 3: भावार्थ · 2 marks · Short answerHarder board level
'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि' का भावार्थ लिखिए। (लगभग 40 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- अहंकार और ईश्वर साथ नहीं।
- अहं मिटा तो ईश्वर मिला।
Answer: कबीर कहते हैं कि जब तक उनके भीतर अहंकार था तब तक ईश्वर का अनुभव नहीं हुआ; अहंकार मिटते ही हरि मिल गए। ईश्वर और अहंकार एक साथ नहीं रह सकते।
Example 4: बाह्याडंबर · 5 marks · Long answerHarder board level
'तन कौं जोगी सब करैं' साखी में कबीर किस पर चोट करते हैं और किसे सही बताते हैं? (लगभग 100 शब्द)
Try it first, then show the solutionSolution
- तन का योग: दिखावा।
- मन का योग: सच्चा।
- परिणाम: सहज सिद्धि।
Answer: कबीर 'तन कौं जोगी सब करैं, मन कों बिरला कोइ। सब सिधि सहजै पाइए, जे मन जोगी होइ॥' में बाहरी दिखावे वाले योग पर चोट करते हैं। भगवा वस्त्र, जटा और भस्म से तन को योगी बनाना सबके लिए सरल है, पर मन को विकारों से मुक्त करने वाला कोई विरला ही होता है। कबीर के अनुसार सच्चा योग मन का योग है; मन शुद्ध हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही मिल जाती हैं। यह उनके बाह्याडंबर-विरोध का उदाहरण है। यहाँ 'तन' बाहरी वेश का और 'मन' आंतरिक साधना का प्रतीक है। कला-पक्ष में यह दोहा छंद में है, तन और मन का विरोध दिखाया गया है और भाषा सधुक्कड़ी है।
Example 5: ज्ञान का दीपक · 5 marks · Long answerHOTS / competency
चौथी साखी में अहंकार, ज्ञान और अंधकार के संबंध की व्याख्या कीजिए। (लगभग 100 शब्द)
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- अहं ईश्वर से दूरी।
- दीपक का दिखना।
- अंधकार का मिटना।
Answer: कबीर कहते हैं, 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि। सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥' यहाँ 'मैं' अहंकार का, 'हरि' ईश्वर का, 'दीपक' ज्ञान का और 'अँधियारा' अज्ञान का प्रतीक है। जब तक भीतर अहंकार था, ईश्वर का अनुभव नहीं हुआ। अहंकार मिटते ही हरि मिल गए। जब भीतर ज्ञान का दीपक दिखाई दिया, तो अज्ञान का सारा अँधेरा मिट गया। कबीर का विचार है कि ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है और अहंकार उसके मार्ग की दीवार है। कला-पक्ष में दोहा छंद, दीपक का रूपक और सधुक्कड़ी भाषा है।
Where students lose marks in अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास)
The slips examiners see most often, and what to write instead.
Mistake: पंक्ति गलत उद्धृत करना
उद्धरण सही होना चाहिए।
Wrong working
जब मैं था तब ईश्वर नहीं।
Right working
जब मैं था तब हरि नहीं।
Do this: पुस्तक का पाठ याद करें।
Usually costs: 1 अंक
Mistake: प्रतीकों का अर्थ न बताना
भावार्थ अधूरा रहता है।
Wrong working
दीपक जल गया।
Right working
ज्ञान का दीपक दिखा।
Do this: प्रतीक की सूची बनाएँ।
Usually costs: 2 अंक
Mistake: कबीर के विचार का नाम न लिखना
प्रश्न विचार भी पूछता है।
Wrong working
केवल अर्थ।
Right working
बाह्याडंबर का विरोध, अहं-त्याग।
Do this: अंत में नाम लिखें।
Usually costs: 1 से 2 अंक
Exam tips
- पंक्ति उद्धृत करके भावार्थ लिखें।
- प्रतीकों के अर्थ बताएँ।
- कबीर के विचार का नाम लें।
- पाठ-भेद हो तो पुस्तक का पाठ लिखें।
- कला-पक्ष की एक पंक्ति जोड़ें।
Practice questions on अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास)
Write each answer on paper first. Open the hint only if you are stuck, and the answer only when you have finished.
Q1 · 1 mark · MCQBoard level
'सिधि' शब्द का क्या आशय है? (क) अंधकार (ख) सिद्धि (ग) धन (घ) क्रोध
Hint
साधना का फल।
Answer
(ख) सिद्धि।
Q2 · 1 mark · Very short answerBoard level
साखी में 'अँधियारा' किसका प्रतीक है?
Hint
दीपक का उलटा।
Answer
अज्ञान का।
Q3 · 2 marks · Short answerHarder board level
पुस्तक में दूसरी पंक्ति के पाठ के बारे में क्या सावधानी बरतनी चाहिए? (लगभग 40 शब्द)
Hint
अंक-योजना और पुस्तक।
Answer
CISCE की 2025 की अंक-योजना में 'सब विधि सहजै पाइए' छपा है, इसलिए अपनी पुस्तक का पाठ देखकर वही लिखें जो पुस्तक में है।
Q4 · 5 marks · Long answerHarder board level
कबीर अहंकार को ईश्वर-प्राप्ति में बाधा क्यों मानते हैं? (लगभग 100 शब्द)
Hint
मैं और हरि।
Answer
कबीर कहते हैं, 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।' उनके अनुसार अहंकार ईश्वर और मनुष्य के बीच की दीवार है। जब तक 'मैं' है, व्यक्ति अपने को ही बड़ा समझता है और ईश्वर को नहीं देख पाता। अहंकार मिटते ही भीतर ज्ञान का दीपक दिखता है, अज्ञान का अँधेरा मिट जाता है और ईश्वर का अनुभव होता है। यहाँ 'मैं' अहंकार का, 'दीपक' ज्ञान का और 'अँधियारा' अज्ञान का प्रतीक है। यह कबीर के अहं-त्याग के विचार को बताता है। कला-पक्ष में दोहा छंद, दीपक का रूपक और सधुक्कड़ी भाषा है।
Q5 · 5 marks · Long answerHOTS / competency
'कबीर का योग तन का नहीं, मन का है।' इस कथन का साखी के आधार पर समर्थन कीजिए। (लगभग 100 शब्द)
Hint
तन कौं जोगी।
Answer
साखी में कहा गया है, 'तन कौं जोगी सब करैं, मन कों बिरला कोइ। सब सिधि सहजै पाइए, जे मन जोगी होइ॥' अर्थात तन को योगी सब बना लेते हैं, पर मन को योगी बनाने वाला कोई विरला है। भगवा वस्त्र, जटा और भस्म जैसा बाहरी वेश कबीर के लिए बेकार है। मन विकारों से मुक्त हो जाए तो सिद्धियाँ सहज ही मिल जाती हैं। इसलिए उनका योग आंतरिक शुद्धि का है। यह उनके बाह्याडंबर-विरोध का उदाहरण है। 'तन' बाहरी दिखावे का और 'मन' भीतर की साधना का प्रतीक है। कला-पक्ष में दोहा छंद, तन-मन का विरोध और सधुक्कड़ी भाषा है।
Test your recall
Answer in your head or on paper first, then open the card. Pulling an answer out of memory makes it stick far better than re-reading.
1.साखियों के रचयिता कौन हैं?Show answer
कबीरदास।
2.छंद कौन-सा है?Show answer
दोहा।
3.दीपक किसका प्रतीक है?Show answer
ज्ञान का।
4.अँधियारा किसका प्रतीक है?Show answer
अज्ञान का।
5.भाषा कैसी है?Show answer
सधुक्कड़ी।
अहंकार का नाश और ज्ञान का दीपक (साखी, कबीरदास): frequently asked questions
साखियाँ किस पुस्तक में हैं?
काव्य मंजरी में।
2025 में इन पर प्रश्न आया था?
हाँ, 2025 के ISC प्रश्न-पत्र में कबीर की साखियों के इन्हीं बिंदुओं पर 10 अंकों का प्रश्न आया था।
कितनी साखियाँ पढ़नी हैं?
चार साखियाँ दी गई हैं।